विशेषांक-
विश्व का सर्वोत्तम महापर्व – श्रावण कावड़ मेला महापर्व

श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति अर्थात् हिंदू धर्म संस्कृति का महत्वपूर्ण महापर्व श्री श्रावण कावड मेला का आरंभ सावन के पवित्र माह जुलाई 4, 2023 ई0 से प्रारंभ हो गया है और इसके साथ ही मनभावन केसरिया वस्त्रों को धारण किए हुए शिवभक्तों के जत्थे परम् श्रद्धेय माँ गंगा जी का अति पवित्र जल शिवलिंग पर चढ़ाने के लिए हर्षोल्लास के साथ निकल पड़े हैं। ये जत्थे जिन्हें हम कावड़ियों के नाम से जानते हैं उत्तर भारत में सावन का महीना शुरू होते ही अपने-अपने पवित्र धामों के लिए सड़कों पर दिखाई देने लगते हैं।
पिछले दो दशकों से कावड़ यात्रा की लोकप्रियता अत्यधिक बढ़ी है और अब समाज का उच्च एवं शिक्षित वर्ग भी कावड़ यात्रा में बड़े हर्षोल्लास के साथ शामिल होने लगा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्रावण कावड़ मेला की यात्रा का इतिहास, सबसे पहले कावड़िया कौन थे। प्राचीन काल के इतिहास से इसे लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताएँ है। विश्व की सबसे अति प्राचीन और अति पवित्र पावन भारतीय हिंदू धर्म संस्कृति अर्थात् श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के विषय में संक्षेप में जानते हैं…
श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय – “हर – हर – महादेव”
1- परम् श्रद्धेय एवं पूज्यनीय महर्षि परशुराम जी थे पहले कावड़िया-
पौराणिक कथाओं के महाविद्वानों – महापंडितों का मानना है कि सबसे पहले परम् श्रद्धेय-पूज्यनीय महर्षि व श्री भगवान परशुराम जी ने उत्तर प्रदेश के बागपत नामक शहर के पास स्थित तीर्थ स्थल “पुरा महादेव” का कावड़ से, संपूर्ण विश्व की अति पवित्र पावन गंगा मैया जी के “गंगाजल” द्वारा जलाभिषेक किया था, जो प्राचीन काल से निरंतर अर्थात् आज तक जारी है और जारी रहेगी।
महर्षि भगवान श्री परशुराम जी, इस प्रचीन शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर नामक पवित्र स्थल से मैया गंगा जी का पवित्र जल लाए थे। श्री सत्य सनातन धर्म (हिंदू धर्म) में आस्था रखनेवाले आज भी इस परंपरा का पालन करते हुए सावन के महीने में पवित्र स्थल गढ़मुक्तेश्वर से जल लाकर करोड़ों लोग “पुरा महादेव” का जलाभिषेक बहुत ही हर्षोल्लास के साथ करते हैं। तीर्थ स्थल गढ़मुक्तेश्वर वर्तमान में “ब्रजघाट” नामक तीर्थ स्थल के नाम से जाना जाता है।
2- श्रवण जैसा कोई नहीं: परम् श्रद्धेय श्रवण कुमार जी थे पहले कावड़िया:
वहीं कुछ पौराणिक महाग्रंथो के महाविद्वानों का कहना है कि सर्वप्रथम त्रेतायुग में परम् श्रद्धेय श्रवण कुमार जी ने पहली बार कावड़ यात्रा की थी। अद्वितीय, अद्भुत और अविस्मरणीय श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति- परम् श्रद्धेय माता-पिता को तीर्थ स्थलों की यात्रा कराने के क्रम में श्रवण कुमार जी हिमाचल के ऊना क्षेत्र में थे जहाँ उनके परम् पूज्य अंधे माता-पिताश्री ने उनसे मायापुरी अर्थात् पवित्र तीर्थ स्थल हरिद्वार में श्री गंगा स्नान करने की इच्छा प्रकट की।
विश्व की सर्वश्रेष्ठ श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अंतर्गत माता-पिताश्री का दर्जा परम् पूज्य श्री भगवान जी के समतुल्य है अतः परम् पूज्य माता-पिताश्री की इस इच्छा को पूरी करने के लिए अनमोल रत्न श्रवण कुमार जी अपने परम् पूज्य माता-पिताश्री को कावड़ में बैठा कर हरिद्वार लाए और उन्हें गंगा स्नान कराया। वापसी में वे अपने साथ गंगाजल भी ले गए। इसे ही पवित्र पावन “श्री श्रावण कावड़ यात्रा” की शुरुआत के रूप में माना जाता है। धन्य श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति – जय श्रीराम!
3- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचंद्र जी ने की थी “श्री श्रावण कावड़ यात्रा” की शुरुआत-
पौराणिक कथाओं एवं प्राचीन इतिहास के महाविद्वानों व महापंडितों के विवेकानुसार- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचंद्र जी पहले कावडिया थे-
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी ने बिहार के सुल्तानगंज से कावड़ में गंगाजल भरकर, पवित्र तीर्थ स्थल श्री बाबाधाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था।
4- प्रकांड महापंडित महाविद्वान, महायोद्धा, विश्व विजेता श्रीलंकापति नरेश महाराजा रावण जी ने की थी “श्रावण कावड़ यात्रा” परंपरा की शुरुआत-
श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के पौराणिक महाग्रंथो के
अनुसार श्री श्रावण कावड़ यात्रा की परंपरा, समुद्र मंथन से जुड़ी है। समुद्र मंथन से निकले विष को पी लेने के कारण सृष्टि के पालनहार श्रीभगवान शिव शंकर जी का कंठ नीला हो गया और वे “नीलकंठ” कहलाए। लेकिन विष के नकारात्मक प्रभावों ने श्रीभगवान शिवजी को घेर लिया। श्रीभगवान शिव शंकर जी विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त कराने के लिए उनके अनन्य भक्त प्रकांड महापंडित, महाविद्वान लंकापति नरेश महाराजा रावण जी ने ध्यान किया।तत्पश्चात कावड़ में जल भरकर रावण ने “पुरा महादेव” तीर्थ स्थल स्थित श्रीशिवमंदिर में संपूर्ण सृष्टि के पालनहार श्रीभगवान शिवजी का जल अभिषेक किया। इससे श्री भगवान शिवजी विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त हुए और यहीं से कावड़ यात्रा की परंपरा का शुभारंभ प्रारंभ हो गया जो प्राचीन काल से वर्तमान काल में भी जारी हैं और जारी रहेगा।
5- पौराणिक ग्रंथों /महाग्रंथों के महाविद्वानों, महापंडितों का मानना है कि परम् श्रद्धेय देवताओं ने सर्वप्रथम सृष्टि के पालनहार श्रीभगवान शिवजी का किया था- जलाभिषेक!
कुछ मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकले हलाहल के प्रभावों को दूर करने के लिए देवताओं ने श्री भगवान शिवाजी पर पवित्र नदियों का शीतल जल चढ़ाया था। सभी देवता शिवजी पर परम् पूज्यनीय गंगाजी से जल लाकर अर्पित करने लगे। इसी परंपरा के अनुसार सावन मास में कावड़ यात्रा का प्रारंभ यहीं से प्रारम्भ हुआ जो अबाध जारी है और जारी रहेगा। श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय! श्री सत्य सनातन धर्म में आस्था रखने वाले समस्त प्राणी बड़ी श्रद्धा से शीश झुकाकर, सभी सच्चे हृदय से गुंजायमान मधुर स्वर से मिलकर प्रेम से बोलिए-
हर-हर-महादेव!
हिंदी – हिंदू – हिंदुस्तान।
मिलकर बोलों जय श्रीराम ।।
श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी ।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
सर्वे भवंतु सुखिन:!
सर्वे संतु निरामया ।।
आभार – पंडित राकेश शर्मा जी। (शिक्षाविद् )।
