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अद्वितीय पराक्रम, अद्भुत दूरदृष्टि और अविस्मरणीय शौर्यगाथा का अराजेय महावीर महायोद्धा- श्रीमंत बाजीराव पेशवा भट्ट जी।
[ पुण्यतिथि विशेषांक ]

“हर-हर महादेव” के युद्धघोष के साथ देश में अटक से लेकर कटक तक केसरिया ध्वज लहरा कर “हिंदू स्वराज” लाने का जो सपना हिंदू हृदय सम्राट वीर छत्रपति शिवाजी महाराज जी ने देखा था, उसको काफी हद तक मराठा साम्राज्य के चौथे महावीर महा- पराक्रमी पेशवा जी महाराज अर्थात् प्रधानमंत्री महावीर बाजीराव पेशवा भट्ट जी प्रथम ने पूरा किया था। जिस पराक्रमी महावीर – महायोद्धा बाजीराव पेशवा जी प्रथम के नाम से अंग्रेज शासक थर्र-थर्र काँपते थे, वहीं संपूर्ण मुगल शासक, विश्व के अपराजेय महायोद्धा श्रीमंत बाजीराव पेशवा भट्ट जी से इतना डरते थे कि उनसे मिलने तक से भी बहुत बुरी तरह से घबराते थे। हिंदुस्तान के इतिहास में पेशवा बाजीराव प्रथम ही अकेले ऐसे महावीर महायोद्धा थे, जिन्होंने अपने जीवन काल में 41 युद्ध लड़े और एक भी युद्ध नहीं हारा, छोटे-मोटे युद्धों को तो क्षण भर में ही कुचल दिया करते थे, साथ ही वीर महाराणा प्रताप जी और वीर छत्रपति शिवाजी महाराज जी के बाद श्रीमंत बाजीराव पेशवा जी प्रथम का ही नाम आता है जिन्होंने मुगलों से बहुत लंबे समय तक लगातार लोहा लिया था। पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट जी एक ऐसे महान् योद्धा थे। जिन्होंने निजाम, मोहम्मद बंगश से लेकर मुगलों, अंग्रेजों और पुर्तगालियों तक को युद्ध के मैदान में कई-कई बार बहुत ही करारी शिकस्त दी थी, श्रीमंत बाजीराव पेशवा भट्ट जी के समय में महाराष्ट्र, गुजरात, मालवा, बुंदेलखंड सहित 70 से 80 प्रतिशत भारत पर उनका शासन था। ऐसा रिकॉर्ड वीर छत्रपति शिवाजी तक के नाम पर भी नहीं है। वह जब तक जीवित रहे हमेशा अजेय रहे, उनको कभी भी कोई हरा नहीं पाया।
हालांकि इस महावीर अजेय योद्धा के साथ हमारे देश के इतिहासकारों ने कभी भी न्याय नहीं किया, उन्होंने एक महान योद्धा को हमेशा गुमनाम नायक बनकर ही रहने दिया, बाजीराव को इतिहास ने उनका तय सम्मान कभी नहीं दिया, देश में फिल्म “बाजीराव मस्तानी” आने तक तो उनके बारे में बहुत ही कम लोग जानते थे, अधिकांश लोगों ने उसके बाद ही इस महान योद्धा के बारे में जाना और समझा। उस समय जनता के बीच “अपराजित हिंदू सेनानी सम्राट” के नाम से प्रसिद्ध इस अत्यंत महान् सेनानायक पेशवा बाजीराव जी प्रथम की गत दिवस 28 अप्रैल को पुण्यतिथि थी, जिसे विश्व पटल पर संपूर्ण प्राणी जगत बड़ी ही श्रद्धा और हर्षोल्लास से मना रहा है। ब्रिटेन, जर्मनी और अमेरिका के इतिहास में विश्व के महान् योद्धाओं के साथ – साथ श्रीमंत बाजीराव पेशवा भट्ट जी को अपराजेय योद्धा के रूप में उनके अदम्य साहस और बेमिसाल शौर्य गाथा को उत्कृष्ट प्रतिभा के रूप में स्थान दिया गया है। परंतु आजादी के बाद के इतिहासकारों की तुच्छ मानसिकता और ढुलमुल रवैया शिक्षा नीति के कारण राष्ट्र का युवा धन इस महान् योद्धा के अदम्य साहस और अद्वितीय पराक्रम से अनभिज्ञ हो गया। बाजीराव पेशवा को लोग “बाजीराव बल्लाल “भट्ट” जी और “थोरले बाजीराव” के नाम से भी जानते थे। हिंदू हृदय सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज जी के बाद वह गुरिल्ला युद्ध तकनीक के सबसे बड़े प्रतिपादक थे। उन्होंने अपने कुशल नेतृत्व, व्यूह रचना एवं कारगर रणकौशल के बलबूते पर मराठा साम्राज्य का देश में बहुत तेजी से सबसे अधिक विस्तार किया था।
महान् श्रीमंत पेशवा बाजीराव प्रथम अर्थात् बल्लाल भट्ट जी का पारिवारिक इतिहास :
पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट जी का जन्म 18 अगस्त सन् 1700 ई0 को एक सच्चे सनातनी राष्ट्रभक्त संभ्रांत उत्कृष्ट उच्च कुलीन वंश के ब्राह्मण परिवार में पंडित पिताश्री बालाजी विश्वनाथ भट्ट जी और परम् साध्वी श्री सत्य सनातन धर्म रक्षक माता राधाबाई जी के घर में हुआ था। उनके पिताजी मराठा छत्रपति शाहूजी महाराज के प्रथम पेशवा (प्रधानमंत्री) थे। बाजीराव का एक छोटा भाई भी था चिमाजी अप्पा जी थे। बाजीराव अल्पायु से ही अपने पिताश्री के साथ हमेशा सैन्य अभियानों में जाया करते थे। पेशवा बाजीराव ने दो शादियाँ की इनकी पहली धर्म पत्नी का नाम देवी काशीबाई जी और बाजीराव के चार बेटे थे। बालाजी बाजीराव उर्फ नानासाहेब का जन्म सन् 1721ई0 में हुआ था और बाद में बाजीराव प्रथम की मौत के बाद सन् 1740ई0 में शाहूजी ने उन्हें अपना पेशवा नियुक्त किया था। दूसरे बेटे की रामचंद्र की मृत्यु जवानी में ही हो गई और तीसरा बेटा पंडित रघुनाथराव भट्ट जी 1773-74 ई0 के दौरान पेशवा के रूप में कार्यरत थे। चौथे पुत्र जनार्दन कि भी जवानी में मृत्यु हो गई थी। बाजीराव ने मस्तानी से दूसरी शादी की थी जो कि बुंदेलखंड के हिंदू राजा छत्रसाल और उनकी एक फारसी मुस्लिम पत्नी रुहानी बाई की बेटी थी। बाजीराव उससे बहुत अधिक प्रेम करते थे और उसके लिए पुणे के पास एक महल भी बाजीराव जी ने बनवाया जिसका नाम उन्होंने ‘मस्तानी महल’ रखा। सन् 1734 ई0 में बाजीराव और मस्तानी का एक पुत्र हुआ जिसका नाम पंडित कृष्णा राव भट्ट जी रखा गया था। जो बाद में शमशेर बहादुर प्रथम कहलाया।
वीर सैनिकों के कैंप में ही 28 अप्रैल 1740 ई0 को वीर महान योद्धा बाजीराव प्रथम की बुखार से आकस्मिक मृत्यु हो गई। काश यदि इस महापराक्रमी यशस्वी योद्धा की अल्प आयु में आकस्मिक मृत्यु न होती, तो न अंग्रेज बचते और न मुगलों का नामोनिशान बचता। आज भारतवर्ष की तस्वीर ही कुछ और वैभवशाली व गौरवमयी होती।
बाजीराव का गौरवशाली इतिहास: बचपन से बाजीराव को घुड़सवारी करना, तीरंदाजी, तलवार, भाला, बनेठी, लाठी आदि चलाने का बहुत शौक था। 13-14 वर्ष की खेलने की आयु में बाजीराव अपने पिताश्री के साथ अभियानों पर घूमते थे। वह उनके साथ घूमते हुए राज दरबारी चालों, युद्ध नीति व रीति-रिवाजों को आत्मसात करते रहते थे। यह क्रम 19-20 वर्ष की आयु तक चलता रहा। अचानक एक दिन बाजीराव के पिता का निधन हो गया, तो वह मात्र बीस वर्ष की उम्र में छत्रपति शाहूजी महाराज के पेशवा बना गये। इतिहास के अनुसार बाजीराव घुड़सवारी करते हुए लड़ने में सबसे माहिर थे और यह माना जाता है कि उनसे अच्छा घुड़सवार सैनिक भारत में आज तक कभी नहीं देखा गया। उनके पास 4 घोड़े थे, जिनका नाम नीला, गंगा, सारंगा और औलख था। अपने प्रिय घोडों की देखभाल बाजीराव स्वयं करते थे। पेशवा बाजीराव की लंबाई 6 फुट, हाथ लंबे, शरीर बलिष्ठ था। पूरी सेना को वो हमेशा बेहद सख्त अनुशासन में रखते थे। अपनी बेहतरीन भाषण शैली से वो सेना में एक नया जोश भर देते थे।
अल्पवयस्क उम्र के होते हुए भी बाजीराव जी ने अपनी असाधारण योग्यता प्रदर्शित की। पेशवा बनने के बाद अगले बीस वर्षों तक बाजीराव मराठा साम्राज्य को लगातार बहुत तेजी से बढ़ाते रहे। उनका व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था। वह जन्मजात नेतृत्वशक्ति, अद्भुत रणकौशल, अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने अपने बेहद प्रतिभासंपन्न अनुज भाई चिमाजी अप्पा के सहयोग द्वारा शीघ्र ही मराठा साम्राज्य को भारत में सर्वशक्तिमान् बना दिया था। अपनी वीरता, अपने नेतृत्व क्षमता, गुरिल्ला युद्ध तकनीक व बेहतरीन युद्ध-कौशल योजना के द्वारा यह महान वीर योद्धा बाजीराव जंग के मैदान में 41 लड़ाई लड़ी और हर लड़ाई को बहुत ही शानदार प्रदर्शन के साथ जीतकर हमेशा अजेय विजेता रहा जो कि अपने-आप में एक अद्वितीय विश्व इतिहास है। चटुकारी व तुच्छ मानसिकता वाले इतिहासकारों ने हारे हुए राजाओं को महान् बना दिया जबकि हिंदुस्तान के इस अपराजेय महान् योद्धा को गुमनाम बना दिया। परम् श्रद्धेय छत्रपति शिवाजी जी की तरह वह बहुत ही कुशल घुड़सवार थे। घोड़े पर बैठे-बैठे भाला चलाना, बनेठी घुमाना, बंदूक चलाना उनके बाएँ हाथ का खेल था। घोड़े पर बैठकर बाजीराव के भाले की फेंक इतनी जबरदस्त होती थी कि सामने वालें दुश्मन को जान बचने के लाले तक पड़ जाते थे। बाजीराव के समय में भारत की जनता मुगलों के क्रूर अत्याचारों के साथ-साथ अंग्रेजों व पुर्तगालियों के अत्याचारों से त्रस्त हो चुकी थी। यह आक्रांता भारत के देवस्थान मंदिरों को तोड़ते, जबरन धर्म परिवर्तन करते, महिलाओं व बच्चों को मारते व उनका भयंकर शोषण करते थे। ऐसे में बाजीराव पेशवा जी ने उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक ऐसी केसरिया विजय पताका फहराई कि चारों ओर उनके नाम का डंका बजने लगा। उनकी वीरता को देखकर लोग उन्हें श्री भगवान शिवाजी का साक्षात अवतार मानने लगे थे।
बाजीराव की शौर्यगाथा –
सन् 1724 ई0 में शकरखेडला में बाजीराव पेशवा जी ने मुबारिज़खाँ को बड़े भयंकर तरह से परास्त किया था।

सन् 1724 ई0 से 1726ई0 तक मालवा तथा कर्नाटक पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया।

सन् 1728ई0 में पालखेड़ में महाराष्ट्र के शत्रु निजामउलमुल्क को बहुत बुरी तरह से पराजित करके उससे चौथ तथा सरदेशमुखी वसूली की।
सन् 1728ई0 में मालवा और बुंदेलखंड पर आक्रमण कर मुगल सेनानायक गिरधर बहादुर तथा दया बहादुर पर शानदार विजय प्राप्त की। मुहम्मद बंगश खां द्वारा वृद्ध अवस्था से गुजर रहे सम्राट छत्रसाल को आत्मसमर्पण करने पर, चारों ओर से निराश सम्राट छत्रसाल ने पंडित बाजीराव पेशवा भट्ट जी से राष्ट्र – प्रजा व अपनी सुरक्षा के लिए विनती की, इसी विनती पर सन् 1729ई0 में, विश्व के सबसे तेज युद्धों में बिना रूके खाना-पीना त्याग कर तदनंतर मुहम्मद खाँ बंगश को युद्ध में बहुत भयंकर तरीके से परास्त किया।
सन् 1731ई0 में दभोई में त्रिंबकराव को नतमस्तक कर बाजीराव जी ने आंतरिक विरोध का दमन किया। सीदी, आंग्रिया तथा पुर्तगालियों एवं अंग्रेज़ो को भी बहुत ही बुरी तरह पराजित किया।
बाजीराव जी का, मुगलों की दिल्ली को फतह करने का अभियान, उन्होंने सादात खाँ और मुगल दरबार को सबक सिखाने की सोची। उस वक्त देश में कोई भी ऐसी ताकत नहीं थी, जो सीधे दिल्ली पर आक्रमण करने का ख्वाब भी दिल में ला सके। मुगलों का और खासकर दिल्ली दरबार का ऐसा खौफ सबके सिर चढ़कर बोलता था। लेकिन बाजीराव को पता था कि ये खौफ तभी हटेगा जब दिल्ली पर खुद सीधा हमला होगा। बाजीराव ने उसी उद्देश्य से दिल्ली पर चढ़ाई कर दी। 10 दिन की दूरी बाजीराव ने केवल 500 घोड़ों के साथ 48 घंटे में बिना रुके बिना थके पूरी कर ली। देश के इतिहास में अब तक के दो आक्रमण ही सबसे तेज माने गए हैं- एक फतेहपुर से गुजरात के विद्रोह को 9 दिन में दबाना, दूसरा महान् योद्धा बाजीराव पेशवा भट्ट जी का दिल्ली की मुगल सल्तनत पर सीधा हमला करना। बाजीराव जी ने आज जहाँ तालकटोरा स्टेडियम है वहाँ पर अपनी सेना का कैंप डाल दिया, उसके पास केवल 500 घुड़सवार सैनिक योद्धा थे। मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला बाजीराव को लाल किले के इतना करीब देखकर घबरा गया। उसने खुद को लाल किले के अंदर सुरक्षित इलाके में कैद कर लिया और मीर हसन कोका की अगुआई में 10 हजार सैनिकों की टोली को बाजीराव से निपटने के लिए भेजा। बाजीराव के मात्र 500 लड़ाकों ने उस मुगल सेना को 28 मार्च 1737 ई0 के दिन बुरी तरह शिकस्त दी इस युद्ध में बाजीराव भट्ट जी के मात्र 500 लड़ाकों ने मुगल सेना के बहुत बुरी तरह से छक्के छुड़ा दिए। यह दिन भारत के इतिहास का स्वर्णिम दिन था और मराठा ताकत के लिए सबसे बड़ा महत्वपूर्ण दिन।
सन् 1737ई0 तक बाजीराव की सैन्यशक्ति का चरमोत्कर्ष था। उसी वर्ष भोपाल में बाजीराव पेशवा जी ने फिर से निजाम को करारी शिकस्त (पराजय )दी। बाजीराव जी शानदार प्रदर्शन के साथ विजयी हुए।
बाजीराव प्रथम को एक महान घुड़सवार सेनापति के रूप में जाना जाता है और इतिहास के उन महान योद्धाओं में बाजीराव का नाम आता है जिन्होंने कभी भी अपने जीवन में एक भी युद्ध नहीं हारा, यह उनकी महानता व युद्ध कौशल को दर्शाता है। बाजीराव के रूप में भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा वीर महायोद्धा घुड़सवार सेनापति हुआ था।

अमेरिकी इतिहासकार बर्नार्ड मांटोगोमेरी के अनुसार-

“बाजीराव पेशवा भारत के इतिहास का सबसे महानतम सेनापति था और पालखेड़ युद्ध में जिस तरीके से उन्होंने निजाम की विशाल सेनाओं को पराजित किया उस वक्त सिर्फ बाजीराव प्रथम ही कर सकते थे उसके अलावा भारत या भारतीय उपमहाद्वीप में यह सब करने की क्षमता किसी और से नहीं थी।” बाजीराव प्रथम और उनके भाई चिमाजी अप्पा ने बेसिन के लोगों को पुर्तगालियों के अत्याचार से भी बचाया जो जबरन धर्म परिवर्तन करवा रहे थे और जबरन यूरोपीय सभ्यता को भारत में लाने की कोशिश कर रहे थे। सन् 1739 ई0 में अंतिम दिनों में अपने भाई चिमाजी अप्पा को भेजकर उन्हें पुर्तगालियों को हरा दिया और वसई की संधि करवा दी थी।

जिस समय बाजीराव प्रथम को सन् 1720 ई0 में छत्रपति शाहूजी महाराज ने मराठा साम्राज्य का पेशवा नियुक्त किया था, जिसके बाद कई सारे बड़े मंत्री बाजीराव से नाराज हो गए जिसके कारण उन्होंने युवा सरदारों को अपने साथ में लाना शुरू कर दिया जिसमें मल्हारराव होलकर, राणोजीराव शिंदे आदि मुख्य रूप से शामिल थे, इन सभी ने बाजीराव के साथ मिलकर संपूर्ण भारत पर अपना प्रभाव जमाने को रात-दिन एक कर दिया था। बाजीराव प्रथम कि सबसे बड़ी जीत सन् 1728ई0 में पालखेड की लड़ाई में हुई जिसमें उन्होंने निजाम की सेनाओं को पूर्णतया दलदली नदी के किनारे लाकर खड़ा कर दिया था, अब निजाम के पास आत्मसमर्पण के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था, 6 मार्च 1728ई0 को उन्होंने मुंशी शेवगाँव की संधि की थी। उन्होंने छत्रपति शाहूजी महाराज को मराठा साम्राज्य का वास्तविक छत्रपति घोषित कर दिया और संभाजी द्वितीय को कोल्हापुर का छत्रपति। उसके बाद बाजीराव ने कई और लड़ाई लड़ी और सभी में शानदार विजय प्राप्त की।
सन् 1737 में जब बाजीराव दिल्ली फतह के बाद वापस पुणे की ओर लौटे, जहाँ पर मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला ने साआदत अली खान और हैदराबाद के निजाम को लिखा कि आप बाजीराव को पुणे से पहले ही रोक ले, जिसके चलते निजाम व बाकी सभी की सेना का सामना बाजीराव से भोपाल के निकट हुआ। जिसमें 24 दिसंबर 1737ई0 के दिन मराठा सेना ने सभी को जबरदस्त तरीके से हराया। निजाम ने अपनी जान बचाने के लिए श्रीमंत बाजीराव पेशवा भट्ट जी से संधि कर ली। इस बार 7 जनवरी 1738ई0 को ये संधि दोराहा में हुई। मालवा, मराठों को सौंप दिया गया और मुगलों ने 50 लाख रुपए बतौर हर्जाना बाजीराव को सौंपे। मालवा का संपूर्ण क्षेत्र अब मराठो को प्राप्त हो गया, इससे मराठों का प्रभाव संपूर्ण भारत में स्थापित हो गया। बाजीराव ने सन् 1730ई0 मे शनिवार वाड़ा का पुणे में निर्माण करवाया और पुणे को राजधानी बनाया। बाजीराव ने ही पहली बार देश में “हिंदु पदशाही” का सिद्धांत दिया और सभी हिंदुओं को एक कर विदेशी शक्तियों के खिलाफ लड़ने का बीड़ा उठाया, हालाँकि उन्होंने कभी भी किसी अन्य धर्म के मानने वाले लोगों पर कोई अत्याचार नहीं किया।
उन्होंने सन् 1739ई0 में अपने भाई की चिमाजी की सेनाओं के द्वारा पुर्तगालियों को बेसिन में पराजित करके वसई की संधि कर ली, जिसके तहत पुर्तगालियों के अभद्र पूर्ण व्यवहार से भारतीय जनता को बाजीराव प्रथम ने बचा लिया। बाजीराव प्रथम बहुत ही महान और काबिल हिंदू महायोद्धा थे, संपूर्ण भारत में बाजीराव प्रथम की ताकत का जबरदस्त खौफ चारों ओर फैला हुआ था, यहाँ तक कि जयपुर के राजा जयसिंह द्वितीय भी उनकी काफी तारीफ करते थे। सन् 1731ई0 में उन्होंने मोहम्मद खान बंगस की सेना को बहुत ही बुरी तरह से पराजित कर महाराजा छत्रसाल को उससे बचा लिया और वापस उनका बुंदेलखंड राज्य उनको सम्मान के साथ लौटा दिया, इसे प्रसन्न होकर उन्होंने अपनी पुत्री मस्तानी का विवाह बाजीराव से कर दिया और जब छत्रसाल की मौत हुई तो बाजीराव को बुंदेलखंड राज्य का एक तिहाई हिस्सा मराठा साम्राज्य में मिलाने के लिए दे दिया गया था। बाजीराव पेशवा की वीरता के बारे में इतिहास तथा राजनीति के एक विद्वान् सर रिचर्ड टेंपिल ने बाजीराव की महत्ता का यथार्थ अनुमान एक वाक्य समूह में किया है। वह लिखते है कि-

“सवार के रूप में बाजीराव को कोई भी मात नहीं दे सकता था। युद्ध में वह सदैव अग्रगामी रहता था। यदि कार्य दुस्साध्य होता तो वह सदैव अग्नि-वर्षा का सामना करने को उत्सुक रहता। वह कभी थकता न था। उसे अपने सिपाहियों के साथ दुःख-सुख उठाने में बड़ा आनंद आता था। विरोधी मुसलमानों और राजनीतिक क्षितिज पर नवोदित यूरोपीय सत्ताओं के विरुद्ध राष्ट्रीय उद्योगों में सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा उसे हिंदुओं के विश्वास और श्रद्धा में सदैव मिलती रही। वह उस समय तक जीवित रहा जब तक अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक संपूर्ण भारतीय महाद्वीप पर मराठों का भय व्याप्त न हो गया। उसकी मृत्यु डेरे में हुई, जिसमें वह अपने सिपाहियों के साथ आजीवन रहा। महान् योद्धा युद्धकर्ता पेशवा के रूप में तथा राष्ट्र एकता व हिंदू शक्ति के महान् अवतार के रूप में मराठे उसका हमेशा स्मरण करते रहेंगे।”

देश में जब भी होलकर, सिंधिया, पवार, शिंदे, गायकवाड़ जैसी ताकतों की बात होगी तो पता चलेगा कि वे सब पंडित बाजीराव पेशवा भट्ट प्रथम जी की ही देन थीं। ग्वालियर, इंदौर, पूना और बड़ौदा जैसी ताकतवर रियासतें बाजीराव के चलते ही अस्तित्व में आईं। बुंदेलखंड की रियासत बाजीराव पेशवा जी के दम पर ही जिंदा थी।
बाजीराव जी का 28 अप्रैल 1740 ई0 में केवल 40 वर्ष की अल्पायु में इस दुनिया से चले जाना मराठा शासकों के लिए ही नहीं, बल्कि देश की बाकी पीढ़ियों के लिए भी बहुत ही दर्दनाक भविष्य लेकर आया। उनकी मृत्यु के चलते ही अगले 200 वर्ष तक भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहा और उनके बाद देश में कोई भी ऐसा योद्धा नहीं हुआ, जो पूरे देश को एक सूत्र में बाँधकर आजाद करवा पाता। जब भी भारत के इतिहास के महान् योद्धाओं की बात होगी तो निस्संदेह महान् वीर श्रीमंत बाजीराव पेशवा भट्ट प्रथम जी का नाम हमेशा ही बड़े गर्व से लिया जायेगा और वह हमेशा हम सभी भारतवासियों के आदर्श व प्रेरणास्रोत सदा बने रहेंगे। इस अत्यंत महान् अदम्य साहस और बेमिसाल शौर्य गाथा के अद्वितीय और अविस्मरणीय अनमोल रत्न को उनकी पुण्य तिथि पर बड़ी श्रद्धा से शीश झुकाकर बारंबार कोटि – कोटि नमन।
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी)।

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