[ विशेषांक: अखण्डभूमण्डलाचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्यजी जयंती महापर्व दिवस, 4 मई -2024]

परम् श्रेध्य श्रीमद वल्लभाचार्य जी का प्रादुर्भाव भारतभूमि पर उस समय हुआ जब भारतीय संस्कृति संक्रान्तिकाल से गुजर रही थी। भारतीय संस्कृति पर चारों ओर से यवनों के आक्रमण हो रहे थे। समाज में भगवान के प्रति अनास्था, संघर्ष व अशान्ति फैली हुई थी। लोगों के जीवन में आनन्द तो दूर रहा, कहीं भी न तो सुख था और न शान्ति। ऐसे समय में साक्षात् भगवदावतार श्रीमन्महाप्रभुजी श्रीमद वल्लभाचार्य जी ने अवतरित होकर भारतवासियों के जीवन को अत्यंत रसमय और आनन्दमय बना दिया! महाप्रभु श्रीमद्वल्लभाचार्यजी को “अग्नि अवतार” (वैश्वानरावतार) एवं भगवान श्रीनाथजी के वदनावतार माना गया हैं!
प्रत्येक अवतार में अद्भुत और अनमोल अलौकिकता विद्यमान रहती है। उसमें प्रादुर्भाव भी आश्चर्यजनक होता है और गमन भी आश्चर्यजनक। श्रीमद्वल्लभाचार्यजी के पूर्वज दक्षिण भारत के आन्ध्रप्रदेश में कृष्णानदी के तट पर बसे काँकरवाड़ गाँव में निवास करते थे। संपूर्ण परिवार वेद वेदांग एवं प्रकांड महाविद्वान् होने के साथ साथ चारों और विश्वविख्यात था! तीर्थंनगरी मथुरा धाम इनके पूर्वजों का गुणगान करते नहीं थकती! पवित्र मथुरा धाम, पवित्र काशी धाम में इनके पूर्वजों के अनेक विश्वविख्यात भव्य मंदिर आज भी श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति की अनमोल अविरल पवित्र एवं निर्मल गंगा धारा प्रवाहित कर रहे हैं! जय श्री राधे राधे जी! इनके पिताश्री का नाम श्रीलक्ष्मणभट्ट जी और माताश्री का नाम श्रीइलम्मागारू भट्ट जी था। वे तैलंग श्रीभट्ट ब्राह्मण वंश से थे और कृष्ण यजुर्वेद की तैतरीय शाखा के अंतर्गत इनका गोत्र भारद्वाज और सूत्र आपस्तम्ब था। परम् श्रेध्य श्रीवल्लभ जी के पूर्वज बालगोपाल की भक्ति करते थे। इनके पूर्वजों में अनेक अनमोल अवतार – श्री विष्णु स्वामी भट्ट जी, श्री गोपाल भट्ट जी, महाप्रभु विट्ठल नाथ जी, वत्सल्यरस के सम्राट महाकवी सूरदास जी, भारतीय संस्कृति के सच्चे और अनमोल धर्म रक्षक प्रकांड महाविद्वान् पंडित कुमारिल भट्ट जी, मंडन मिश्र जी, आदिजगतगुरु भगवान शांकराचार्य जी, प्रकांड महाविद्वान् महापंडित रामानुजाचार्य जी, प्रकांड महाविद्वान् माध्यवाचार्य जी अनेक संतों ने श्री सत्य सनातन धर्म की विजय पताका को सदा सदा के लिए फहराने हेतु अपना अनमोल योगदान दिया हैं! अखंडभूमण्डलाचार्य महाप्रभु श्रीमद वल्लभाचार्य जी के पिताश्री जी परम् पूज्य
श्रीलक्ष्मणभट्टजी की सातवीं पीढ़ी से सभी लोग सोमयज्ञ करते चले आ रहे थे। कहा जाता है कि जिसके वंश में सौ सोमयज्ञ पूरे हो जाते हैं, उसके कुल में श्री भगवान जी का या भगवदीय महापुरुष का आविर्भाव अवश्य होता है। ऐसे 32 सोमयज्ञ पूरे हुए तब यज्ञकुण्ड में से दिव्य वाणी प्रकट हुई कि जब 100 सोमयज्ञ पूर्ण होंगे तब आपके कुल में साक्षात् श्रीपुरुषोत्तम प्रकट होंगे। श्रीलक्ष्मणभट्टजी के समय में 100 सोमयज्ञ पूर्ण होने से श्रीमद्वल्लभाचार्यजी के रूप में श्री भगवान आपके यहां प्रकट हुए। इनके जन्म के विषय में कहा जाता है कि ज़ब इनके पिताश्री प्रकांड महापंडित श्रीलक्ष्मणभट्टजी तीर्थयात्रा के लिए उत्तर भारत का भ्रमण कर रहे थे। तीर्थ नगरी काशी पर यवनों का आक्रमण होने के कारण वे काशी छोड़कर अपने यात्रा दल के साथ मध्यप्रदेश के चम्पारण्य (अब देश के छत्तीसगढ़ राज्य में हैं!) नामक स्थान पर पहुँचे। वहां इनकी माता श्रीइलम्मागारू भट्ट जी को प्रसववेदना हुई। वे वहीं एक अरण्य में रुक गये। वहां विक्रम संवत 1535 ई0 वैशाख श्रीकृष्ण एकादशी शनिवार को एक शमी वृक्ष के नीचे सात माह का बालक प्रकट हुआ। बालक को चेष्टाविहीन देखकर माता-पिताश्री ने उन्हें मृत समझकर पत्तों में लपेटकर शमीवृक्ष के कोटर में रख दिया और आगे चौड़ा गांव चले गये। वहां रात्रि में उन्हें स्वप्न में ज्ञात हुआ कि जिस नवजात शिशु को मृत समझकर पत्तों में लपेटकर अरण्य में छोड़ आये हैं, वह तो सौ सोमयज्ञों के बाद होने वाले श्री भगवान जी का प्राकट्य है। वे पुन: लौटकर चम्पारण्य आये। परमपूज्य माताश्री श्रीइलम्मागारू भट्ट जी अपने परम् श्रेध्य पतिश्री को साथ लेकर शमीवृक्ष के पास पहुँची तो देखा कि एक सुन्दर बालक सकुशल अग्निदेव जी के घेरे में खेल रहा है। इस अनमोल प्रतिभारूपी और अद्भुत बालक की अविस्मरणीय सुन्दरता मन को अत्यंत गहराई तक मोह रही थी। परमपूज्य माताश्री उसे लेने आगे बढ़ी तो “अग्निदेव” जी ने अविलम्ब रास्ता दे दिया। तत्क्षण माताश्री जी ने अनमोल रत्न बालक स्वरूप को गोद में उठा लिया। वही अद्भुत और अनमोल रत्न रूपी बालक आगे चलकर श्रीमन्महाप्रभु श्रीमद्वल्लभाचार्यजी के नाम से जगत प्रसिद्ध हुआ। ऐसे अनमोल प्रतिभारूपी अनमोल रत्न को स्वयं “अग्निदेव” जी ने प्रकट होकर महापंडित श्रीलक्ष्मणभट्टजी से कहा कि मैं ही तुम्हारे पुत्ररूप में प्रकट हुआ हूँ। इसीलिए परम् पूज्य श्रीमद्वल्लभाचार्यजी पुष्टिसम्प्रदाय में वैश्वानरावतार माने जाते हैं।
एक अन्य आश्चर्यजनक बात यह है कि जब चम्पारण्य में परम् श्रेध्य एवं परमपूजनीय माँ श्रीइलम्मागारू भट्ट जी की कोख से श्रीमद्वल्लभाचार्यजी का प्रादुर्भाव हुआ; ठीक उसी दिन, उसी समय श्रीगोवर्धन पर्वत पर प्रभु श्रीनाथजी के मुखारविन्द का प्राकट्य हुआ। इसीलिएश्रीमद्वल्लभाचार्यजी को प्रभु श्रीनाथजी का ‘वदनावतार’ कहा गया है। भक्त सगुणदास ने भी ‘प्रगटे जान पूरन पुरुषोत्तम’ कहकर आपके अवतार की भलीभांति रूप से पुष्टि की है।
प्रगटे कृष्णानन द्विज रूप।
माधव मास कृष्ण एकादशी आये अग्नि सरूप।
दैवी जीव उद्धारण कारण आनन्दमय रस रूप।
वल्लभ प्रभु गिरिधर प्रभु दोऊ तेई एई एक स्वरूप।।
भारतीय संस्कृति के इस अनमोल महापर्व “अखण्डभूमण्डलाचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य जी जयंती” पर समस्त प्राणिजगत बड़ी श्रद्धा से शीश झुकाकर कोटि कोटि नमन करता हैं!
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति!
“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी
(वेदपाठी -ज्योतिषचार्य ).
आभार –
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी
(शिक्षाविद )
लक्ष्मीनगर (मुज़फ्फरनगर )!
