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अदम्य साहस और शौर्य की बेमिसाल गौरवगाथा की अद्वितीय शख्सियत – “महाराणा प्रताप जी” जयंती विशेषांक :

स्वतंत्रता की प्रथम ज्योति प्रज्वलित करके भारत के गौरवशाली, अतीत की रक्षा के लिए एवं अपने देशवासियों को दासता के जीवन से छुटकारा दिलाकर स्वाभिमान के लिए मर-मिटने का पाठ पढ़ाने वाले स्वतंत्रता देवी- माँ भारती के अनन्य भक्त-अत्यंत महान् वीर महाराणा प्रताप जी ने कहा था कि ‘‘परतंत्र बनकर महलों में निवास और चांदी के पात्रों में भोजन करने से, कहीं ज्यादा अच्छा है जंगलों में भूमि शयन और फूल-फल पादपों और घास की रोटियाँ जिनमें स्वतंत्रता की सुगंध तो विद्यमान है।’’
इसी महान स्वतंत्र दीप से आलोकित हुआ छत्रपति शिवाजी महाराज जी का अंत:करण और अपने जीवन भर मराठा राज्य के लिए लड़ती रही अत्यंत महान् और नारी सशक्तिकरण की बेमिसाल महान् वीरांगना झाँसी की रानी- महारानी लक्ष्मीबाई जी ने भी इसी सच्चे इतिहास को पढ़कर माँ भारती की रक्षार्थ हेतु जीवन के अंतिम क्षणों तक फिरंगियों को नेस्तनाबूद करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत से युद्ध किया और ब्रिटिश सरकार के जोर जुल्म के समक्ष कभी भी आत्मसमर्पण नहीं किया। मराठा साम्राज्य व माँ भारती की रक्षार्थ हेतु नाना साहब पेशवा जी, तात्या टोपे जी, श्रीमंत बाजीराव पेशवा जी का अद्वितीय, अदम्य साहस और अविस्मरणीयता का, आक्रांताओं और फिरंगियों को नेस्तनाबूद करने का जज़्बा कभी भुलाया नहीं जा सकता। माँ भारती के इन सच्चे सपूतों से ही प्रेरित होकर वर्तमान स्वतंत्रता के प्रणेता के रूप में सर्वप्रथम श्री खुदीराम बोस ने देश की बलिवेदी का नमन किया, फिर असंख्य देशभक्तों ने इस स्वतंत्रता की वेदी पर अपने को बलिदान करते हुए गगनचुंबी जयघोष में कहा-
‘‘सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुएं कातिल में है।’’
इस पंक्ति में, महान् देशभक्त वीर रामप्रसाद बिस्मिल जी, चंद्रशेखर आजाद जी, राजगुरु जी, सुखदेव जी, सरदार भगत सिंह जी, सुभाषचंद्र बोस जी, लाल बहादुर शास्त्री जी, बंदा बहादुर जी,सरदार वल्लभभाई पटेल जी आदि खड़े हैं। इन्हें हम कभी भी विस्मृत नहीं कर सकते, अपितु राष्ट्र के युवा धन के लिए राष्ट्रभक्ति का अद्भुत, अद्वितीय और अविस्मरणीय प्रेरणास्रोत बनकर उनको हमेशा प्रेरित करते रहेंगे।
ये सब स्वतंत्रता प्रेमी अत्यंत महान् सम्राट महाराणा प्रताप जी से ही प्रेरित थे और इस बात से कदापि इंकार नहीं किया जा सकता कि स्वतंत्रता की भावना जाग्रत करने का श्रेय ‘राणा जी’ और माँ भारती की अत्यंत राष्ट्रभक्ति की अनमोल चंदन सुगंध रूपी “मेवाड़ तीर्थस्थल” को ही जाता है। जिन्होंने विदेशी मुगलिया शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता का पहला बिगुल बजाया था। “हल्दी घाटी” का युद्ध उसी प्रकार विदेशी शासन के विरुद्ध था जिस प्रकार भारत का स्वतंत्रता संग्राम। “हल्दी घाटी” का युद्ध किसी जाति अथवा वर्ग विशेष के विरुद्ध न होकर एक विदेशी हुकूमत के विरुद्ध था और उस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नायक था- “प्रणवीर- राणा प्रताप जी”। हल्दी घाटी और स्वतंत्रता संग्राम दोनों विदेशी सत्ता के विरुद्ध हुए चाहे वह मुगलिया हुकूमत हो अथवा अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध। इस प्रकार यह र्निविवाद सत्य है कि राणा प्रताप जी ही इस देश के सच्चे प्रथम स्वतंत्रता के प्रेरणा स्रोत थे। ‘अकबर’ यदि बेलगाम का तुरंग था तो चढऩे का राणा बेलगाम का सवार था। राणा जी ने भारत की सोयी हुई हिंदू जाति को उस समय जगाया था जब हम परतंत्रता के गर्त में गिर चुके थे, हमारा गौरव दिशाहीन होकर नष्ट हो रहा था ।
प्रताप पराक्रम (हल्दी घाटी)
चीघते थे हाथी हय हींसते थे बारबार
बैरियों में हल्ला सुन रल्ला मच जाता था
कट-कट रुण्ड, मुंड-झुंड झक मारते थे
झट्ट-पट्ट वीरता का झंडा गड़ जाता था।
हेकड़ों की हेकड़ी दबा के दुम भागती थी
मुगलों का सारा मदमान झड़ जाता था
लेकर स्वतंत्रता की तेज तलवार जब,
प्रणवीर प्रबल प्रताप अड़ जाता था।
उस महान स्वतंत्रता प्रेमी ने हल्दी घाटी के युद्ध में जो पराक्रम दिखाया वह स्मरणीय, वंदनीय तथा अभिनंदनीय है।
उस विभूति ने महल, अटारी, राजपाट, स्वर्णपात्र छोड़ कर सपरिवार जंगलों में रहकर घास-फूस की रोटियां, फल पत्र खाकर दिन बिताए थे और प्रतिज्ञा की थी कि जब तक देश को स्वतंत्र नहीं कर लूंगा, भीलों की तरह जीवन बिताऊंगा।
प्रताप-प्रतिज्ञा जंगलों में घूमूंगा, पहाड़ों पै करूँगा वास, जीवन की घाटियों में ऊधम मचाऊंगा।
खाने को भोजन नसीब यदि होगा नहीं, पादपों के फूल पत्र बीन-बीन खाऊंगा।
हाथ में रहेगा हथियार यदि न कोई तो खाली नखों से शत्रु आसन डिगाऊंगा।
भूखे प्राण त्याग दूंगा, बस्ती छोड़ दूंगा और हस्ती मेट दूंगा, पर शीश न झुकाऊंगा।।
चाहे भील वीर भारी बांकुरे लड़ाकू, रणक्षेत्र में दिखाएं पीठ जीवन में ख्वार हो।
विश्व की विभूति सारी शक्तियां हों एक ओर, एक ओर चेतक और मेरी तलवार हो।
माँ भारती के सच्चे सपूत व देशभक्ति के प्रेरणा स्रोत परम् श्रद्धेय राणा जी तुम्हें संपूर्ण प्राणी जगत बड़ी ही श्रद्धा से शीश झुकाकर बारंबार कोटि-कोटि नमन करता है।
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति ।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
( ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
आभार –
पंडित आर 0 के0 शर्मा जी।

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