[विशेषांक- व्यक्तित्व के जीवन में “मर्यादा” की भूमिका ?]

पंडित राकेश कुमार कौशिक जी की कलम से –
मेरे प्रिय देशवासियों क्या आप जानते हैं कि-
“मर्यादा भंग करने से अपने साथ अपनों का मूल्य भी गिर जाता है, जैसे शून्य संख्या के पीछे बहुत ही मूल्यवान होती है,
परंतु आगे लगते ही अपने साथ वाली संख्या का मूल्य भी तुरंत गिरा देती है।”
मर्यादा की बात करें तो मर्यादा पालन करना हर इंसान के लिए जीवन में बहुत ही अनिवार्य है, क्योंकि मर्यादा को भंग करने से या नियमों की अनदेखी करने से इंसान के जीवन में अनेकों प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिसके कारण जीवन निर्वाह बहुत कठिन हो जाता है।
तो आईये प्रिय देशवासियों आज की चर्चा इसी बात पर करते हैं कि क्या मर्यादा पालन से व्यक्ति महान् बनता है?
मेरी अंतरात्मा का मानना है कि यह बिल्कुल सत्य है, ऐसा ही पौराणिक ग्रंथों/महाग्रंथो की भी मान्यता है कि मर्यादा पालन से व्यक्ति महान् बनता है जब चक्रवर्ती सम्राट परम् श्रद्धेय महाराजा दशरथ जी के ज्येष्ठ सुपुत्र श्री रामचन्द्रजी ने मर्यादा का पालन किया तो उसके बाद ही उन्हे इतनी बड़ी “मर्यादा पूरूषोतम” की अत्यंत सर्वश्रेष्ठ उपाधि मिली यानी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी कहलाए। जय श्रीराम!
यही नहीं जीवन निर्वाह के नियमों को संतुलन में रखने वाली निधारित रेखा को भी मर्यादा कहा जाता है जिससे जीवन में किसी प्रकार का असंतुलन न हो ऐसे नियमों की निधारित रेखा को ही मर्यादा कहा जाता है फिर क्यों न व्यक्ति महान् होगा जब वो हर कार्य नियमों के अनुसार ही करेगा।
जब जब किसी भी व्यक्ति ने मर्यादा को भंग किया तब तब ही उसे अति कष्ट सहना पड़े और वह अकेला पड़ गया।
अक्सर देखा गया है कि जो लोग नियमों का पालन करते हैं उनका जीवन परम् सुख एवं अति आनंदमय होता है।
जब मनुष्य अपने जीवन को मर्यादित बना लेता है तो उसका जीवन काल मर्यादित हो जाता है और वो उत्कृष्ट सुख शान्ति अनुभव करता है।
देखा जाए मनुष्य क्रियाशील प्राणी है इसलिए इसे सारे कार्य मर्यादा में रह कर ही करने चाहिए, ताकि किसी भी कार्य में रूकावट न आए व नियमपूर्वक हो।
प्राकृतिक नियम के अनुसार हर चीज की मर्यादा होती है जब हम तनिक भी इससे भटक जाते है, तो हमें घोर संकट का सामना करना पड़ता है।
देखा जाए मनुष्य अपने कर्मों से महान् बनता है खासकर आदर्श और मर्यादा से ही व्यक्ति महान् बनता है।
मर्यादा पूरूषोतम भगवान श्री राम जी ने अपने कर्तव्यों को कभी नहीं भूलाया तभी तो उनका नाम अजर अमर है और वो एक महान् पुरुष ही नहीं बल्कि भगवान के रूप में माने जाते हैं।
अंत में, मैं यही कहूँगा कि मर्यादा का पालन करने से व्यक्ति महान् ही नहीं बन सकता वह भगवान तक की उपादि धारण कर सकता है। अपने मर्यादा बंधन के कारण ही महावीर जी – परम् श्रद्धेय एवं परमपूजनीय श्री भगवान महावीर जी के विशिष्ट नाम से विश्वविख्यात हुए।
चाहे मर्यादा रिश्तों में हो नियमों हो या कार्यों में हो इसको निभाना चाहिए, मर्यादा रखना जिन्दगी में बंधन नहीं बल्कि व्यवस्थित रूप से जीने की एक अति विशिष्ट कला है।
जब जब कोई भी अपनी मर्यादा से बाहर गया तब तब उसको हानि ही हुई।
किसी ने सच ही कहा है-
बोलने में मर्यादा मत छोड़ना
गालियाँ देना तो कायरों का काम है।
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति।
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी।( शिक्षाविद् )।
आभार- पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
( ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ।
