वसंत पंचमी श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है, जो वसंत ऋतु के आगमन का अति सुंदर प्रतीक है। यह त्योहार परम श्रेध्य एवं पूजनीय देवी सरस्वती जी की पूजा के लिए भी मनाया जाता है, जो श्रेष्ठ ज्ञान, कला और संगीत की देवी हैं।

वसंत पंचमी श्लोक:
“या कुंदेंदुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता|
या वीणावरदंडमंडितकरा या श्वेतपद्मासना ||
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता|
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ||”
भावार्थ: जो परम पूजनीय देवी कुंद के फूलों की तरह श्वेत और सुंदर है, जो शुभ्र वस्त्र धारण करती है, जो मधुर संगीत के पावन यंत्र वीणा और वरदंड से सुशोभित है, जो श्वेत पद्मासन पर बैठती है, जो श्री ब्रह्माजी, श्री विष्णु हरि जी, श्री शिवजी और अन्य देवताओं द्वारा सदा वन्दित है, वह परम पूजनीय माता सरस्वती भगवती जी मुझे अज्ञानता से मुक्ति दिलाएँ।
वसंत पंचमी का महत्व:
भारतीय संस्कृति का यह अति पावन पर्व वसंत पंचमी अर्थात् वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है, जो नई जिंदगी, सुख समृद्धि और नवीनता का प्रतीक है।
यह त्योहार परम पूजनीय देवी सरस्वती जी की पूजा के लिए भी मनाया जाता है, जो सच्चे ज्ञान, कला और संगीत की देवी हैं।
वसंत पंचमी के दिन, लोग अपने घरों और मंदिरों में देवी सरस्वती की पूजा करते हैं और उन्हें फूल, फल और अन्य मधुरस प्रसाद चढ़ाते हैं।
यह त्योहार शिक्षा, कला और संगीत के क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए भी मनाया जाता है। परम श्रेध्य सरस्वती देवी जी शीश झुकाकर विनती हैं कि संपूर्ण प्राणी जगत को निर्मल विवेक प्रदान करें! ताकि संपूर्ण विश्व –
सर्वे भवन्तु सुखिन:!
सर्वे संतु निरामया||
का अति सुंदर भाव मन में धारण कर संपूर्ण विश्व कल्याण और अपने राष्ट्र के कल्याण का भाव मन में जागृत करें ताकि “वसुधैव कुटुम्बकम्” जो महा उपनिषद जैसे हिंदू धर्म ग्रंथों में पाया जाता है, जिसका अर्थ है, ” सारी दुनिया एक परिवार है!” का भाव जागृत हो।
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति!
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी
(वेदपाठी -ज्योतिषाचार्य)
