धर्म संसार: धर्मों रक्षति रक्षित::

धर्मो रक्षति रक्षितः एक लोकप्रिय संस्कृत वाक्यांश है जोअति प्राचीन महाग्रन्थ महाभारत और मनुस्मृति में स्पष्ट रूप से मिलता है! इसका अर्थ है कि “धर्म की रक्षा करने पर वह (रक्षा करने वाले की ) रक्षा करता है।” दूसरे शब्दों में, “रक्षित धर्म, रक्षक की रक्षा करता है”।

यह वाक्यांश मनुस्मृति के एक पूर्ण श्लोक का भाग है, जो निम्नलिखित है:

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अति प्राचीन महाग्रन्थ महाभारत में ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ वाक्यांश तीन स्थानों पर आया है जिनमें शब्दों का थोड़ा अन्तर है। वनपर्व में युधिष्ठिर यक्ष से कहते हैं:-

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद् धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ⁠॥
मृत धर्म मारने वाले को नष्ट कर देता है, और संरक्षित धर्म उद्धारकर्ता की रक्षा करता है। इसीलिए मैं धर्म का त्याग नहीं करता कि कहीं नष्ट होकर वह धर्म मेरा ही नाश कर दे।
अनुशासन पर्व में यह निम्नलिखित रूप में आया है:-

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद् धर्मो न हन्तव्यः पार्थिवेन विशेषतः॥
मृत धर्म मारने वाले को नष्ट कर देता है, और संरक्षित धर्म उद्धारकर्ता की रक्षा करता है। इसलिए धर्म की हत्या नहीं करनी चाहिए, विशेषकर पार्थिव के द्वारा।
जाने कुछ ज्ञान की आवश्यक बातें –
जीवन के अंतिम तीन चरणों में दुखी न होंना प्रिय साथियों :*

1- पहला कैंप :-58 से 65 वर्ष

कार्यस्थल आपसे दूर हो जाता है।

अपने करियर के दौरान आप चाहे कितने भी सफल या शक्तिशाली क्यों न हों, आपको एक साधारण व्यक्ति ही कहा जाएगा। इसलिए, अपनी पिछली नौकरी या व्यवसाय की मानसिकता और श्रेष्ठता की भावना से चिपके न रहें

2- दूसरा कैंप :-65 से 72 वर्ष

इस उम्र में, समाज धीरे-धीरे आपको दूर कर देता है। आपके मिलने-जुलने वाले दोस्त और सहकर्मी कम हो जाएँगे और आपके पिछले कार्यस्थल पर शायद ही कोई आपको पहचानता हो।

यह न कहें कि “मैं था…” या “मैं कभी था…” क्योंकि युवा पीढ़ी आपको नहीं पहचानेगी, और आपको इसके बारे में बुरा नहीं मानना चाहिए!

3- तीसरा कैंप :-72 से 77 वर्ष

इस कैंप में, परिवार धीरे-धीरे आपको दूर कर देगा। भले ही आपके कई बच्चे और नाती-नातिन हों, लेकिन ज़्यादातर समय आप अपने साथी के साथ या अकेले ही रह रहे होंगे।

जब आपके बच्चे कभी-कभार आते हैं, तो यह स्नेह की अभिव्यक्ति है, इसलिए उन्हें कम आने के लिए दोष न दें, क्योंकि वे अपने जीवन में व्यस्त हैं!

और अंत में 77+ के बाद,
धरती आपको नष्ट करना चाहती है। इस समय, दुखी या शोक मत करो, क्योंकि यह जीवन का अंतिम चरण है, और हर कोई अंततः इसी मार्ग का अनुसरण करेगा!

इसलिए, जब तक हमारा शरीर अभी भी सक्षम है, जीवन को भरपूर जिएँ!

आपको जो पसंद है वो खाएँ, पीएँ, खेलें और जो पसंद है वो भी करें। खुश रहें, खुशी से जिएँ… क्योंकि जीवन अनमोल हैं!

प्रिय वरिष्ठ नागरिक भाइयों और बहनों, चाचा और चाची, ताऊजी और ताई जी, मामा जी और माम्मी जी

58+ के बाद दोस्तों का एक समूह बनाएँ और कभी-कभार एक निश्चित स्थान पर, एक निश्चित समय पर मिलते रहें। टेलीफोनिक संपर्क में रहें। पुराने जीवन के अनुभवों को याद करें और एक-दूसरे के साथ साझा करें। हमेशा खुश रहें।
सर्वे भवन्तु सुखिन:|
सर्वे संतु निरामया ||
जय श्री राम – जय श्री राम
“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”

पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी
(वेदपाठी एवं ज्योतिषाचार्य )
मुज़फ्फरनगर|

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