विशेषांक- अति पवित्र पावन धर्म ग्रंथों ( विद्वानों) की वाणी राष्ट्रभक्ति की निर्मल धारा – पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी|

पवित्र पावन भारतीय संस्कृति- श्री सत्य सनातन धर्म अर्थात् हिंदुत्व संस्कृति का इतिहास अत्यंत वैभवशाली और गौरवशाली इतिहास रहा हैं । ये पूरी दुनिया की सबसे प्राचीनतम संस्कृति है। श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति का इतिहास पराजय का नहीं, यह अत्यंत अद्भुत, अनमोल और अविस्मरणीय पराक्रम का गौरवशाली इतिहास रहा है। दुनिया की सबसे प्राचीन हिंदू संस्कृति कहती है- “वसुधैव कुटुम्बकम” अर्थात सम्पूर्ण विश्व ही हमारा परिवार है। धर्म और विज्ञान का योग इस संस्कृति में पूर्ण रूप से देखने को मिलता है।
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥”
भावार्थ- जो स्वधर्म (हिंदू) विमुख होकर धर्म का विनाश कर देता है! उस का विनाश धर्म कर देता है। जो धर्म का संरक्षण करता है, धर्म उसका संरक्षण करता है । इसलिए मरा हुआ धर्म कहीं हमें न मार डाले।
“अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च:।”
भावार्थ- अहिंसा ही परम धर्म है! धर्मरक्षा के लिए कि गयी धर्म हिंसा उससे उत्तम धर्म है!
“धर्मो रक्षति रक्षित: !”
भावार्थ – आप धर्म की रक्षा करें..! धर्म आपकी रक्षा करेगा!
“राष्ट्ररक्षासमं पुण्यं, व्रतम्, यज्ञो, दृष्टो नैव च नैव च।।”
भावार्थ- राष्ट्र रक्षा से बड़ा कोई कर्म नहीं, कोई व्रत नहीं, कोई यज्ञ नहीं। अतः अपने राष्ट्र के प्रति प्रत्येक मानव का धर्म हैं कि वह सच्चे तन-मन-धन से सर्वदा अपने राष्ट्र की सच्ची सेवा करें! अपने अति प्राचीन इतिहास और संस्कृति पर नज़र डालिए आप पुरे विश्व के कर्णधार रहे हैं, आपके परम् श्रेध्य (इष्टदेव जी )पूर्वजों ने भी राष्ट्रधर्म को ही अपना सर्वोपरि माना हैं, लंका विजय उपरांत भी मर्यादापुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी ने अपनी राष्ट्रभूमि को ही पूजनीय माना हैं!
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥
क्योंकि शास्त्रों में स्पष्ट कि जो इंसान अपने राष्ट्र और अपने हिंदुत्व (धर्म) से विमुख हो जाता हैं उसकी आत्मा तो क्या स्वम परमात्मा भी सम्मान नहीं करते|
“यतो धर्मस्ततो जयः।”
भावार्थ- जहां धर्म है, वहां जीत है।
“ब्राह्में मुहूर्ते बुद्धयेत,धर्मार्थौ चानुचिंतयेत।”
भावार्थ –
प्रातः काल उठकर स्वधर्म, अर्थ के लिए चिंता करना चाहिए।
“सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते ।
मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते।।”
भावार्थ – सत्य से धर्म की रक्षा होती है। योग से विद्या की रक्षा होती है। सफाई से रूप की रक्षा होती है। सदाचार से कुल की रक्षा होती है।
“हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिंदू पतितो भवेत् ।
मम दीक्षा धर्म रक्षा, मम मंत्र समानताः।।”
भावार्थ – सब हिंदू परम् पूजनीय भारत माँ की संतान होने से सहोदर हैं। भाई हैं, इसलिए कोई हिंदू अछूत नहीं हो सकता। हमने “समानता” का मंत्र लेकर “धर्मरक्षा” की दीक्षा ली है।
“परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”
– श्रीमद्भागवतगीता
भावार्थ– परम् श्रेध्य भगवान श्री कृष्ण जी ने कहा..! कि हे अर्जुन.! साधू और संतों की रक्षा के लिये, पापियों के विनाश के लिये और धर्म की स्थापना हेतु मैं युगों-युगों से पृथ्वी पर जन्म लेता आया हूँ।
“अकृत्यं नैव कृत्यं स्यात् प्राणत्यागेsपि समुपस्थिते।
न च कृत्यं परित्याज्यम् एष धर्मः सनातनः।।”
भावार्थ — प्राण संकट में होने पर भी करणीय कर्म (धर्मरक्षा) करना चाहिए और करणीय कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, यह सनातन धर्म है।
“सुखस्य मूलं धर्म:। धर्मस्य मूलं अर्थ:। अर्थस्य मूलं राज्स्य। राज्स्य मूलं इन्द्रियजय:।”
भावार्थ- सुख की जड़ धर्म है। धर्म की जड़ अर्थ है। अर्थ की जड़ राज्य है। राज्य की जड़ इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना।
“लोकरझ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः।”
भावार्थ- प्रजा को सुखी रखना यही राजा का सत्यसनातन धर्म है ।
“अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा।
अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः।।”
भावार्थ– मन, वाणी और कर्म से प्राणियों के प्रति सद्भावना, सब पर कृपा और दान यही साधु पुरुषों का सनातन-धर्म है |
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियं। प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥”
भावार्थ- सच बोलते रहना चाहिए, मीठा बोलते रहें लेकिन अप्रिय सच नहीं बोलना चाहिए और प्रिय झूठ नहीं बोलना चाहिए, यही सत्य सनातन धर्म की परम्परा है।
परम् श्रेध्य सावरकर जी के अनुसार हिन्दू भारतवर्ष के देशभक्त वासी हैं जो कि पवित्र पावन भारतभूमि को अपनी पितृभूमि एवं पुण्यभूमि मानते हैं।
आसिन्धुसिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिकाः।
पितृभूपुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरितिस्मृतः॥
भावार्थ – प्रत्येक व्यक्ति जो सिंधू से समुद्र तक फैली भारतभूमि को साधिकार अपनी पितृभूमि एवं पुण्यभूमि मानता है, वही सच्चा हिंदू धर्मी है, और सच्चा राष्ट्र भक्त हैं!
कट्टर हिंदू अर्थात् सच्चे हिंदुत्व का अर्थ होता है, अपने धर्म, राष्ट्र एवं संस्कृति के लिए समर्पित होना एवं रक्षा करना। कट्टर हिंदुत्व का अर्थ यह बिलकुल नहीं होता, कि किसी को बिना कारण चोट पहुँचाना। अपने धर्म का आचरण करना, अपने धर्म के प्रति पक्की और सच्ची आस्था रखना ही सच्चा हिंदुत्व है और सच्चा श्री सत्य सनातनी धर्मी हैं।
उपरोक्त श्लोक अनेक अत्यंत ज्ञानवान परम् विवेकी ऋषि- मुनियों (विद्वानों) ने शास्त्रों में रचित किए हैं, अतः अपने हृदय में राष्ट्र सेवा का भाव जाग्रत करते हुए अवश्य ही धारण कीजिए! तथा अपने आप को अपने राष्ट्र और सच्चे सनातन धर्म के सच्चे धर्म रक्षक बनने का एक सफल प्रयास कीजिए! क्योंकि सच्चे धर्म को धारण करने वाला व्यक्ति कभी अधर्मी नहीं हो सकता! चाहें वह किसी भी पंथ, मजहब या गुरु पद्धति को धारण करने वाला ही क्यों न हो! सच्चे धर्म को निर्मल हृदय में धारण करने वाला ही सच्चा राष्ट्र भक्त हैं, यही हमारी सच्ची पहचान हैं, यही सच्ची श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति हैं |
मर्यादापुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी की सदा जय!
“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी
(वेदपाठी- ज्योतिषाचार्य )
जर्मनी देश के विश्वविख्यात लेखक एवं वेद विद्वान मैक्समूलर (१८२३-१९००) ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक में लिखा है कि “इस समस्त संसार में ज्ञानियों और पण्डितों का देश एकमात्र भारतवर्ष ही है, जहाँ विपुल ज्ञानसम्पदा हस्तलिखित ग्रन्थों के रूप में अद्भुत और अनमोल तरीके से सुसज्जित और सुरक्षित है!”
पुण्य भारतवर्ष के समस्त ऋषिकुल को कोटि कोटि नमन!
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति
सर्वे भवन्तु सुखिन :
सर्वे संतु निरामया!!
आभार – पंडित आर. के. कौशिक जी | (शिक्षविद्द).
