धर्मो रक्षिति रक्षितः

विशेषांक : जीवन में धर्म पालन की महत्ता :

जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसी की रक्षा करता है।

यह श्लोक हमें बताता है कि धर्म की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है, और जब हम धर्म की रक्षा करते हैं, तो धर्म भी हमारी रक्षा करता है।

इस श्लोक का अर्थ गहरा है और हमें धर्म के प्रति समर्पित होने की प्रेरणा देता है। कहने का तात्पर्य यह हैं कि सच्चे धर्म का पालन करने वाला कभी भी अधर्मी नहीं हो सकता! वह सभी धर्मों का सच्चे हृदय से पालन करता है शीश झुकता हैं, सहयोग करता और हमेशा धर्म के मार्ग पर चलकर अपने राष्ट्र की तन मन धन से रक्षा करता हैं!

कुछ और श्लोक जो इसी भावना को व्यक्त करते हैं:

धर्मः संस्कृति कः स्यात्
धर्मः सुखम् अवाप्नुयात्
धर्मः सर्वेषाम् अधिकः

भावार्थ : सच्चा धर्म ही संस्कृति का आधार है। धर्म के पालन से सुख प्राप्त होता है। धर्म सभी के लिए सर्वोपरि है। इसलिए राष्ट्र धर्म को जीवन अपनाइए!
श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति विश्व की सर्वोत्तम संस्कृति है, और सबसे प्राचीन धर्म संस्कृति हैं, अन्य तो बस केवल मज़हब, पंथ, अथवा गुरु पथ चलन मार्ग ही हैं! सच्चाई से दिल में यदि झाककर देखे तो श्री सत्य सनातन धर्म ही दुनिया का वह इकलौता धर्म हैं, जो कि हमें जीवन के सही मार्ग पर चलने की अनमोल प्रेरणा देती है। इसके द्वार से तो निकलने वाला प्राणी भी नफ़रत नहीं अपितु श्रद्धा से शीश झुकाकर मिठास रूपी प्रसाद बाँटता हैं! प्रसाद अर्थात्
प = परमात्मा, सा = साक्षात, द = दर्शन यानि के प्रसाद का अर्थ हुआ परमात्मा के साक्षात दर्शन! और सर्वे भवन्तु सुखिन : की कामना करता हैं! ऐसी अति शुद्ध विचार शैली मिलना श्री सत्य सनातन धर्म से अलग दुनिया के किसी भी पंथ, मज़हब में मिलना भी दुर्लभ अर्थात् नामुमकिन हैं! श्री सत्य सनातन धर्म की महानता कुछ इन श्लोकों से स्पष्ट झलकती हैं!

वेदों की जन्मभूमि,
ऋषियों की तपोभूमि!
श्री सनातन धर्म ही है,
जगत की श्रेष्ठ धूमि।

अर्थात् परम पवित्र वेदों की उत्पत्ति और अत्यंत महान ऋषियों के तप की भूमि होने के कारण श्री सनातन धर्म विश्व में सर्वश्रेष्ठ है।

श्री सनातन धर्म की महानता को नमन|
विश्व की सर्वोत्तम संस्कृति को प्रणाम।|

अर्थात् श्री सनातन धर्म की महानता को कोटि कोटि नमन और विश्व की सर्वोत्तम संस्कृति को प्रणाम।

इस पवित्र पावन संस्कृति के मूल तत्वों का अनुसरण कीजिए, जीवन ही बदलकर आनंदमय और सुखमय हो जाएगा: (i) सत्य, (ii) धर्म, (iii) करुणा, (iv) अहिंसा, (v) ब्रह्मचर्य|

इन अनमोल मूल तत्वों को जीवन में अपनाकर हम अपने जीवन को पूर्णतः सही दिशा में ले जा सकते हैं!

कुछ विश्व प्रसिद्ध श्री सनातन धर्म के परम श्रेध्य महाग्रंथ:
(i) वेद, (ii) उपनिषद, (iii) पुराण, (iv) श्रीमदभागवत गीता, (v) अत्यंत महान महाकाव्य श्रीरामायण, (vi) महाभारत महाग्रन्थ!

इन महान ग्रंथों में जीवन के हर पहलू का अत्यंत अनमोल वर्णन है, जो कि हमें जीवन के सही मार्ग पर चलने की सच्ची प्रेरणा देते हैं!

श्री सनातन धर्म के अत्यंत महान ऋषि-मुनि, जिनकी अत्यंत मनभावन अति सुंदर छवि आज बहुत आकाश में सप्तऋषियों के रूप में विद्वान् है!

अत्यंत महान परम श्रेध्य सप्त ऋषियों के नाम:

  1. परम पूजनीय ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ जी,
  2. परम पूजनीय विश्वामित्र जी,
  3. परम पूजनीय कण्व जी,
  4. परम पूजनीय कपिल जी
  5. परम पूजनीय नारद जी
  6. परम पूजनीय मारीचि जी एवं
  7. परम पूजनीय अत्रि जी

जानिए श्लोक:

वशिष्ठः विश्वामित्रः कण्वः कपिलः नारदः!
मारीचिरात्रिः सप्त ऋषयः प्रोक्ताः ।

भावार्थ : परम पूजनीय वशिष्ठ जी, विश्वामित्र जी, कण्व जी, कपिल ही, नारद जी, मारीचि जी और अत्रि जी – ये सात ब्रह्म ऋषि हैं जिन्हें सप्त ऋषि कहा जाता है।

इन सप्त ऋषियों ने वेदों की रचना की और श्री सत्य सनातन धर्म अर्थात् हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों को बनाया। वे अपने अद्भुत ज्ञान और अत्यंत कठोर तपस्या के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं।
साथ ही साथ (i) परम पूजनीय ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ जी (ii) परम पूजनीय ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र जी, (iii) परम श्रेध्य महृषि कण्व जी (iv) ब्रह्म ऋषि कपिल जी , (v) परम ब्रह्म ऋषि एवं दुनिया के प्रथम पत्रकार परम श्रेध्य नारद जी!

इन ऋषि-मुनियों ने श्री सनातन धर्म की महानता को विश्व में प्रसारित किया!

आइए हम श्री सनातन धर्म की महानता को समझें और अपने जीवन को सही दिशा में ले जाएँ!

वसुधैव कुटुम्बकम् : ‘संपूर्ण विश्व को एक परिवार’ मानने की विशाल भावना भारतीयता में समाविष्ट है। इस वसुंधरा के पुत्र सभी एक ही कुटुम्ब के हैं, भले ही कोई किसी भी धर्म, प्रांत, समाज, जाति या देश का हो वे सभी एक ही कुल और कुटुम्ब के हैं। ऐसी भावना रखने से ही मनुष्य, मनुष्य से प्रेम करेगा, तथा विश्व का कल्याण होगा!

अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम।।

अर्थात : यह मेरा है, यह पराया है, ऐसे विचार तुच्छ या निम्न कोटि के व्यक्ति करते हैं। उच्च चरित्र वाले व्यक्ति समस्त संसार को ही कुटुम्ब मानते हैं, और इसी धारणा में विश्व कल्याण की अवधारणा भी समाहित है।

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दु:ख भाग्भवेत।।
परम श्रेध्य आदि जगत गुरु शंकराचार्य जी, परम श्रेध्य पंडित कुमारिल भट्ट जी, परम श्रेध्य रामानुजाचार्य जी, परम श्रेध्य वल्लभाचार्य जी, माध्यवाचार्य जी, परम श्रेध्य महान आचार्य चाणक्य जी, परम पूज्य पंडित विष्णु भट्ट जी (विष्णु मठ ), परम पूज्य पंडित गोपाल भट्ट जी, महान ऋषि परम श्रेध्य याज्ञयव्लक्या जी, महाराणा प्रताप जी, परम श्रेध्य छत्रपति शिवाजी महाराज जी, पंडित बाजीराव भट्ट जी, बाप्पा रावल जी, महारानी लक्ष्मीबाई जी, वातसल्य रस के सम्राट सूरदास जी, परम श्रेध्य गुरु गोविन्द सिंह जी, परम पूजनीय गुरु नानक देव जी, महाकवि तुलसीदास जी, महासन्त कबीर दास जी, महाकवि रसखान जी, और रहीम जी आदि अनेक ऐसे महान संत और राष्ट्र भक्त हुए जिन्होंने धर्म और राष्ट्र धर्म का पालन करते हुए भावी पीढ़ी को राष्ट्र धर्म सेवा मार्ग पर चलने की सच्ची प्रेणना दी! जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति!

“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”

पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी
( वेदपाठी – ज्योतिषचार्य )
आभार – पंडित राकेश कुमार कौशिक जी ( शिक्षाविद्द )!

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