धर्म-संसारः धर्मो रक्षति रक्षितः!

विशेषांक – राष्ट्रीय महापर्व
पंद्रह अगस्त

मेरे प्यारे देशवासियों जैसा कि आप सभी जानते ही है हमने अपने प्राणों से भी अति प्रिय राष्ट्र का 76वां राष्ट्रीय महापर्व महोत्सव दिवस बड़ी ही उमंग व अविस्मरणीय हर्षोल्लास से मनाया।  सबसे पहले मै संपूर्ण प्राणी जगत को राष्ट्रीय महोत्सव महापर्व दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। इस कड़ी में ऐसे अनंत वीर सपूत है जिनकी गणना करना काफी कठिन है। लेकिन परम् श्रद्धेय एवं धन्य हैं माताएँ- परम् श्रद्धेय बहनें एवं परम् पूजनीय मात -पिताश्री जिन्होंने माँ भारती की रक्षार्थ हेतु अपने दुलारो- जिगर के प्यारों को हंसते-हंसते समर्पित कर दिया। अनंत सूची ……
माँ भारती के आंचल में ऐसे सच्चे देशभक्त रूपी पौधों ने जन्म लिया जिनकी सुगंध कभी नष्ट नहीं हो सकती। उनमें से अनमोल हीरा वीर विनायक दामोदर सावरकर अर्थात स्वातंत्र्यवीर सावरकर देशभक्ति के पर्याय थे। देशभक्तों की इस देश में कभी कमी नहीं रही मगर सावरकर तो मानो देशभक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए ही इस देश में जन्मे थे। उनके जीवन पर जब हम विचार करते हैं तो उसमें मानो देशभक्ति का रस इस प्रकार समाया हुआ था जिस प्रकार बताशे में मिठास मिली रहती है। जिस तरह बताशे में से हम मिठास को अलग नहीं कर सकते उसी प्रकार वीर विनायक दामोदर सावरकर जी के जीवन की प्रत्येक गतिविधि देशभक्ति से जुड़ी हुई है।
भारतवर्ष को अजेय शक्ति बनाने के लिए “हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है और राष्ट्रीयत्व ही हिंदुत्व है’ के उद्द्घोषक स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर आज तन से हमारे मध्य नहीं हैं। लेकिन उनकी संघर्षमय प्रेरणादायी अविस्मरणीय मातृभूमि के प्रति समर्पित गाथा युगों युगों तक भारतभक्तों का मार्ग प्रशस्त करती रहेंगी। परम् श्रद्धेय सावरकर जी का प्रमुख सार था- …”वटवृक्ष का बीज राई से भी सूक्ष्म होता है किंतु उस बीज में जो स्फूर्ति होती है, जो महत्वाकाँक्षा होती है उसके कारण वह बढ़ते-बढ़ते प्रचंड वटवृक्ष का रूप ले लेता है जिसके नीचे गौओं के झुंड सुस्ताते हैं। धूप से त्रस्त लोगों को वह वटवृक्ष मधुर और आनंदमयी छाया प्रदान करता है। एक ऐसी ही महत्वाकाँक्षा मुझे भी सँजोने दो…”मेरा गीत मुझे गाने दो…यदि हमें हिंदू राष्ट्र के रूप में सम्मान और गौरव से रहना है~जिसका हमें पूर्णाधिकार है~तो वह राष्ट्र हिंदू ध्वज के नीचे ही अवतरित होगा~यह मेरा उत्तराधिकार है- मैं तुम्हें सौंप रहा हूँ ”। जय हिंद -जय भारत
इसी कड़ी में हमारा अनमोल महापर्व भी है। अर्थात्
पंद्रह अगस्त भारतवर्ष का राष्ट्रीय महापर्व है। भारत देश वर्ष 1857- वर्ष 1947 तक स्वतंत्रता संग्राम लड़ने के पश्चात ब्रिटिश शासन से 15 अगस्त वर्ष 1947 ई0 को मुक्त हुआ और एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। तभी से भारतवासी इस दिन को “स्वतंत्रता दिवस अर्थात् राष्ट्रीय महापर्व दिवस” के रूप में बहुत ही धूम-धाम और हर्षोउल्लास से मनाते आ रहे है।
आओ झुककर श्रद्धापूर्वक नमन करें उन्हें, 
जिनकी जिंदगी में खुशहाल मुकाम आया है।
किस कदर खुशनसीब है वो लोग,
जिनका लहू भारत माँ के काम आया है !!

स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत तब से हुई जब परम् श्रद्धेय एवं पूज्यनीय मंगल पांडे जी नामक महान् क्रांतिकारी को ब्रिटिश शासन के अंग्रेज अधिकारी ने गोली मारी थी। तभी से संपूर्ण भारत देशभक्त देशवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई। हमे और हमारे देश को ब्रिटिशों से यह आजादी इतनी आसानी से नहीं मिली है।
देश की आजादी पाने के लिए बहुत से क्रांतिकारी सेनानियों ने बलिदान दिया जैसे कि- सुभाष चंद्र बोस, मंगल पांडे, बाल गंगाधर तिलक, पंडित जवाहरलाल नेहरू, गाँधी जी, वीर विनायक दामोदर सावरकर जी, वीर चंद्रशेखर आजाद जी, वीर भगत सिंह जी, अब्दुल हमीद जी, लोक मान्य तिलक जी, लाला लाजपत रायजी, लाल बहादुर शास्त्री जी, खुदीराम बोस जी, महारानी लक्ष्मीबाई जी आदि। आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह आंदोलन चलाया।
माँ भारती के सच्चे वीर सपूतों का बस एकमात्र लक्ष्य भारतवर्ष को ब्रिटिश शासन से आजादी दिलाना था और काफी अत्याचार सहने और संघर्ष करने के पश्चात फलस्वरूप वे सफल भी हुए।स्वतंत्रता सेनानिओं के लिए कुछ लाइनें कहना चाहुँ चाहुँगा-

नमन है उन वीरों को जिन्होंने इस देश को बचाया।
गुलामी की मजबूत बेड़ियों को,
अपने बलिदान के रक्त से पिघलाया।
और भारत माँ को आजाद है कराया।।
यह हर भारतवासी के गर्व और सौभाग्य का अनुपम दिवस है। यह महापर्व हमारे हृदय में नवीन स्फूर्ति, नवीन आशा, अद्वितीय उत्साह तथा अटूट देश-भक्ति का संचार है।
यह राष्ट्रीय महापर्व अर्थात् स्वतंत्रता दिवस हमे इस बात बात की याद दिलाता है कि हमने कितनी कुर्बानियाँ देकर यह आजादी प्राप्त की है, जिसकी रक्षा हमे हर कीमत पर करनी है। चाहे हमे इसके लिए अपने प्राणों का त्याग क्यों न करना पड़ें। इस प्रकार हम स्वतंत्रता दिवस के पर्व को पूर्ण उत्साह, उमंग और जोश के साथ मनाते है और राष्ट्र की स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता की रक्षा का प्रण लेते है। जाते-जाते मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि –

भूल न जाना माँ भारती के सच्चे वीर सपूतों का अद्भुत
और अनमोल बलिदान।
इस दिन ले लिए जो हुए थे हँस – हँसकर कुर्बान।।
आजादी की खुशियाँ मनाकर ले शपथ ये हर भारतवासी कि-
बनाएँगे देश भारतवर्ष को और भी अत्यंत महान्।
ताकि संपूर्ण विश्व में गुंजन हो बस केवल एक ही नाम
माँ भारती शीश झुकाकर बारंबार तुझे प्रणाम ।।

जय हिंद !………. जय भारत !…… जय भारतीय संस्कृति!

श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी ।
( ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )

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