पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी की कलम से –

[ विशेषांक – परम् श्रद्धेय एवं परमपूजनीय श्रीराम जी का चरित्र वस्तुतः आदर्श धर्मात्मा का जीवन चरित्र है। इसीलिए कहा जाता है – मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी की सदा जय!]
परम् श्रद्धेय एवं परमपूजनीय श्रीरामचंद्र जी अयोध्या नगरी के अत्यंत महान् सम्राट थे। वे बड़े ही प्रतापी, सहनशील, धर्मात्मा, प्रजापालक, निष्पाप, निष्कलंक थे। उन्हें “मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी” भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने मानव कल्याण एवं समाज के लिए सर्वश्रेष्ठ आदर्श व्यवहार की मर्यादाएं स्थापित कीं। वे आज से लगभग नौ लाख वर्ष पूर्व त्रेतायुग के अंत में अवतरित हुए थे। उनके समकालीन आदिकवि एवं ब्रह्मऋषि वाल्मीकि जी ने संपूर्ण संसार की सर्वश्रेष्ठतम संस्कृति श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अभीष्ट पवित्र पावन ग्रंथ श्री वाल्मीकि रामायण ग्रंथ में सृष्टि के पालनहार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी का जीवनचरित्र बड़े ही मनभावन रूप में प्रस्तुत किया है।
ब्रह्मऋषि वाल्मीकि जी अपने आश्रम में बैठे थे। घूमते हुए ब्रह्मज्ञानी नारद मुनि जी वहाँ आ पहुँचे। तब ब्रह्मऋषि वाल्मीकि जी ने ब्रह्मर्षि नारद जी से पूछा? इस संसार में वीर, धर्म को जानने वाला, कृतज्ञ, सत्यवादी, सच्चरित्र, सब प्राणियों का हितकारी, सर्वश्रेष्ठ विद्वान, उत्तम कार्य करने में समर्थ, सब के लिए प्रिय दर्शन वाला, जितेन्द्रिय, क्रोध को जीतने वाला, तेजस्वी, ईर्ष्या न करने वाला, युद्ध में क्रोध आने पर देव भी जिससे भयभीत हों ऐसा मनुष्य कौन है, यह जानने की मुझे उत्सुकता है। तब ब्रह्मऋषि परम् ज्ञानी नारद मुनि जी ने ऐसे बहुत से दुर्लभ गुणों वाले श्री राम जी का वृत्तांत अति सुंदर तरीके से सुनाया।
चक्रवर्ती सम्राट एवं परम् श्रद्धेय महाराजा दशरथ ने श्री राम को युवराज बनाने का अपना विचार सारी परिषत् के सामने रखा। तब परिषत् ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन करते हुए श्री राम जी के गुणों का वर्णन इस प्रकार किया “प्रजा को सुख देने में श्री राम जी चन्द्रमा के तुल्य हैं, वे धर्मज्ञ, सत्यवादी, शीलयुक्त, ईर्ष्या से रहित, शान्त-स्वभाव, दुखियों को सान्त्वचना देने वाले, मधुरभाषी, कृतज्ञ, और जितेन्द्रिय हैं। … मनुष्यों पर कोई आपत्ति आने पर वे स्वयं दुःखी होते हैं और उत्सव के समय पिता की भाँति अति प्रसन्न होते हैं। …. उनका क्रोध और प्रसन्नता कभी निरर्थक नहीं होती। वे मारने योग्य को मारते हैं और निर्दोषों पर कभी क्रोध नहीं करते।”
श्री राम जी के गुणों का वर्णन माता कैकेयी जी ने स्वयं किया है। जब श्रीराम जी को राजतिलक देने का निर्णय हुआ तब सभी को अत्यन्त प्रसन्नता हुई। माता कैकेयी जी को यह समाचार उसकी दासी ने जाकर दिया। तब कैकेयी आनन्द विभोर हो गई और अपना एक बहुमुल्य हार कुब्जा को देकर कहने लगी-‘‘हे मथरे! तूने यह अत्यन्त आनन्ददायक समाचार सुनाया है। इसके बदले में मैं तुम्हें और क्या दूँ।” परन्तु मन्थरा ने द्वेष से भरकर कहा कि श्री राम जी के सम्राट बनने से तेरा, भरत का और मेरा हित न होगा। तब माता कैकेयी जी श्री राम जी के गुणों का वर्णन करती हुई कहती है- ‘‘राम धर्मज्ञ, गुणवान्, जितेन्द्रिय, सत्यवादी और पवित्र हैं तथा बड़े पुत्र होने के कारण वे ही राज्य के सर्वश्रेष्ठतम् अधिकारी हैं। श्री राम जी अपने भाईयों और सेवकों का अपनी सन्तान की तरह पालन करते हैं।”
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी की महत्ता ब्रह्मर्षि वसिष्ठ जी के शब्दों में भी जानिए–
आहूतस्याभिषेकाय विसृष्टस्य वनाय च।
न मया लक्षितस्तस्य स्वल्पोऽप्याकारविभ्रमः।। (श्री वाल्मीकिजी रामायण)
भावार्थ- राज्याभिषेक के लिए बुलाए गए और वन के लिए विदा किए गए श्री राम जी के मुख के आकार में मैंने कोई भी अन्तर नहीं देखा। राज्याभिषेक के अवसर पर उनके मुख मण्डल पर कोई प्रसन्नता नहीं थी और वनवास के दुःखों से उनके चेहरे पर शोक की रेखाएँ नहीं थी।
उदये सविता रक्तो रक्तरचास्तमये तथा।
सम्पत्तौ च विपत्तौ न महतामेकरूपता।।
भावार्थ- सूर्य उदय होता हुआ लाल होता है और अस्त होता हुआ भी लाल होता है। इसी प्रकार महापुरुष सम्पत्ति और विपत्ति में समान ही रहते हैं। सम्पत्ति प्राप्त होने पर हर्षित नहीं होते और विपत्ति पड़़ने पर दुःखी नहीं होते।
वन को जाते हुए श्री राम अयोध्यावासियों से कहते हैं-‘‘आप लोगों का मेरे प्रति जो प्रेम तथा सम्मान है, मुझे प्रसन्नता तभी होगी यदि आप मेरे प्रति किया जाने वाला व्यवहार ही भ्राता भरत के प्रति भी करेंगे।”
अपने नाना के यहाँ से अयोध्या लौटने पर जब भरत जी और शत्रुघ्न जी को पता लगा कि सारे पाप की जड़ मन्थरा है, तब शत्रुघ्न को उस पर बहुत क्रोध आया और उसने मन्थरा को पकड़ लिया और उसे भूमि पर पटक कर घसीटने लगे। तब परम् ज्ञानी परम् श्रद्धेय भरत जी ने कहा– यदि इस कुब्जा के मारने का पता श्री राम जी को चल गया तो वह धर्मात्मा हम दोनों से बात तक न करेंगे। यह थी श्रीराम जी की अनमोल महत्ता। सभी बड़ी श्रद्धा से शीश झुकाकर बारंबार बोलिए – मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी की सदा जय! श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय!
परम् श्रद्धेय श्री हनुमान जी अशोक वाटिका में परम् श्रद्धेय एवं परम् पूजनीय माता सीता जी से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी की बाबत कहते हैं-
यजुर्वेदविनीतश्च वेदविद्भिः सुपूजितः।
धनुर्वेदे च वेदे च वेदांगेषु च निष्ठितः।।
भावार्थ- श्री रामचन्द्र जी यजुर्वेद में पारंगत हैं, बड़े-बड़े ऋषि भी इसके लिए उनको मानते अर्थात् आदर देते हैं तथा वे धनुर्वेद और वेद वेदांगों में भी महाप्रवीण हैं। यह वेद-वेदांगों में प्रवीण होना उनके ऋषि होने का भी अद्भुत, अद्वितीय और अविस्मरणीय सच्चा प्रमाण है।
श्री रामराज्य का वर्णन करते हुए श्री वाल्मीकि जी रामायण में बताया गया है–
निर्दस्युरभवल्लोको नानर्थं कश्चिदस्पृशत्।
न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते।।
भावार्थ – राज्य भर में चोरों, डाकुओं और लुटेरों का कहीं नाम तक न था। दूसरे के धन को कोई छूता तक न था। श्री राम जी के शासन काल में किसी वृद्ध ने किसी बालक का मृतक संस्कार (प्रेत कार्य) नहीं किया था अर्थात् राजा राम जी के समय में बाल मृत्यु नहीं होती थी।
सर्वं मुदितमेवासीत्सर्वो धर्मपरोऽभवत्। राममेवानुपश्यन्तो नाभ्यहिंसन्परस्परम्।।
भावार्थ– रामराज्य में सब अपने-अपने वर्णानुसार धर्म कार्यों में तत्पर रहते थे। इसलिए सब लोग सदा सुप्रसन्न रहते थे। राम दुःखी होंगे इस विचार से प्रजाजन परस्पर एक दूसरे को दुःख नहीं देते थे।
श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम थे। वह युगपुरुष, आदर्श राजा, ईश्वरभक्त, मातृ-पितृ-भक्त, आदर्श भाई-पुत्र-शिष्य-प्रजापालक आदि सर्वगुणो से शुशोभित थे। वह धर्म के साक्षात् रूप थे। हमें रामायण व महाभारत आदि इतिहास के प्राचीन ग्रन्थों को पढ़कर श्री राम जी व योगेश्वर श्री कृष्ण जी सहित अन्यान्य महापुरुषों के गुणों को अपने जीवन में धारण करना है। इनके जीवन के अनुरुप जीवन बनाना हमारे जीवन के लिए शुभ कल्याणकारी है। संपूर्ण संसार की सर्वश्रेष्ठतम संस्कृति अर्थात् समस्त सनातन धर्मावलंबी अपने शिशुओं को श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति संबंधी शिक्षा से अवश्य जागरूक कराए। प्रेम से बोलिए – जय श्रीराम – जय श्रीराम- जय श्रीराम!
श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय!
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )
आभार –
पंडित आर. के. कौशिक जी। (शिक्षाविद् )।
