विशेषांक – भारतवर्ष महापराक्रमी परम
वीरों की पावन भूमि

भारतीय इतिहास में इतिहास की दृष्टि से राजस्थान अत्यंत समृद्ध, राष्ट्र प्रेम एवं सनातन धर्म संस्कृति की धरोहर को संरक्षित रखनेवाला अद्भुत, अनमोल और अविस्मरणीय राज्य है, जिसकी जड़े अत्यंत गहरी और अत्यंत विशाल हैं| यह शौर्य और अदम्य पराक्रमी वीरों का राज्य जैसे परम श्रेध्य हिंदू हृदय सम्राट पृथ्वीराज चौहान जी, महाराणा कुंभा जी, महाराणा सांगा जी और महाराणा प्रताप जी, महान सम्राट जैसे वैभवशाली प्रतापी राजाओं का जन्म स्थान है जिन्होंने अपने पराक्रम से राजस्थान व भारतवर्ष को विदेशी आक्रान्ताओं से बचाने में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। इन्हीं अत्यंत महान पराक्रमी वीर योद्धाओं में से एक थे “बप्पा रावल” जिनके डर से 400 वर्षों तक विदेशी आक्रमणकारियों ने भारतवर्ष आने की हिम्मत नहीं दिखाई।
जब-जब भारत के इतिहास को पढ़ा जायेगा तब-तब राजस्थान और मेवाड़ का नाम अग्रणी होगा।
परम पूज्य मेवाड़ राजघराने केआदिपुरुष अद्भुत शौर्य के धनी बप्पा रावल जी का जन्म सन 713-14 ई. में हुआ था। महान बप्पा रावल जी को “कालभोज” के नाम से भी जाना जाता है, इनके समय चित्तौड़ पर मौर्य शासक मान मोरी का राज था। सन 734 ई. में बप्पा रावल जी ने मात्र 20 वर्ष की आयु में मान मोरी को युद्ध में पराजित कर चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया था।
वैसे तो गुहिलादित्य/गुहिल को गुहिल वंश का संस्थापक कहते हैं, परंतु गुहिल वंश का वास्तविक संस्थापक बप्पा रावल जी को माना जाता है, पंथ प्रवर्तक परम श्रेध्य बप्पा रावल जी जिन पुण्य नामों के स्मरण मात्र से रक्त में ज्वार आ जाता है, और सिर जिनकी स्मृति में बड़ी श्रद्धा से स्वम ही झुक जाता है, ऐसे अनेक प्रातः स्मरणीय नामों में से एक नाम है महान सम्राट बप्पा रावल जी !
महान सम्राट बप्पा रावल जी एक अत्यंत न्यायप्रिय शासक थे। वे राज्य को अपना नहीं मानते थे, बल्कि परम पूज्य शिवजी के एक रूप ‘एकलिंग जी’ को ही उसका असली शासक मानते थे और स्वयं उनके प्रतिनिधि के रूप में शासन चलाते थे। लगभग 20 वर्ष तक शासन करने के बाद उन्होंने वैराग्य ले लिया और अपने पुत्र को राज्य देकर परम पूज्य शिवजी की उपासना में लग गये।
परम पूजनीय महाराणा संग्राम सिंह जी (राणा सांगा), परम श्रेध्य उदय सिंह जी और शौर्य और स्वाभिमान के अद्भुत प्रतीक महाराणा प्रताप जी जैसे श्रेष्ठ और परमवीर शासक उनके ही वंश में उत्पन्न हुए थे, जिन्होंने पूरी दुनिया में भारत माता का शीश बड़े गर्व से चमकते सूर्य की भाँति पूजनीय बना दिया।उन्होंने अरब की हमलावर सेनाओं, अक्रांताओं को कई बार ऐसी भयंकर करारी हार दी कि अगले 400 वर्षों तक किसी भी मुस्लिम शासक की हिम्मत भारतवर्ष की ओर आंख उठाकर देखने तक की नहीं हुई। बहुत बाद में महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत की थी, महान सम्राट पृथ्वीराज चौहान के हाथों सत्रह बार पराजित हुआ, और पीठ दिखाकर भाग गया था, चूँकि भारतीय संस्कृति के महान यौद्धा पीठ दिखाकर भागने वाले पर कभी वार नहीं करते थे। सूर्य अस्त होने पर युद्ध विराम और शरण में आए हुए को माफ़ कर देते थे|
वीरों की महान भूमि राजस्थान और मेवाड़ राज्य के संस्थापक व परमवीर योद्धा परम श्रेध्य बाप्पा रावल जी की महानता का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान का प्रमुख शहर रावलपिंडी उनके ही नाम पर बना था। विदेशी आक्रमणकारियों को नाकों चने चबवाने वाले, और धरती में जमीदोज़ करने वाले अत्यंत परमवीर महान यौद्धा बाप्पा रावल जी का सैन्य ठिकाने वहाँ होने के कारण रावलपिंडी को यह नाम मिला।
परमवीर अत्यंत महान योद्धा बप्पा रावल जी आठवीं सदी में मेवाड़ की स्थापना करने वाले बप्पा जी भारतीय सीमाओं से बाहर ही विदेशी आक्रमणों का प्रतिकार करना चाहते थे। परम पूज्य बप्पा रावल जी ने सिंध तक आक्रमण कर अरब सेनाओं को खदेड़ा-लताड़ा था।
उनकी अत्यंत महान वीरता से प्रभावित गजनी के सुल्तान ने अपनी पुत्री का विवाह भी उनसे (सम्राट बप्पा रावल जी) किया था। मेवाड़ में बप्पा जी व दूसरे प्रदेशों में इस परमवीर शासक को बापा भी पुकारा जाता था। अबुल फजल ने मेवाड़ राजवंश को नौशेरवा की उपाधि प्रदान की थी।
महान सम्राट बप्पा रावल जी और गुर्जर प्रतिहार के संस्थापक परम वीर महान यौद्धा परम श्रेध्य नागभट्ट प्रतिहार जी का सयुंक्त मोर्चा:
महान सम्राट बप्पा रावल जी पर यह सर्वोत्तम श्लोक उनकी महानता को दर्शाता है:
“बप्पा रावलः महाराजः मेवाड़ क्षेत्रे प्रसिद्धः।
चित्तौड़गढ़ के संस्थापकः, वीरता और धैर्य के प्रतीकः।”
अर्थात् परम श्रेध्य बप्पा रावल जी महाराजा मेवाड़ क्षेत्र में प्रसिद्ध हुए, चित्तौड़गढ़ के संस्थापक, वीरता और धैर्य के महान प्रतीक हैं।
“बप्पा रावलः महान् योद्धा, महान् प्रशासकः।
मेवाड़ की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया।”
अर्थात् बप्पा रावल जी महान योद्धा और अत्यंत महान प्रशासक थे, मेवाड़ की रक्षा के लिए अपना संपूर्ण जीवन ही समर्पित कर दिया।
इसी प्रकार महान सम्राट नागभट्ट जी पर भी ये श्लोक उनकी महान कार्यकुशलता, सनातन धर्म रक्षक और राष्ट्र भक्ति को दर्शाता है:
अर्थात् “नागभट्टः महाराजः मेवाड़ क्षेत्रे प्रसिद्धः।
चित्तौड़गढ़ के रक्षकः, वीरता और धैर्य के प्रतीकः।”
अर्थात् परम श्रेध्य नागभट्ट महाराजा मेवाड़ क्षेत्र में अत्यंत प्रसिद्ध हुए, और चित्तौड़गढ़ के रक्षक, वीरता और धैर्य के प्रतीकता के चमकते सितारें के रूप में विख्यात हुए।
“नागभट्टः महान् योद्धा, महान् प्रशासकः।
मेवाड़ की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया।”
महान सम्राट नागभट्ट जी महान योद्धा और अत्यंत महान प्रशासक थे, उन्होंने मेवाड़ की रक्षा के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
इन दोनों महान सम्राटों की राष्ट्रभक्ति और सनातन धर्म रक्षता को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता-
बप्पा रावलः और नागभट्टः।
राष्ट्रभक्ति और सनातन धर्म रक्षता कृतम्, और अमर हो गए।
अर्थात् सम्राट बप्पा रावल जी और सम्राट नागभट्ट जी ने राष्ट्रभक्ति और सनातन धर्म रक्षा की, और सदा सदा के श्री सनातन धर्म संस्कृति के लिए अमर हो गए।
इतिहासकारों के अनुसार महान सम्राट बप्पा रावल जी की विशेष प्रसिद्धि अरबों से सफल युद्ध करने के कारण हुई। सम्राट बप्पा रावल जी ने मुहम्मद बिन क़ासिम को युद्ध में भयंकर तरीके से हराकर सिंधु को उससे जीता था।
राजस्थान के कुछ महान् व्यक्ति जिनमें विशेष रूप से महान प्रतिहार सम्राट् नागभट्ट जी प्रथम और बप्पा रावल जी के नाम विशेष रूप से उल्लेख्य हैं। महान यौद्धा नागभट्ट जी प्रथम ने अरबों, मुगलों आक्रांताओं को पश्चिमी राजस्थान और मालवा से मार भगाया था। परम श्रेध्य बप्पा रावल जी ने यही कार्य मेवाड़ और उसके आसपास के प्रदेश के लिए किया। मौर्य शायद इसी अरब आक्रमण से जर्जर हो गए हों। बापा रावल जी ने वह कार्य किया जो मौर्य करने में असमर्थ थे, और साथ ही चित्तौड़ पर भी अधिकार कर लिया। महान सम्राट बप्पा रावल जी के मुस्लिम देशों पर विजय की अनेक कथाएँ इतिहास में हैं। महान सम्राट बप्पा रावल जी ने मुगल लुटेरों/आक्रांताओं को इस कदर हराया था, कि अगले 400 सालों तक मुगलों/आक्रांताओं की भारतवर्ष की ओर आँख उठाने तक की हिम्मत नहीं हुई थी- भारत पर दुबारा आक्रमण करने की| उन्होंने अफगानिस्तान तक अरबों को खदेड़ा था।
“धर्मों रक्षति रक्षिति:” वाक्यांश का उल्लेख प्राचीन महाग्रन्थ “महाभारत” में भी तीन बार हुआ है, तथा मनुस्मृति में भी इसका अति सुंदर तरीके से उल्लेख मिलता हैं।
वन पर्व (अरण्य पर्वध्याय) में युधिष्ठिर ने एक यक्ष से कहा –
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।। तस्माद् धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत्।।
महाभारत 3.313.128 गीता प्रेस हिन्दी गोरखपुर|
अर्थात् जो पुण्य का त्याग करता है, वह स्वयं नष्ट हो जाता है। और जो उसे सुरक्षित रखता है, वह स्वयं सुरक्षित रहता है। इसलिए मैं पुण्य का त्याग नहीं करता, क्योंकि मुझे लगता है कि अगर इसे नष्ट कर दिया गया, तो यह हमें नष्ट कर देगा।
आज हम इन्हीं बलिदानियों के महान बलिदानों के कारण अस्तित्व में बचे हुए हैं। अतः यह आवश्यक हो जाता हैं कि राष्ट्र की भावी पीढ़ी को इन महावीरों के अद्भुत पराक्रम एवं शौर्य से भलीभांति अवगत कराया जाए ताकि राष्ट्र के हर युवा में राष्ट्र भक्ति के मधुर और पवित्र पावन अंकुर प्रफुल्लित हो! परम पूजनीय भारत माँ की रक्षार्थ हेतु समस्त महावीरों, और संबंधित वंशों को समस्त प्राणी जगत कोटि कोटि नमन करता हैं!🙏
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति!
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर!
ज्ञान-कोष : संघे शक्ति सर्वदा!
जात पात पूछे नाहिं कोई!
जो हरि को भजे सो हरि का होइ!!
- संघे शक्ति सर्वदा: यहाँ “संघ” का अर्थ है एकता और संगठन। यह उद्धरण बताता है कि एकता में ही शक्ति होती है।
- जात पात पूछे नहीं कोई: यह उद्धरण बताता है कि जब हम एकता के साथ खड़े होते हैं, तो हमें किसी की जाति या पात की परवाह नहीं करनी चाहिए।
- जो हरी को भजे सो हरि का होइ: यह उद्धरण बताता है कि जो कोई भी भगवान की पूजा करता है, वह भगवान का हो जाता है। यहाँ भगवान का अर्थ है एक उच्च शक्ति जो हम सभी को एकता में बांधती है।
- राष्ट्रीय एकता को बल मिलता हैं: यह उद्धरण बताता है कि जब हम एकता के साथ खड़े होते हैं, तो हमें राष्ट्रीय एकता की शक्ति मिलती है।
यह उद्धरण हमें एकता, समरसता, और राष्ट्रीय एकता के महत्व को समझने के लिए प्रेरित करता है।समस्त राष्ट्रभक्तों को कोटि कोटि नमन
आभार – पंडित राकेश कुमार कौशिक जी! ( शिक्षाविद्द)
लक्ष्मीनगर (मुज़फ्फरनगर )|
