हिंदू हृदय सम्राट की उपाधि उन्हें उनके जीवन और कार्यों के कारण दी गई। उनका उद्देश्य सिर्फ अपने राज्य का विस्तार करना नहीं था, बल्कि उन्होंने अपनी प्रजा की भलाई और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
उन्होंने हिंदू धर्म को महत्व दिया और मुगलों-आक्रांताओं के अत्याचार से अपनी मातृभूमि को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष किया, जो राष्ट्र के युवा धन में राष्ट्र भक्ति का अनमोल संदेश देता हैं।

परम श्रेध्य शिवाजी महाराज जी ने अपने शासनकाल में:
- हिंदू धर्म की रक्षा– उन्होंने अपने राज्य में हिंदू धर्म को सुरक्षित रखा और मंदिरों को संरक्षण दिया।
- समानता का सिद्धांत– परम पूजनीय छत्रपति शिवाजी महाराज जी ने समाज में समानता का अद्भुत और अविस्मरणीय आदर्श स्थापित किया और जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाई।
- शासन की व्यवस्था– परम श्रेध्य शिवाजी महाराज जी ने एक अत्यंत मजबूत और न्यायपूर्ण शासन की स्थापना की, जिसमें जनता के अधिकारों की रक्षा की जाती थी।
परम श्रेध्य शिवाजी महाराज के लिए कई श्लोक और कविताएं लिखी गई हैं जो उनके महान कार्यों का सम्मान करती हैं। एक प्रसिद्ध श्लोक है:
“शिवाजी महाराज की वंदना”
“जय शिवाजी महाराज की जय,
हिंदवी स्वराज्य की रक्षाय।
सिंहासन हिट बैठे शिवाजी,
हिंदू हृदय सम्राट महाराज।।”
श्लोक उनके अद्वितीय नेतृत्व और हिंदू स्वराज्य की स्थापना को स्वीकार करता है। इस श्लोक में यह बताया गया है कि शिवाजी महाराज हिंदवी स्वराज्य के सच्चे रक्षक और देशभक्त थे, उनका कार्य स्वतंत्रता, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए था।
परम श्रेध्य छत्रपति शिवाजी महाराज जी का व्यक्तित्व और उनके शौर्य पराक्रमी कार्य हमेशा राष्ट्र की भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक रहेंगे। उन्होंने सिर्फ युद्ध के मैदान में विजय प्राप्त नहीं की, बल्कि उन्होंने समाज और श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से एक महान छवि भी बनाई।
प्रकांड महापंडित गागा भट्ट जी या विश्वश्वर भट्ट जी, एक महान पंडित और विद्वान थे, जिन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज जी का राजतिलक किया। वे संस्कृत और शास्त्रों के बड़े ज्ञाता थे और उनका महत्वपूर्ण योगदान शिवाजी महाराज के शासन की धार्मिक और सांस्कृतिक नींव रखने में था। राजतिलक के समय, विश्व विख्यात महाविद्वान् महापंडित गागा भट्ट जी ने शिवाजी महाराज जी कोअद्भुत-पराक्रमी छत्रपति महाराज की उपाधि दी थी और उनके राजकार्य के लिए शास्त्रों से जुड़े अनेक उपदेश दिए थे। इस अवसर पर महाविद्वान् महापंडित गागा भट्ट जी ने कई श्लोकों के माध्यम से शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व और उनकी महानता की महिमा की। इन श्लोकों में वे हिंदू हृदय सम्राट शिवाजी महाराज जी को एक धर्मनिष्ठ शासक और महान नेता के रूप में सम्मानित करते हैं।
यहाँ एक श्लोक प्रस्तुत है, जो प्रकांड महापंडित गागा भट्ट जी(विश्वश्वर भट्ट जी)द्वारा राजतिलक के समय उच्चारित है:
“पुत्रोऽसि स्वधर्मेण, धर्मराज्येण च नृप।
शिवोऽपि शंकरोऽस्ति ते, सर्वदा यशसांबुधेः॥”
भावार्थ:
“पुत्रोऽसि स्वधर्मेण” – यह पंक्ति बताती है कि आप अपने स्वधर्म का पालन करने वाले हैं, अर्थात आप धर्म के मार्ग पर चलने वाले हैं।
“धर्मराज्येण च नृप” – आप धर्म के आधार पर राज्य करने वाले राजा हैं, जिससे आपके राज्य में न्याय और धर्म की स्थापना होगी।
“शिवोऽपि शंकरोऽस्ति ते” – आप भगवान शिव के आशीर्वाद से शंकर के समान हैं, आपके द्वारा किए गए कार्यों में भगवान शिव का मार्गदर्शन होगा।
“सर्वदा यशसांबुधेः” – आपके कार्यों से हमेशा यश की वर्षा होगी और आप यशस्वी होंगे।
यह श्लोक शिवाजी महाराज की उच्चता और उनके धर्मनिष्ठ शासक के रूप में प्रतिष्ठा को व्यक्त करता है। गागा भट्ट जी ने इस श्लोक के माध्यम से शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व और उनके द्वारा स्थापित किए गए धर्मराज्य का गुणगान किया।
गागा भट्ट जी की विद्वता और उनके योगदान को भारतीय इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकता, और उनका श्लोक शिवाजी महाराज के राजतिलक की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में आज भी याद किया जाता है। सच्चे अर्थो में हिंदू हृदय सम्राट परम श्रेध्य छत्रपति शिवाजी महाराज एक सच्चे देश भक्त, श्री सत्य सनातन धर्म रक्षक, हिंदू संस्कृति रक्षक और राष्ट्र के युवा धन के प्रेरणादायक मूलमंत्र को संपूर्ण प्राणी जगत बड़ी श्रद्धा से शीश झुकाकर कोटि कोटि नमन करता हैं! जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति!
“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी
(वेदपाठी – ज्योतिषाचार्य )
जय श्रीराम – जय श्रीराम – जय श्रीराम जी
आभार -पंडित राकेश कुमार कौशिक जी (शिक्षाविद) लक्ष्मीनगर|
