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विशेषांक : नारी सशक्तिकरण की बेमिशाल मूर्ति – महारानी लक्ष्मी बाई जी जयंती महापर्व!

परमपूजनीय महारानी लक्ष्मीबाई जी विश्व इतिहास के पन्नों में नारी सशक्तिकरण की बेमिशाल मूर्ति, अद्भुत शौर्य की अत्यंत महान वीरांगना और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की जीती जगती अनमोल एवं अविस्मरणीय दिव्य ज्योति थीं। उनके संबंध में उक्त श्लोक का स्मरण कीजिए :

“लक्ष्मीबाई वीरतामूर्तिः साहसिका स्त्री रत्नम्।
जिह्वा से बोली ‘मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी’।”

भावार्थ: परम पूजनीय महारानी लक्ष्मी बाई जी वीरता की मूर्ति और साहसिक स्त्री रत्न है, जिन्होंने अपने जीते जी अपनी झाँसी नहीं देने का सच्चा संकल्प लिया, जो राष्ट्रप्रेम का एक प्रेरणादायक मूलमंत्र हैं! परम श्रेध्य “महारानी लक्ष्मीबाई जी अमर हुई, उनकी अद्भुत बेमिशाल वीरता की गाथा, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान अतुलनीय है।”

याद रखिए भारत में जब भी महिलाओं के सशक्तिकरण की चर्चा होती है तो अत्यंत महान वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई जी की चर्चा जरूर होती है। महारानी लक्ष्मीबाई जी ना सिर्फ एक महान नाम है बल्कि वह एक आदर्श भी हैं उन सभी महिलाओं के लिए जो खुद को बहादुर मानती हैं और उनके लिए भी एक आदर्श हैं जो महिलाएँ सोचती है कि वह महिलाएँ हैं तो कुछ नहीं कर सकती।
देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली महारानी लक्ष्मीबाई जी के अप्रतिम शौर्य से चकित होकर अंग्रेजों ने भी उनकी प्रशंसा तथा अंग्रेज अफसर ने भी सर झुकाकर सल्यूट किया था! और वह अपनी वीरता के किस्सों को लेकर किंवदंती बन चुकी हैं।
रानी लक्ष्मीबाई का जीवन: महारानी लक्ष्मीबाई जी का जन्म 19 नवंबर, 1828 को पवित्र नगरी काशी के असीघाट, वाराणसी में हुआ था। इनके पिताश्री का नाम पंडित मोरोपंत तांबे और माताश्री का नाम परम श्रेध्य ‘भागीरथी बाई’ जी था। इनके बचपन का नाम ‘मणिकर्णिका’ रखा गया परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को ‘मनु’ पुकारा जाता था। मनु जब मात्र चार साल की थीं, तब उनकी माँ का निधन हो गया। पत्नी के निधन के बाद पंडित मोरोपंत मनु को लेकर झाँसी चले गए। महारानी लक्ष्मी बाई जी का बचपन उनके नाना के घर में बीता, जहाँ वह छबीली कहकर पुकारी जाती थी, छोटी उम्र में ही उनकी शादी झाँसी के राजा पंडित गंगाधर राव जी के साथ कर दी गई। रानी लक्ष्मीबाई जी को शादी के बाद महारानी के नाम से सुशोभित किया जाने लगा!
उनकी शादी के बाद झाँसी की आर्थिक स्थिति में अप्रत्याशित सुधार हुआ। हर तरह से अश्वारोहण और शस्त्र-संधान में निपुण महारानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी किले के अंदर ही महिला-सेना खड़ी कर ली थी, जिसका संचालन वह स्वयं मर्दानी पोशाक पहनकर करती थीं। उनके पति पंडित राजा गंगाधर राव जी यह सब देखकर प्रसन्न रहते। कुछ समय बादरानी लक्ष्मीबाई जी ने एक पुत्र को जन्म दिया, पर कुछ ही महीने बाद बालक स्वर्ग सिधार गया। पुत्र-रत्न वियोग के आघात से दु:खी महाराजा ने 21 नवंबर, 1853 को प्राण त्याग दिए। झाँसी शोक में डूब गई। अंग्रेजों ने अपनी कुटिल नीति के चलते झाँसी पर चढ़ाई कर दी। महारानी ने कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए तोपों से युद्ध करने की रणनीति बनाते हुए कडक़-बिजली, घनगर्जन, भवानी शंकर आदि तोपों को किले पर अपने अत्यंत विश्वासपात्र तोपचियों का अविस्मरणीय संचालन किया!

खूब लड़ी मर्दानी वह तो,
झाँसी वाली रानी थी ।।

महारानी लक्ष्मीबाई जी का देवी चण्डी स्वरूप: 14 मार्च, वर्ष 1857 से आठ दिन तक तोपें किले से आग उगलती रहीं। अंग्रेज सेनापति ह्यूरोज लक्ष्मीबाई की किलेबंदी देखकर दांतों तले ऊँगली दबा गया। रानी रणचंडी का साक्षात रूप रखे पीठ पर दत्तक पुत्र दामोदर राव को बाँधे बहुत भयंकर युद्ध करती रहीं। झाँसी की मुट्ठीभर सेना ने अंग्रेजों को नाकों चने चबा दिए! महारानी की प्रियतम परम श्रेध्य झलकारी बाई और मुंदर सखियों ने भी रणभूमि में अपना खूब कौशल दिखाया। 17 जून को भयंकर युद्ध हुआ। महारानी के भयंकर प्रहारों से अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा, और अंग्रेज सेना पीठ दिखाकर भाग खड़ी हुई! इस भयंकर युद्ध में महारानी की शानदार विजय हुई, लेकिन 18 जून को तिलमिलाया ह्यूरोज स्वयं युद्धभूमि में आ डटा। महारानी लक्ष्मीबाई जी ने दामोदर राव को रामचंद्र देशमुख को सौंप दिया। सोनरेखा नाले को रानी का घोड़ा पार नहीं कर सका। वहीं एक सैनिक ने पीछे से रानी पर तलवार से ऐसा जोरदार प्रहार किया कि उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और आँख क्षतिग्रस्त। घायल होते हुए भी महारानी ने उस अंग्रेज सैनिक को मौत के घाट उतार दिया और फिर अपने प्राण त्याग दिए। 18 जून, 1857 को बाबा गंगादास की कुटिया में जहाँ इस वीर महारानी ने प्राणांत किया वहीं चिता बनाकर उनका अंतिम संस्कार किया गया। अद्भुत और बेमिशाल शौर्य के सामने अंग्रेज अफसर एह्युम ने भी किया था सर झुकाकर सल्यूट! महारानी लक्ष्मीबाई जी ने कम उम्र में ही साबित कर दिया कि वह न सिर्फ एक बेहतरीन सेनापति हैं बल्कि कुशल प्रशासक भी हैं। वह महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाने की भी पक्षधर थीं। उन्होंने अपनी सेना में महिलाओं की भर्ती की थी। आज कुछ लोग जो खुद को महिला सशक्तिकरण का अगुआ बताते हैं वह भी स्त्रियों को सेना आदि में भेजने के खिलाफ हैं पर इन सब के लिए महारानी लक्ष्मीबाई जी इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा एक बेमिशाल उदाहरण हैं कि अगर महिलाएँ चाहें तो कोई भी मुकाम हासिल कर सकती हैं, ऐसी अत्यंत महान शख्शियत की बेमिशाल शौर्यगाथा राष्ट्र की भावी पीढ़ी के लिए हमेशा हमेशा के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी और राष्ट्र के युवा धन में राष्ट्रभक्ति का निर्मल संचार करती रहेगी!विनती हैं, कि राष्ट्र के युवाओं का मार्गदर्शन करनेवाले सजग प्रहरी रूपी गुरुजन भी समय समय पर राष्ट्र की भावी पीढ़ी में नारी सशक्तिकरण और अद्भुत शौर्य की बेमिशाल गाथा को लिखने वाली महान नारियों /महापुरुषों / राष्ट्र भक्तों की जीवन शैली से अवगत कराते हुए राष्ट्र भक्ति का नवसंचार करते रहें! जय हिंद -जय भारत -जय भारतीय संस्कृति!
“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”

पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी!
(वेदपाठी -ज्योतिषाचार्य )

जब एक अंग्रेज अफसर ने सर झुकाकर सल्यूट किया और लिखा: ‘हमारी किस्मत अच्छी थी कि महारानी लक्ष्मीबाई जी के पास उनके जैसे आदमी नहीं थे!’ संपूर्ण प्राणी जगत इस अत्यंत महान वीरांगना और नारी सशक्तिकरण की बेमिशाल शौर्य गाथा लिखने वाली देवी जी को कोटि कोटि नमन करता हैं!🙏
आभार – पंडित राकेश कुमार कौशिक जी! (शिक्षविद्द )!
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर!

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