धर्म-संसारः धर्मो रक्षति रक्षितः!

[जानिए अपनी महान् विरासत परम् श्रद्धेय महर्षि शांडिल्य गोत्रीय वंश को]

यह पावन धरा सर्वदा ही महान् ऋषि-मुनियों के सद् मार्गदर्शन एवं सद्गुणों से सर्वदा ही विश्व कल्याण के लिए परम् पूज्य रही है। उन्हीं में से एक अत्यंत महान् महर्षि परम् श्रद्धेय शांडिल्य ऋषि जी थे, और उन्हीं के नाम पर ब्राह्मण वंश में शांडिल्य गोत्र एवं संबंधित श्रेष्ठ गोत्र का विस्तार हुआ। ब्राह्मण वंश के अंतर्गत शांडिल्य एक सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण गोत्र है, ये वेदों में श्रेष्ठ, तथा सर्वश्रेष्ठ उच्चकुलीन घराने के ब्राह्मण हैं। यह गोत्र ब्राह्मणों के तीन मुख्य ऊँचे गोत्रो में से एक है। परम् श्रद्धेय महर्षि वेद व्यास जी द्वारा रचित भारतीय संस्कृति के विश्वविख्यात महान् महाग्रंथ महाभारत- अनुशासन पर्व के अनुसार – धर्मराज युधिष्ठिर जी की सभा में विद्यमान समस्त परम् श्रद्धेय ऋषियों में महर्षि शांडिल्य जी का नाम भी प्रमुख रूप से आता है। ब्राह्मणों से ही इस संसार का अस्तित्व है अतः इस संसार के प्रारंभ सतयुग से ही शांडिल्य ऋषि और अन्य ब्राह्मणों का अस्तित्व कायम है, अतः मान्यता यह भी है, कि सबसे पहले सतयुग में वेद-शास्त्र तथा शस्त्रों की शिक्षा भी महर्षि शांडिल्य जी तथा महर्षि गार्गस्य ऋषि जी के आश्रम में ही प्रारंभ हुई थीं। परम् श्रद्धेय महर्षि शांडिल्य जी त्रेतायुग में चक्रवर्ती सम्राट राजा दिलीप के राजपुरोहित बताए गए है, वहीं द्वापर में वे विश्वप्रसिद्ध चक्रवर्ती सम्राट राजा नंद जी के पुजारी हैं, एक समय में वे चक्रवर्ती सम्राट महाराजा त्रिशुंक जी के पुजारी थे तो दूसरे समय में वे विश्वप्रसिद्ध महाभारत के नायक भीष्म पितामह तथा अपने ब्राह्मण भ्राता भगवान श्री परशुराम जी के साथ वार्तालाप करते हुए दिखाए गए हैंं। कलयुग के प्रारंभ में वे जन्मेजय के पुत्र शतानीक के पुत्रेष्ठित यज्ञ को पूर्ण करते दिखाई देते हैं। इसके साथ ही वस्तुतः परम् श्रद्धेय महर्षि शांडिल्य जी एक अद्वितीय, अविस्मरणीय और अनमोल ऐतिहासिक ब्राह्मण ऋषि हैं लेकिन कालांतर में उनके नाम से उपाधियाँ शुरू हुई है जैसे वशिष्ठ, विश्वामित्र और व्यास नाम से उपाधियाँ होती हैं। महर्षि शांडिल्य जी गोत्रानुसार-गोत्र (गौड़ ब्राह्मण, तिवारी ब्राह्मण, त्रिपाठी ब्राह्मण, राय ब्राह्मण, शर्मा ब्राह्मणों में कॉमन उपाधि, मिश्रा ब्राह्मण, गोस्वामी ब्राह्मण वंश) महर्षि शांडिल्य जी के बारह पुत्र बताए जाते हैं, जो इन बारह गाँवों के प्रमुख स्थलों से प्रभुत्व रखते हैं। पिंडी, सोहगोरा, संरयाँ, श्रीजन, धतूरा, बगराइच, बलूआ, हलदी, झूडीयाँ, उनवलियाँ, लोनापार, कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है और कालांतर में इन्हीं बारह गाँव से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, ये सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। इनका गोत्र श्रीमुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमें राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ अतः विष्णु घराना, मणि घराना है, इन चारों का उदय सोहगोरा गोरखपुर शहर से है जहाँ आज भी इन चारों का अति सुंदर अस्तित्व कायम है। इस गोत्र के लोग श्रावस्ती के बारांवा हरगुन मे भी निवास करते हैं जो अधिकतर शर्मा ब्राह्मण वंशीय होते हैं ये अति उत्तम उच्चकोटि के सर्वश्रेष्ठ वंशीय उच्चकुलीन ब्राह्मण डलिया के भट्ट ब्राह्मण वंशीय है। इनका प्रचार – प्रसार सृष्टि में विस्तृत हैं । महर्षि शांडिल्य जी नामक उच्चकोटि के आदर्श आचार्य अन्य शास्त्रों में भी स्मृत हुए हैं।हेमाद्रि के लक्षणप्रकाश में शांडिल्य जी को एक महान् आयुर्वेदाचार्य कहा गया है। विभिन्न व्याख्यान ग्रंथों से पता चलता है कि इनके नाम से विख्यात एक गृह्यसूत्र एवं एक स्मृतिग्रंथ भी था। ब्राह्मण वंश के अंतर्गत कुछ अन्य अद्वितीय,अद्भुत और अविस्मरणीय अत्यंत महान् विशिष्ट विभूतियां जिन्होंने धर्मो रक्षति रक्षितः हेतु सब कुछ न्यौछावर कर दिया ।
राष्ट्र के चहुँओर श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति की अनमोल पताका फहराने वाले परम् पूज्य आदि जगतगुरु शंकराचार्य जी, अखंड भूमंडलाचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य जी और विश्वविख्यात महाविद्वान गणितज्ञ भास्कराचार्य जी-
आसीत सह्यकुलाचलाश्रितपुरे त्रैविद्यविद्वज्जने। नाना जज्जनधाम्नि विज्जडविडे शाण्डिल्यगोत्रोद्विजः॥श्रौतस्मार्तविचारसारचतुरो निःशेषविद्यानिधि।साधुर्नामवधिर्महेश्‍वरकृती दैवज्ञचूडामणि॥ (गोलाध्याये प्रश्नाध्यायः, श्लोक ६१)
इस श्लोक के अनुसार भास्कराचार्य शांडिल्य गोत्र के श्री भट्ट ब्राह्मण थे। काव्य जगत के महान् परौधा- पद्माकर जी, परम् श्रद्धेय विष्णु स्वामी जी, श्री भगवान कृष्ण जी के अनन्य परम् भक्त परम् पूज्य गोपाल भट्ट जी, महाविद्वान प्रकांड महापंडित पाणिनि जी, परम् श्रद्धेय बौधायन जी परम् श्रद्धेय एवं पूज्यनीय रामानुजाचार्य जी, परम् पूज्य मध्वाचार्य जी, महाविद्वान प्रकांड महापंडित आदरणीय कुमारिल भट्ट जी, श्रीभट्ट ब्राह्मण वंश की अत्यंत महान् विशिष्ट विभूतियां हैं। इन अत्यंत महान् विशिष्ट विभूतियों को श्रद्धा से शीश झुकाकर बारंबार कोटि-कोटि नमन।
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
( ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
आभार-
पंडित आर0 के0 शर्मा जी।( शिक्षाविद् )।

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