धर्म संसारः धर्मो रक्षति रक्षितः!

पंडित राकेश कुमार कौशिक जी की कलम से-

विशेषांक : नीति, न्याय और अविस्मरणीय नेतृत्व का अद्भुत संगम- मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी ।

भारतवर्ष में श्रीराम एक ऐसा नाम है जो अभिवादन या नमस्कार का पर्यायवाची है। माँ भारती के अद्वितीय सिरमौर मुकुट हिमालय से तीर्थ स्थल कन्याकुमारी तक ही नहीं अपितु सुदूर पूर्व के अनेकों देशों में भी श्रीराम जी और श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के महान् विशिष्ट ग्रंथ श्रीरामायण असाधारण श्रद्धा के केंद्र बिंदु हैं। श्री राम जी प्रतिनिधित्व करतें हैं मानवीय मूल्यों की मर्यादा का।
श्री रामकथा के सैकड़ों संस्करण हैं जिनके लेखकों को श्रीराम के ईश्वरत्व पर पूर्ण विश्वास था लेकिन उन सब ने श्री राम जी का चित्रण एक अति पवित्र पावन मानव के रूप में ही किया है। जो संपूर्ण समाज की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरता है और अनेक प्रकार के कष्ट भी सहन करता है। ऐसा रूप कोई साधारण मानव नहीं अपितु कोई परम् श्रद्धेय ईष्ट ही हो सकता है। जय श्रीराम- जय श्रीराम।

परम् श्रद्धेय चक्रवर्ती सम्राट के सुपुत्र हैं श्रीराम, पर गुरुकुल या वनवास की सभी समस्त मर्यादाओं का पालन करते हैं।

परम् पूज्यनीय माता एवं विमाताओं में कोई भेद नहीं और भाइयों से प्रेम की कोई सीमा नहीं।
 
पूरी दुनिया अर्थात् समस्त प्रजा की आँखों के अति प्रिय तारे हैं और पराक्रम की कोई तुलना नहीं है। जय श्रीराम – जय श्रीराम ।

सबसे महत्वपूर्ण बात कि वे राज्याभिषेक के समाचार से प्रसन्न नहीं होते और वनवास के दुःख का उन पर लेशमात्र भी प्रभाव नहीं है। ‘सम्पतौ च विपत्तौ च महतां एक रूपता’ के साक्षात् सारी दुनिया के सबसे श्रेष्ठतम् उदाहरण हैं- श्रीराम। सारा पराक्रम स्वयं का है लेकिन वे इसका श्रेय अपने अनुज भ्राता लक्ष्मण को व समस्त वानरों और अपनी सेना को देते हैं। अत्यंत कुलीन होने के बाद भी शबरी जी, निषाद जी, केवट जी से अति अगाध प्रेम है। श्रीराम जी जाति वर्ग से परे हैं। नर हों या वानर, मानव हों या दानव सभी से उनका करीबी रिश्ता है।
 
क्षमाशील इतने हैं कि राक्षसों को भी मुक्ति देने में तत्पर हैं। वे यह सिखाते हैं कि बिना छल-कपट के मानव अपना जीवन यापन ही नहीं कर सकता अपितु ईश्वरत्व को भी प्राप्त कर सकता है। “नरो नारायणो भवेत्” को उन्होंने ऐसा प्रमाणित कर  दिया है कि आज उनका नाम ही “पतित पावन” हो गया है। सब बड़े प्रेम से मिलकर बोलिए -जय श्रीराम – जय श्रीराम ।
 
राम सिर्फ दो अक्षर का नाम नहीं, राम तो प्रत्येक प्राणी में रमा हुआ है, राम चेतना और सजीवता का प्रमाण है। अगर राम नहीं तो जीवन मरा है।

श्रीराम श्रीभगवान विष्णु जी के सातवें अवतार माने जाते हैं। भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, प्रियतम नीति, लोकतांत्रिक मूल्यों और संयम का अद्भुत नाम श्रीराम है। असीम ताकत अहंकार को जन्म देती है। लेकिन अपार शक्ति के बावजूद भी श्रीराम संयमित हैं।
 
वे सामाजिक हैं, लोकतांत्रिक हैं। वे मानवीय करुणा जानते हैं। वे मानते हैं-
“पर हित सरिस धरम नहीं भाई..
श्रीराम जी देश की एकता और अखंडता के श्रेष्ठतम् प्रतीक हैं। महात्मा गाँधी जी ने श्रीराम जी के जरिए ही अपने प्रियतम राष्ट्र हिंदुस्तान के सामने एक मर्यादित तस्वीर को प्रस्तुत किया है। गाँधी जी उस श्रीराम राज्य के हिमायती थे, जहाँ लोकहित सर्वोपरि हो। इसीलिए लोहिया परम् श्रद्धेय भारत माँ से माँगते हैं कि- “हे भारत माता हमें श्री शिव का मस्तिष्क दो, श्रीकृष्ण का हृदय दो और श्रीराम जी का कर्म और वचन दो।”
 
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम समसामयिक है।भारतीय जनमानस के रोम-रोम में बसे श्रीराम की महिमा अपरंपार है… … …
 
एक श्रीराम चक्रवर्ती सम्राट महाराजा दशरथ का बेटा,

एक श्रीराम घर-घर में बैठा,

एक श्रीराम का सकल
पसारा,

एक श्रीराम सारे जग से न्यारा।
 
श्रीराम जी का जीवन आम आदमी का जीवन है। आम आदमी की मुश्किल उनकी मुश्किल है। जब श्रीराम जी अयोध्या से चले तो साथ में परम् श्रद्धेय जगतजननी माँ जगदंबा जी अर्थात् माता सीता जी और अनुज भ्राता लक्ष्मण जी थे और जब लौटे तो पूरी सेना के साथ। एक साम्राज्य को नष्ट कर और एक साम्राज्य का नवनिर्माण करके।
श्रीराम जी अगम हैं संसार के कण-कण में विराजते हैं।सगुण भी हैं निर्गुण भी। तभी तो महासंत महाकवि कबीरदास जी कहते हैं-

“निर्गुण राम जपहुं रे भाई!”

आदिकवि ने उनके संबंध में लिखा है कि वे गाम्भीर्य में उदधि (सागर) के समान और धैर्य में हिमालय के समान हैं। श्रीराम जी के चरित्र में पग-पग पर मर्यादा, त्याग, प्रेम और लोकव्यवहार के अति पवित्र दर्शन होते हैं। उनका पवित्र चरित्र संपूर्ण लोकतंत्र का श्रेष्ठतम् प्रहरी, उत्प्रेरक और निर्माता भी है।

“राम” सिर्फ एक नाम नहीं हैं और न ही सिर्फ एक मानव! शक्ति हैं- श्रीराम परम शक्ति हैं। सब प्रेम से मिलकर बोलिए- जय श्रीराम -जय श्रीराम।

 इसीलिए तो भगवान श्रीराम के आदर्शों का जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव है और युगों-युगों तक रहेगा।
 
हमारी अंतिम यात्रा के समय भी इसी अति पवित्र पावन “राम नाम सत्य है!” के घोष ने हमारी जीवनयात्रा पूर्ण की होती है और कौन नहीं जानता आखिर बापू ने अंत समय में “हे राम” किनके लिए पुकारा था।

हिंदी – हिंदू – हिंदुस्तान! मिलकर बोलिए – जय श्रीराम।
 
श्रीराम नाम उर मैं गहिओ जा कै सम नहीं कोई।।
जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुम्हारे होई।।
 
जिनके अति सुंदर नाम को हृदय में बसा लेने मात्र से सारे काम पूर्ण हो जाते हैं। जिनके समान कोई दूजा नाम नहीं है। जिनके स्मरण मात्र से सारे संकट मिट जाते हैं। ऐसे श्री प्रभु हैं-
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी।

अपनी संस्कृति – अपना धाम!
सब मिलकर बोलिए- जय श्रीराम!!

“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
( ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ।

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