धर्म-संसारः धर्मो रक्षति रक्षितः।

[ॐ श्रीभगवान गणेशजी चतुर्थी महोत्सव महापर्व विशेषांक:18.09.2023]

ॐ पौराणिक तथ्यों के आधार पर अति प्राचीन एवं अति पवित्र तथा संपूर्ण संसार की सर्वश्रेष्ठतम संस्कृति श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति अर्थात् हिंदू धर्म संस्कृति हैं। भारतीय धर्म और संस्कृति में परम् श्रद्धेय श्री भगवान गणेश जी सर्वप्रथम परम् पूजनीय, वंदनीय एवं परम् श्रद्धेय हैं। उनकी पूजा-अर्चना के बगैर कोई भी मंगल कार्य शुरू नहीं होता। यदि कोई उनकी पूजा-अर्चना के बगैर कार्य शुरू कर देता है तो किसी न किसी प्रकार के विघ्न आते ही हैं। सभी धर्मों में श्रीगणेश जी की किसी न किसी रूप में पूजा-अर्चना या उनका आह्वान बहुत ही परम् श्रद्धा और अति हर्षोल्लास किया ही जाता है।

परम् श्रद्धेय श्रीभगवान गणेश जी चतुर्थी महापर्व वर्ष 2023 की तिथि:

श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अंतर्गत हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 18 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 39 मिनट से शुभ- आरंभ होगी और 19 सितंबर को दोपहर 01 बजकर 43 मिनट पर समाप्त होगी। उदयातिथि मान्य होने के कारण इस साल श्रीभगवान गणेशजी चतुर्थी का पावन महापर्व 19 सितंबर 2023, दिन- मंगलवार को अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।

श्री भगवान गणेश जी की पूजा-अर्चना में उनके खास मंत्रों का जप करने से पूजा जल्दी सफल हो सकती है। यानी भक्तों की मनोकामनाएं श्रीभगवान जी की कृपा से जल्दी पूरी हो सकती हैं।
ख्यातिप्राप्त- वेदपाठी एवं ज्योतिषाचार्य पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी से जानिए श्रीभगवान गणेश जी के अद्वितीय, अद्भुत और अत्यंत महत्वपूर्ण पाँच-महामंत्र और उनके भावार्थ…

महामंत्र संख्या – 01

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।

श्रीभगवान गणेश जी का यह महामंत्र सबसे अधिक लोक प्रिय है। इस मंत्र का भावार्थ यह है कि जिनकी सुंड घुमावदार है, जिनका शरीर विशाल है, जो करोड़ सूर्यों के समान तेजस्वी हैं, वही परम् श्रद्धेय श्रीभगवान जी मेरे सभी काम बिना किसी बाधा के पूरे करने की कृपा करें ।

महामंत्र संख्या – 02

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लंबोदराय सकलाय जगद्धितायं।

नागाननाथ श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते।।

इस मंत्र में श्रीभगवान गणेश जी की विशेषताएँ बतलाई गई हैं। जैसे- श्रीभगवान गणेश जी विघ्न हरने वाले हैं, वर देने वाले हैं, देवताओं के अति प्रिय हैं, लंबोदर हैं, सभी कलाओं के जानकार हैं, संसार का भला करने वाले हैं, जिनका मुख गज के समान है, जो श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के महान् विशिष्ट महाग्रंथ वेद, और यज्ञ से सजे हुए हैं। परम् श्रद्धेय एवं परमपूजनीय देवी पार्वती जी के प्रिय पुत्र को मेरा बड़ी श्रद्धा से शीश झुकाकर बारंबार नमस्कार है। हे परम् श्रद्धेय गणनाथ, आपको हम नमस्कार करते हैं।

महामंत्र संख्या -03

अमेयाय च हेरंब परशुधारकाय ते।

मूषक वाहनायैव विश्वेशाय नमो नमः।।

हे हेरंब (श्रीगणेश जी का एक नाम), आपको किसी भी तरह से मापा नहीं जा सकता है। आप पशुओं को अपनाते हैं। आपका वाहन एक चूहा है। आप पूरे संसार के अधिपति हैं, आपको बार-बार नमस्कार है।

महामंत्र संख्या – 4

एकदंताय शुद्धाय सुमुखाय नमो नमः।

प्रपन्न जनपालाय प्रणतार्ति विनाशिने।।

इस महामंत्र में कहा गया है, जिनका एक दांत है, सुंदर मुख है। उन्हें नमस्कार है। जो शरण में आए लोगों की रक्षा करते हैं, जो सभी प्राणियों के दुःखों को दूर करते हैं, उन्हें कोटि कोटि नमस्कार है।

महामंत्र संख्या – 05

एकदंताय विद्‍महे, वक्रतुंडाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात।।

परम् श्रद्धेय श्रीभगवान गणेश जी का ये भी बहुत प्रचलित मंत्र है। इस मंत्र कहा गया है कि एकदंत को हम प्रणाम करते हैं। वक्रतुंड श्रीभगवान जी का हम बड़ी श्रद्धापूर्वक ध्यान करते हैं। दंती यानी श्रीभगवान जी हमारा कल्याण कीजिए।

श्रीभगवान गणेशजी चतुर्थी का महापर्व महोत्सव शुरू हो चुका है, जो 10 दिन तक धूम-धाम से मनाया जाएगा। देश भर के कई जगहों और चौक-चौराहों पर पंडाल लगाने और श्रीभगवान गणेशजी की प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा है। मगर क्या आप जानते हैं कि श्रीभगवान गणेशजी चतुर्थी उत्सव 10 दिन तक क्यों मनाते है और श्री भगवान गणेशजी प्रतिमा विसर्जन क्यों किया जाता है। चलिए आज हम आपको श्री भगवान गणेशजी चतुर्थी उत्सव दस तक मनाने और बप्पा जी का विसर्जन करने की कहानी बताते हैं…

श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के पवित्र पावन पौराणिक ग्रंथ शिवपुराण के अनुसार, इस दिन भगवान श्री गणेश जी ने जन्म लिया था। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को श्रीभगवान गणेशजी चतुर्थी उत्सव पर्व सदियों से मनाया जा रहा है। शायद कल्पना करना भी कठिन है। हालांकि पहले इस पर्व को सिर्फ एक दिन ही बड़ी श्रद्धा व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता था। इसे दस दिन तक बड़े हर्षोल्लास व धूमधाम से मनाने की परंपरा बाद में शुरू हुई।

श्रीगणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन-

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, परम् श्रद्धेय ब्रह्मर्षि आदरणीय वेद व्यास जी ने श्रीभगवान गणेशजी चतुर्थी से महाभारत कथा श्री गणेशजी को लगातार दस दिनों तक सुनाई थी। जब ब्रह्मऋषि आदरणीय वेद व्यास जी ने दस दिन बाद आँखें खोली तो पाया कि श्री गणेश जी का तापमान बहुत अधिक हो गया था। इसके बाद परम् श्रद्धेय वेद व्यास जी ने श्री गणेश जी को निकट के सरोवर में ले जाकर ठंडा किया था। साथ ही श्री गणपति जी के शरीर का तापमान ना बढ़े इसलिए ब्रह्मऋषि वेद व्यास जी ने उनके शरीर पर सुगंधित सौंधी माटी का लेप किया। लेप सूखने पर जब श्री गणेश जी के शरीर में अकड़न आ गई तब उन्होंने बप्पा को शीतल सरोवर में ले जाकर पानी में उतारा। इस बीच ब्रह्मऋषि वेदव्यास जी ने श्रीभगवान गणेश जी को मनपसंद आहार अर्पित किए। तभी से श्री गणेश उत्सव चतुर्थी महोत्सव महापर्व बड़ी श्रद्धा व हर्षोल्लास के साथ दस दिन तक धूम-धाम से मनाया जाने लगा।
दस दिन तक चलने वाला यह महापर्व महोत्सव इसलिए भी प्रसिद्ध है कि, पेशवा शासन अर्थात् मराठा साम्राज्य के समय श्री गणेश चतुर्थी काफी भव्य रूप से मनाया जाता था। मगर जब अंग्रेजों ने अपनी औच्छी नियत से भारत पर कब्जा किया तो उन्होंने पेशवाओं के राज्य पर भी अपना अधिकार जमा लिया। इसके बाद गणेशोत्सव की भव्यता में साल दर साल कमी आने लगी लेकिन इसे मनाने की पंरपरा बनी रही। ऐसे में उन दिनों महान क्रांतिकारी व जननेता परम् श्रद्धेय पंडित लोकमान्य तिलक जी ने श्री सत्य सनातन धर्म अर्थात् हिंदू धर्म को संगठित करने का विचार बनाया। उन्होंने कहा कि श्री भगवान गणेश जी ही मात्र एक ऐसे देवता हैं, जिन्हें सभी समाज के लोग परम् श्रद्धा के साथ पूजनीय मानते हैं और अंग्रेज भी इसमें दखलअंदाजी नहीं करेंगे। ऐसे में उन्होंने सबको एकजुट करने के लिए सार्वजनिक गणेशोत्सव कि शुरुआत की, जिसमें दस दिनों तक श्रीभगवान गणेशजी का यह महोत्सव महापर्व हर साल बड़े हर्षोल्लास एवं उत्कृष्ट उमंग और जोर-शोर से मनाया जाने लगा। इससे हिंदूओं में एकता बढ़ती चली गई। साथ ही साथ देश को आजादी दिलाने में भी अद्वितीय, अद्भुत और अविस्मरणीय अभीष्ट मूलमंत्र बनकर देशप्रेमियों के हृदय पर देशभक्ति की अभीष्ट छाप छोड़ने का अत्यंत महत्वपूर्ण मूलमंत्र शाबित हुआ। 
जय श्रीभगवान गणेशजी।
जय हिंद -जय भारत -जय भारतीय संस्कृति ।

“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो।”

पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )
आभार -पंडित राकेश कुमार कौशिक जी ।
(शिक्षाविद् )।
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ।

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