मेरे प्रिय साथियों,
सर्वे भवन्तु सुखिन|
सर्वे संतु निरामया ||
पवित्र पावन भारतीय संस्कृति का अत्यंत वैभवशाली इतिहास संपूर्ण दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्रेरणा स्रोत हैं| इसके मूलमंत्रों में ही अत्यंत वैभवशाली मानवता के गुण छिपे हुए हैं जो सारी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शन के लिए अति महत्व पूर्ण हैं| ऐसी संस्कृति पूरी की पूरी में मिलना भी दुर्लभ हैं! यहाँ के प्रत्येक प्राणी के हृदय में राष्ट्र प्रेम की साधना के संकल्प की जड़ें बहुत गहरी हैं| और जब संकल्प के साथ साधना जुड़ जाती है, जब मानव मात्र के साथ हमारा ममभाव जुड़ जाता है, अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों के लिए ‘इदं न मम्’ यह भाव जागने लगता है, तो समझिए लीजिए, हमारे संकल्पों के जरिए एक नए कालखंड का जन्म होने वाला है, एक अति सुंदर नया सवेरा होने वाला है। सेवा और त्याग का यही अमृतभाव आज अमृत महोत्सव में नए भारत के नवनिर्माण लिए उमड़ रहा है। इसी त्याग और कर्तव्यभावना से करोड़ों देशवासी आज स्वर्णिम भारत वर्ष की नींव रख रहे हैं। मेरे प्रिय साथियों हमारे और राष्ट्र के सपने अलग-अलग नहीं हैं, हमारी निजी और राष्ट्रीय सफलताएँ अलग-अलग नहीं हैं। राष्ट्र की प्रगति में ही हमारी प्रगति है। हमसे ही हमारे प्रियतम राष्ट्र का अस्तित्व है, और राष्ट्र से ही हमारा भी अस्तित्व है। ये भाव, ये बोध नए भारत के नव निर्माण में हम भारतवासियों की सबसे बड़ी ताकत बन रहा है।
मेरे प्रिय साथियों वर्तमान में देश जो कुछ कर रहा है, सर्वोत्तम विकास के पथ की ओर बढ़ रहा है उसमें सबका अनमोल प्रयास शामिल है। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, और सबका प्रयास’ ये सब देश का मूल मंत्र बन रहा है। आज हम एक ऐसी व्यवस्था बना रहे हैं जिसमें भेदभाव की कोई जगह न हो, एक ऐसा समाज बना रहे हैं, जो समानता औऱ सामाजिक न्याय की बुनियाद पर मजबूती से खड़ा हो, हम एक ऐसे सच्चे प्रिय भारतवर्ष को उभरते देख रहे हैं, जिसकी सुंदर सोच और अप्रोच नई है, जिसके निर्णय प्रगतिशील पथ की ओर अग्रसर हैं, और सारी दुनिया को “वसुधैव कुटुंबकम” की अनमोल, अद्भुत और अविस्मरणीय शिक्षा का सच्चा मूल मंत्र दे रहा है जो श्री सत्य सनातन धर्म की अनमोल शिक्षा हैं। आज दुनिया में चहूँओर जो हो रहा वह सब अज्ञानता और अधूरी शिक्षा का ही परिणाम हैं क्योंकि सच्चे धर्म के मार्ग पर चलने वाली प्राणी अधर्म को अपने दिल में जगह नहीं दे सकता, क्योंकि सच्चे लोकतंत्र का मूलमंत्र ही राष्ट्र प्रेम/इंसानियत प्रेम से जुड़ी हुई हैं |
हमारे प्यारे भारत वर्ष की सबसे बड़ी ताकत ये है कि कैसा भी समय आए, कितना भी अंधेरा छाए, परम् पूजनीय भारत माता के सभी पुत्र अपने मूल स्वभाव को बनाए रखते है। हमारा युगों-युगों का इतिहास इस बात साक्षी है। दुनिया जब अंधकार के गहरे दौर में थी, महिलाओं को लेकर पुरानी सोच में जकड़ी हुई थी, तब भी भारत मातृशक्ति की पूजा, परम् श्रेध्य देवी जी के रूप में करता था। हमारे यहाँ गार्गी, मैत्रेयी, अनुसूया, अरुंधति और मदालसा जैसी विदुषियाँ समाज को ज्ञान देती थीं। ऐसा दुनिया में देखना भी दुर्लभ हैं, कठिनाइयों से भरे मध्यकाल में भी इस देश में परम् श्रेध्य पन्नाधाय जी और मीराबाई जी जैसी महान नारियां हुईं। और अमृत महोत्सव में देश आज जिस स्वाधीनता संग्राम के इतिहास को याद कर रहा है, उसमें भी कितनी ही महिलाओं ने अपने बलिदान दिये हैं। कित्तूर की रानी चेनम्मा जी, मतंगिनी हाजरा जी, वीरांगना व संपूर्ण समाज को नारी सशक्तिकरण का सन्देश देनेवाली महारानी लक्ष्मीबाई जी, वीरांगना झलकारी बाई जी से लेकर सामाजिक क्षेत्र में अहल्याबाई होल्कर जी और सावित्रीबाई फुले जी तक, इन परम् श्रेध्य देवियों ने भारत वर्ष की पूरी दुनिया में अद्भुत, अविस्मरणीय पहचान को बनाए रखा हैं और आज भी और हमेशा रहेगी भी।

आज देश लाखों स्वाधीनता सेनानियों के साथ आज़ादी की लड़ाई में नारीशक्ति के इस योगदान को याद कर रहा है, और उनके सपनों को पूरा करने का प्रयास कर रहा है। और इसीलिए, आज राष्ट्र के सैनिक विद्यालयों/स्कूलों में पढ़ने का बेटियों का सपना पूरा भी हो रहा है, अब देश की कोई भी बेटी, राष्ट्र-रक्षा के लिए सेना में जाकर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ उठा सकती है, महिलाओं का जीवन और करियर दोनों एक साथ चलें, इसके लिए मातृ अवकाश को बढ़ाने जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले भी किए गए हैं।
हाल के आंकड़ों से पता चला है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की सफलता से, वर्षों बाद देश में स्त्री-पुरुष का अनुपात भी बेहतर हुआ है। ये बदलाव इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि नया भारत कैसा होगा, कितना संपूर्ण विश्व में प्रगतिशील और सामर्थ्यशाली होगा।
आप सभी जानते हैं कि हमारे ऋषियों ने उपनिषदों में ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय’ की प्रार्थना की है। यानी, हम अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ें। मृत्यु से, परेशानियों से अमृत की ओर बढ़ें। अमृत और अमरत्व का रास्ता बिना ज्ञान के प्रकाशित नहीं होता। इसलिए, अमृतकाल का ये समय हमारे ज्ञान, शोध का समय है। हमें एक ऐसा परम् श्रेध्य भारत वर्ष बनाना है जिसकी जड़ें प्राचीन परम्पराओं और विरासत से जुड़ी होंगी, और जिसका विस्तार आधुनिकता के आकाश में अनंत तक होगा, और इन्हीं सच्चे विचारों से हमें अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता, अपने संस्कारों को हमेशा हमेशा के लिए जीवंत रखना है|
जय श्री राम – जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति!
“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी
(शिक्षविद्द) मुज़फ्फरनगर |
आभार –
पंडित धर्म राज यज्ञ नारायण भट्ट जी (ज्योतिषाचार्य एवं वेदपाठी )|
