विशेषांक: “महाकुम्भ महापर्व वर्ष-2025”

अति पवित्र पावन धरा -भारतवर्ष के चार अति पवित्र तीर्थ स्थलों में आयोजित होने वाला “महाकुंभ महापर्व मेला” को दुनिया का सबसे बड़ा “श्री सत्य सनातन धर्म” धार्मिक आयोजन महापर्व कहा जाता है! इस महापर्व की छंठा अद्भुत, निराली और अविस्मरणीय हैं! महाकुंभ महापर्व मेले की उत्पत्ति का वर्णन 8वीं शताब्दी के दार्शनिक एवं प्रकांड महापंडित महाविद्वान् आदि जगत गुरु शंकराचार्य जी ने किया! पौराणिक साक्ष्य बताता है कि कैसे राक्षसों और राक्षसों ने समुद्र मंथन के रत्न कहे जाने वाले पवित्र घड़े यानि अमृत के कुंभ के लिए लड़ाई लड़ी| ऐसा माना जाता है कि मोहिनी का रूप धारण करके राक्षसों के चंगुल से भगवान श्री विष्णु हरि जी ने कुंभ को निकाला था| जब वे स्वर्ग की ओर इसे ले जा रहे थे, तो बूंदें उन चार स्थलों पर गिरीं, जहाँ आज इस महापर्व महाकुंभ मेले का आयोजन किया जाता है, अर्थात् पवित्र तीर्थ नगरी हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज जी महाराज तीर्थ!
महाकुंभ महापर्व का पौराणिक महत्व : पौराणिक कथाओं में कहा जाता है कि प्रजापति ब्रह्मा जी ने यमुना और गंगा के संगम पर स्थित दशाश्वमेध घाट पर अश्वमेध यज्ञ करके ब्रह्मांड का निर्माण किया था, जिसके कारण तीर्थ नगरी प्रयागराज में कुंभ सभी कुंभ त्योहारों में सबसे महत्वपूर्ण है! इस त्यौहार के ज्योतिषीय महत्व को समुद्र मंथन की कथा दर्शाती है, जब भगवान श्री विष्णु हरि जी को 12 दिव्य दिन स्वर्ग पहुँचने में लगे थे! श्री सत्य सनातन धर्म, हिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर बारहवें वर्ष जब माघ महीने में अमावस्या के दिन बृहस्पति मेष राशि में प्रवेश करता है, तो महापर्व महाकुंभ मनाया जाता है!
महाकुंभ महापर्व मेले का इतिहास : महाकुंभ महापर्व का महत्व अमृत है! इसके अलावा, ऐसा कहा जाता है कि महाकुंभ मेले के पीछे की कहानी तब की है जब देवता पृथ्वी पर रहा करते थे! ऐसा कहा जाता है कि ऋषि दुर्वासा जी के अभिशाप ने उन्हें दुर्बल कर दिया था और दुष्ट उपस्थिति ने ग्रह पर तबाही मचा दी थी! उस समय, भगवान श्री ब्रह्मा जी ने देवताओं को असुरों की सहायता से अनन्त स्थिति का अमृत बनाने के लिए प्रेरित किया| बाद में असुरों को पता चला कि देवताओं ने उनके साथ अमृत साझा न करने की योजना बनाई है इसलिए उन्होंने 12 दिनों तक उनका पीछा किया, जिसके दौरान अमृत चार स्थानों पर गिरा जहाँ अब महाकुंभ मेला आयोजित किया जा रहा है! हालाकि कुंभ मेले की शुरुआत के बारे में ठीक-ठीक बताना मुश्किल है, लेकिन कुछ विद्वानों के अनुसार, महाकुंभ मेला 3464 ईसा पूर्व में शुरू हुआ था और यह हड़प्पा और मोहनजो-दारो संस्कृति से 1000 साल से भी पहले से मौजूद एक परंपरा है! चीनी यात्री ह्वेन त्सांग की पुस्तक में ‘कुंभ-मेला’ का उल्लेख भी स्पष्ट रूप से किया गया है! 629 ईसा पूर्व में की गई अपनी ‘भारतयात्रा’ यात्रा विवरण में उन्होंने महान सम्राट हर्षवर्धन जी के राज्य में प्रयागराज तीर्थ नगरी में आयोजित हिंदू महाकुम्भ महापर्व मेले का उल्लेख स्पष्ट रूप से किया गया है!
श्री सत्य सनातन धर्म के महापर्व महाकुम्भ मेले से परमपूजनीय प्रकांड महापंडित कुमारिल भट्ट जी और परम श्रेध्य एवं पूजनीय आदि जगत गुरु शंकराचार्य जी का एक अविस्मरणीय अनमोल नाता है। यहाँ एक श्लोक है जो इस नाते को दर्शाता है-
श्लोक
कुमारिलभट्टेन येन शास्त्रार्थे विजयी कृतः
शंकराचार्येण तेन कुम्भे स्नानं समारभत्
अर्थात् प्रकांड महापंडित कुमारिल भट्ट जी ने जिस शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त करके चंपा नगरी में श्री सत्य सनातन की केसरिया पताका चाहुँओर फहराई थी, उसी पताका को परम श्रेध्य आदि जगत गुरु शंकराचार्य जी देश की एकता और अखंडता को एक सूत्र में बांधकर देश के चारों कोनों में चार पवित्र मठों की स्थापना की जो आज भी पूरी दुनिया में अति पवित्र और पूजनीय हैं तत्पश्चात परम पूज्य आदि जगतगुरु शंकराचार्य जी ने प्रयागराज तीर्थ नगरी में कुम्भ मेले में स्नान किया था!
प्रकांड महापंडित कुमारिल भट्ट जी एक महान विद्वान और शास्त्रार्थी थे, जिन्होंने आदि जगत गुरु शंकराचार्य जी के साथ शास्त्रार्थ किया था! परम श्रेध्य एवं पूज्य आदि जगत गुरु शंकराचार्य जी को श्री भगवान शिव का अवतार माना जाता है!
परम श्रेध्य आदि जगत गुरु शंकराचार्य जी ने कुम्भ मेले में स्नान किया था, जो एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है!
प्रकांड महापंडित महाविद्वान् कुमारिल भट्ट जी और अद्भुत, अविस्मरणीय ज्ञान के महापंडित आदि जगत गुरु शंकराचार्य जी का नाता एक महत्वपूर्ण धार्मिक नगरी प्रयागराज जी महाराज तीर्थ नगरी और भारतीय सनातन धर्म संस्कृति- शास्त्रीय पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है, जो अद्भुत और अनमोल संगम हैं!
महाकुम्भ मेला हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र महापर्व हैं! यहाँ एक पौराणिक श्लोक है जो महाकुम्भ मेले के महत्व को दर्शाता है-
श्लोक-
कुम्भे स्नानं सकृद् यस्तु करोति व्रतान्वितः!
तस्य पापं नाशं याति कोटिजन्मार्जितं तदा!!
अर्थात् – जो व्यक्ति महाकुम्भ मेले में व्रत के साथ स्नान करता है, उसके कोटि जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। महाकुम्भ मेला हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो संपूर्ण विश्व में श्री सत्य सनातन धर्म की एक आलौकिक शक्ति को दर्शाता हैं यह हर 12 वर्ष में आयोजित किया जाता है। यह मेला विश्व की सर्वश्रेष्ठ पवित्र एवं जीवनदायिनी माँ गंगा जी, यमुना जी, सरस्वती जी और गोदावरी जी नदियों के किनारे आयोजित किया जाता है। महाकुम्भ मेले में लाखों श्रद्धालु स्नान करने के लिए आते हैं, जो उनके पापों को धोने और मोक्ष प्राप्त करने के लिए माना जाता है।
महाकुम्भ मेले के दौरान विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। महाकुम्भ मेला हिंदू धर्म की एकता और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत और अनमोल प्रतीक है। भारतीय संस्कृति के इस महापर्व को संपूर्ण प्राणी जगत का कोटि कोटि नमन 🙏🙏
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति!
“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी
(वेदपाठी – ज्योतिषाचार्य )
आभार – जय श्री राम – जय श्री राम
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी
(शिक्षाविद) लक्ष्मीनगर!
