[अखंड भूमंडलाचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य जी जयंती विशेषांक]

卐ॐ श्री सत्य सनातन धर्म की जय ॐ卐
सृष्टि के पालनहार भगवान श्री कृष्ण भक्त अखंड भूमंडलाचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की जयंती वैशाख कृष्ण एकादशी के दिन बड़े हर्षोल्लास से मनाई जाती है। इस पवित्र पावन दिवस को वरूथिनी एकादशी भी कहा जाता है। श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के महान् धर्मावलंबी परम् श्रद्धेय पंडित पिताश्री लक्ष्मण ‘भट्ट’ जी दीक्षित और भारतीय संस्कृति में अटूट श्रद्धा रखनेवाली अत्यंत महान् साध्वी देवी व परम् श्रद्धेय माता इलम्मागारू जी के यहाँ उच्च ब्राह्मण वंश में जन्मे वल्लभाचार्य जी का अधिकांश समय भारतीय संस्कृति के अति श्रेष्ठ धाम परम् श्रद्धेय बाबा भोले नाथ जी की काशी नगरी, प्रयागराज नगरी और पवित्र पावन धाम वृंदावन नगरी में ही बीता। उनकी पत्नी का नाम देवी महालक्ष्मी जी और उनके दो उत्कृष्ट भारतीय संस्कृति से सरोबार सुपुत्र पंडित थेगोपीनाथ भट्ट जी तथा पंडित विट्ठलनाथ भट्ट जी दीक्षित। जब इनके परम् पूज्य माता-पिता उत्तर की ओर से दक्षिण भारत जा रहे थे तब रास्ते में छत्तीसगढ़ के रायपुर नगर के पास चम्पारण्य में वर्ष 1479 ईस्वी0 में उत्कृष्ट प्रतिभा संपन्न बालक वल्लभाचार्य का जन्म हुआ। बाद में श्री सत्य सनातन धर्म नगरी काशी में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई और वहीं उन्होंने अपने मत का उपदेश भी दिया। ‘रुद्र सम्प्रदाय’ के परम् पूज्य विल्व मंगलाचार्य जी द्वारा इन्हें अष्टदशाक्षर गोपाल मंत्र की दीक्षा दी गई और त्रिदंड संन्यास की दीक्षा परम् श्रद्धेय स्वामी नारायणेंद्र तीर्थ जी से प्राप्त हुई।
संत शिरोमणि, ईश्वरीय साधना के प्रचारक, महान्
दर्शनशास्त्री, “स्वामी अखंड भूमंडलाचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य जी“ की जयंती पर संपूर्ण प्राणी जगत का शत–शत नमन।
इनका संपूर्ण परिवार श्री सत्य सनातन धर्म का अटूट धर्मावलंबी था तथा पारिवारिक धर्मावलंबी प्राणियों को सौ सोमयज्ञ करने का वैभवशाली गौरव प्राप्त था। कहते है कि सौ सोमयज्ञ पूर्ण होने पर भगवान श्रीकृष्ण जी ने इन्हें स्वयंरूप दर्शन दिए थे। कालान्तर में महान् सम्राट कृष्णदेव राय जी ने अपनी सभा में उच्च कोटि के महान् संतों के धर्म-शास्रार्थ का आयोजन कराया जिसमे परम् श्रद्धेय वल्लभाचार्य दीक्षित भट्ट जी ने सभा में उपस्थित सभी उच्चतम कोटि के महाविद्वानों को पराजित किया और प्रसन्न होकर सम्राट कृष्णदेव राय जी ने बड़ी श्रद्धा से परम् श्रद्धेय वल्लभाचार्य दीक्षित “भट्ट” जी को सोने के सिंहासन पर बैठा कर “वैष्णवाचार्य” की उत्कृष्टीय उपाधि व भारी-भरकम धनराशि के साथ भरी सभा में अलंकृत किया, इसका बहुत सूक्ष्म सा भाग ग्रहण कर शेष राशि को उन्होंने समस्त ब्राह्मणों में वितरित कर दिया। विश्व में लोग उन्हें “अग्निदेव” का अवतार मानते है।
उनके प्रमुख परम् आदर्श शिष्य- ऐसा माना जाता है कि अखंड भूमंडलाचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य ‘भट्ट’ जी दीक्षित के 84 शिष्य थे। जिनमें श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के महान् विशिष्ट प्रचारक अत्यंत महान् संत महाकवि सूरदास जी, कृष्णदास जी , कुम्भन दास जी व परमानंद दास जी प्रमुख हैं। कहते हैं कि वात्सल्य रस के अत्यंत महान् सम्राट संत सूरदास जी दुनिया को कभी न मिलते यदि उनकी भेंट अखंड भूमंडलाचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य जी दीक्षित से न होती। उन्होंने ही साधारण से सूरदास को वात्सल्य रस का अत्यंत महान् सम्राट और श्री कृष्ण भक्ति का अटूट मार्ग बताकर वैष्णव धर्म का अत्यंत महान् संत और विश्व में श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति का विश्वप्रसिद्ध प्रचारक रूपी ध्रुव तारा बना दिया।
जीव ही ब्रह्म है- महान् पंडित
वल्लभाचार्य ‘भट्ट’ दीक्षित जी के अनुसार जीव ही ‘ब्रह्म’ है। श्रीकृष्ण को ही ‘ब्रह्म’ का स्वरूप मानना उनके प्रति समर्पण है। परम् श्रद्धेय एवं परमपूजनीय वल्लभाचार्य जी ने इस मार्ग को पुष्टि दी और सारी दुनिया व देश में श्रीकृष्ण भक्ति की धारा प्रवाहित की। आदर्श पंडित वल्लभाचार्य ‘भट्ट’ दीक्षित जी के अनुसार तीन ही तत्व हैं- 1- ‘ब्रह्म’ 2- ‘ब्रह्मांड’ और 3- ‘आत्मा’ । अर्थात ‘ईश्वर’, ‘जगत’ और ‘जीव’। उक्त तीन तत्वों को केंद्र में रख कर ही उन्होंने जगत और जीव के प्रकार बताए और इनके परस्पर संबंधों का खुलासा किया।
उनके अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य, सर्वव्यापक और अंतर्यामी है। श्रीकृष्ण भक्त होने के नाते उन्होंने श्रीकृष्ण को ब्रह्म मानकर उनकी महिमा का वर्णन किया है। परम् श्रद्धेय प्रकांड महाविद्वान वल्लभाचार्य “भट्ट” दीक्षित जी के अद्वैतवाद में माया का संबंध अस्वीकार करते हुए ब्रह्म को कारण और जीव जगत को उसके कार्य रूप में वर्णित किया गया है।
प्रसिद्ध ग्रंथ- ब्रह्मसूत्र पर ‘अणुभाष्य’ जिसे ‘ब्रह्मसूत्र भाष्य’ अथवा ‘उत्तरमीमांसा’ भी कहते हैं, श्रीमद् भागवत पर ‘सुबोधिनी टीका’ और ‘तत्वार्थदीप निबंध’ उनके द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। इसके अलावा भी उनके अनेक ग्रंथ हैं। सगुण और निर्गुण भक्ति धारा के दौर में वल्लभाचार्य जी ने अपना दर्शन खुद गढ़ा था लेकिन उसके मूल सूत्र वेदांत में ही निहित हैं। उन्होंने रुद्र सम्प्रदाय के प्रवर्तक विष्णु स्वामी के दर्शन का अनुसरण तथा विकास करके अपना ‘शुद्धद्वैत’ मत या ‘पुष्टिमार्ग’ स्थापित किया था।
महाप्रभु की 84 बैठकें- परम् पूज्यनीय श्री वल्लभाचार्य जी ने अपनी यात्राओं में जहाँ श्रीमद्भागवत का प्रवचन किया अथवा जिन स्थानों का उन्होंने विशेष माहात्म्य बतलाया था, वहाँ उनकी बैठकें बनी हुई हैं जो संपूर्ण देश-दुनिया में ‘आचार्य महाप्रभु जी की बैठकें’ कहलाती हैं। समस्त देश में फैली हुई ‘वल्लभ सम्प्रदाय’ की ये बैठकें मन्दिर-देवालयों की भाँति ही अति पवित्र व दर्शनीय मानी जाती हैं जिनकी संख्या 84 है। इनमें से 24 बैठकें ब्रजमंडल में ब्रज चौरासी कोस की यात्रा के विविध स्थानों में बनी हुई हैं।
जल समाधि- 52 वर्ष की आयु में सन् 1531ई0 में धर्म नगरी काशी में हनुमानघाट पर गंगा में प्रविष्ट होकर जल समाधि लेकर वह ब्रह्म में विलीन हो गए। संत शिरोमणि, ईश्वरीय साधना के प्रचारक, महान दर्शनशास्त्री, “अखंड भूमंडलाचार्य महाप्रभु स्वामी वल्लभाचार्य जी“ की जयंती पर संपूर्ण प्राणी जगत बड़ी श्रद्धापूर्वक शत–शत नमन करता है। श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय!
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
आभार-
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी। ( शिक्षाविद् )।
