धर्म संसार : धर्मों रक्षिति रक्षित:

विशेषांक : वीरों की धरा भारतवर्ष:

श्लोक-
भारतं वर्षं पुण्यं कीर्तिमंतं विशेषतः
वीरबालकानां भूमिः पावनी सर्वदा!!

भावार्थ: परम पूजनीय भारतवर्ष एक पवित्र और पुण्यभूमि है, जो अपनी विशेष कीर्ति से विश्व में प्रसिद्ध है।
यह वीर बालकों की भूमि है, जो सदा पावन और पवित्र रहती है। उपरोक्त श्लोक भारतवर्ष की महिमा का वर्णन करता है और वीर बालकों की भूमि के रूप में इसकी प्रसिद्धि को दर्शाता है। आइए जानते हैं भारतमाता के कुछ और यशस्वी और वीर बालकों के अद्भुत शौर्य की महिमा-
एक बार औरंगजेब के दरबार मे एक शिकारी जंगल से बहुत बड़ा भयानक शेर पकड़ कर लाया! शेर को लोहे के पिंजरे में बंद किया गया था! पिंजरे में बंद शेर बार बार दहाड़ रहा था! उसकी दहाड़ से ओरंगजेब के सैनिक और दरबारी भी भयभीत और कम्पित हो जाते थे, क्योंकि शेर की दहाड़ तो दहाड़ हीं होती हैं जो मानव तो क्या, दानव में भी भय पैदा कर देती हैं! जब शेर दहाड़ रहा था ओरंगजेब अपने दरबार में पिंजरे में बंद भयानक शेर को देख इतराते हुए बोला- “ दुनिया में इससे बड़ा भयानक शेर दूसरा नहीं है”! ओरंगजेब के दरबार में बैठे उसके गुलाम स्वरूप दरबारियों ने भी उसकी हाँ में अपनी हाँ मिलाई!क्योंकि गुलाम तो करता हीं यही काम हैं! परंतु जोधपुर के महान यशस्वी महाराजा यशवंत सिंह ने ओरंगजेब की इस बात से असहमति जताते हुए कहा कि “इससे भी अधिक शक्तिशाली शेर तो हमारे पास है” ! बस फिर क्या था महाराजा यशवंत सिंह जी की बात को सुनकर मुग़ल बादशाह ओरंगजेब बड़ा क्रोधित हो उठा! उसने यशवंत सिंह से कहा कि यदि तुम्हारे पास इस शेर से अधिक शक्तिशाली शेर है तो अपने शेर का मुकाबला हमारे शेर से करवाओ, लेकिन तुम्हारा शेर यदि हार गया तो तुम्हारा सर काट दिया जाएगा!
महाराजा यशवंत सिंह ने ओरंगजेब की चुनौती को सहर्ष स्वीकार किया! अगले दिन भरे दरबार में शेरों की लड़ाई का आयोजन किया गया, जिसे देखने के लिए भारी भरकम भीड़ इकट्ठी हुई ! ओरंगजेब अपने स्थान पर एवं महाराजा यशवंत सिंह अपने बारह वर्षीय लाड़ले सुपुत्र पृथ्वी सिंह के साथ अपना आसन ग्रहण किये हुए थे!
ओरंगजेब ने यशवंत सिंह से प्रश्न किया “कहाँ है तुम्हारा शेर?” राजा यशवंत सिंह जी बड़े स्वाभिमान के साथ ओरंगजेब से कहा “तुम निश्चिन्त रहो मेरा शेर यहीं मौजूद है, तुम लड़ाई शुरू करवाओ “! ओरंगजेब ने शेरों की लड़ाई शुरू की जाने की घोषणा की! ओरंगजेब के शेर को लोहे के पिंजरे में छोड़ दिया गया! अब बारी थी महाराजा यशवंत सिंह के शेर की! महाराजा यशवंत सिंह ने अपने बारह वर्षीय नादान बालक पृथ्वी सिंह को आदेश दिया कि आप शेर के पिंजरे में जाओ और हमारी और से ओरंगजेब के शेर से युद्ध करो! (इस वीर बालक के मस्तक पर स्वाभिमान का अद्भुत शौर्य)यह सब देख वहाँ उपस्थित सभी लोग हैरान रह गए! अपने पिताश्री की आज्ञा का पालन करते हुए पृथ्वी सिंह पिताश्री को प्रणाम करते हुए, खूंखार शेर के पिंजरे में घुस गए!
शेर ने बालक पृथ्वी सिंह की तरफ देखा उस अद्भुत तेजस्वी बालक की आँखों में देखते ही वह शेर पूँछ दबाकर अचानक पीछे की ओर हट गया! यह देख किले में उपस्थित सभी लोग हैरान रह गए! तब क्रूर मुग़ल शासक के सैनिकों ने शेर को भाले से उकसाया, तब कहीं वह शेर बालक पृथ्वी सिंह की और लपका! शेर को अपनी और आते देख वीर बालक पृथ्वी सिंह ने अपनी तलवार म्यान में से खींच ली, अपने लाड़ले वीर पुत्र को तलवार खींचते देख महाराजा यशवंत सिंह जी जोर से चीखे “बेटा तू ये क्या कर रहा है, शेर के पास तलवार तो है नहीं फिर क्या तलवार चलायेगा, ये तो धर्म युद्ध नहीं है !”
पिताश्री की बात सुनकर बालक पृथ्वी सिंह ने तलवार तुरंत फेंक दी और वह शेर पर टूट पड़े, काफी संघर्ष के बाद उस वीर बालक पृथ्वी सिंह ने शेर का जबड़ा अपने हाथो से चीथड़े की तरह फाड़ दिया, और फिर उसके शरीर के टुकड़े -टुकड़े कर के फेंक दिये! औरंगजेब के भरे दरबार में सभी लोग वीर बालक पृथ्वी सिंह की जय जय कार करने लगे! वीर बालक पृथ्वी सिंह की जय – वीर बालक पृथ्वी सिंह की जय! शेर के खून से सना हुआ जब बालक पृथ्वी सिंह बाहर निकले तो यशस्वी राजा यशवंत सिंह जी ने दौड़कर अपने वीर बालक को छाती से लगा लिया !
(कहा जाता हैं कि उस दुष्ट और कपटी मुग़ल ने वीर बालक पृथ्वी सिंह जी को उपहार स्वरूप् वस्त्र दिए जिनमें जहर लगा हुआ था..!!
उन्हें पहने के बाद बालक पृथ्वी सिंह जी की मृत्यु हो गयी थी..!! .)
ऐसे थे हमारे पूर्वजों के कारनामे जो वीरता से ओतप्रोत थे। ऐसे वीर बालक राष्ट्र की भावी पीढ़ी के लिए सदा प्रेरणास्रोत बने रहेंगे!

ऐसे वीर बालक के नाम पर बाल दिवस मनाना चाहिए, बाल दिवस के सच्चे हकदार चार वीर बालक साहिबजादों के नाम हैं:1. साहिबजादा अजीत सिंह, 2. साहिबजादा जुझार सिंह, 3. साहिबजादा जोरावर सिंह, 4. साहिबजादा फतेह सिंह! ये सभी अत्यंत महान वीर बालक साहिबजादे अपने पिताश्री परम श्रेध्य एवं पूजनीय गुरु गोविन्द सिंह जी के सिख धर्म के सिद्धांतों के लिए लड़े और शहीद हुए।

हिंदू धर्म- श्री सत्य सनातन धर्म

  1. साहिबजादा अजीत सिंह: परम पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी के बड़े पुत्र, जो मात्र 14 साल की अल्पायु (उम्र) में चमकौर की लड़ाई में शहीद हुए।
  2. साहिबजादा जुझार सिंह: परम पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी के दूसरे पुत्र, जो अल्पायु में चमकौर की लड़ाई में शहीद हुए।
  3. साहिबजादा जोरावर सिंह: परम पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी के तीसरे पुत्र, जिन्होंने मात्र 9 साल की उम्र में चमकौर की लड़ाई में शहीदत दी और सच्चे धर्म मार्ग पर चलकर सदा सदा के लिए भारत माता की गोद में सो गए।
  4. साहिबजादा फतेह सिंह:परम पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी के चौथे पुत्र, जिन्होंने अत्यंत अल्पायु मात्र 6 साल की उम्र में सरहिंद की लड़ाई में शहीद हुए।
    परम श्रेध्य एवं पूज्य वीर बालक वीर हकीकत राय जी, जिन्होंने इस्लाम कभी कबूल नहीं किया और सनातन धर्म और राष्ट्र का मस्तक गर्व से सदा ऊँचा रखा! ऐसे वीर बालकों के अत्यंत महान बलिदान के कारण हीं हम और हमारी संस्कृति युगों युगों से जीवंत हैं| ऐसे वीर बालकों को संपूर्ण सनातन धर्म समाज एवं विश्व सदा सदा तक सच्चे हृदय से कोटि कोटि नमन करता रहेगा! ऐसे थे हमारे पूर्वजों के कारनामे जो वीरता से ओतप्रोत थे। ऐसे वीर बालक राष्ट्र की भावी पीढ़ी के लिए सदा प्रेरणास्रोत बने रहेंगे!
    जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति
    “ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”

पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी
(वेदपाठी -ज्योतिषाचार्य)

सर्वे भवन्तु सुखिन:!
सर्वे संतु निरामया!!
जय श्री राम – जय श्री राम
आभार –
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी
(शिक्षाविद) लक्ष्मीनगर|

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