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श्री भगवान परशुराम जन्मोत्सव पर विशेषांक:
दिनांक- 22.04.2023

श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय

माँ भारती की पवित्र पावन धरा को ऋषि, मुनि, सिद्ध और देवताओं की भूमि पुकारा जाता है। यह कई तरह के विलक्षण ज्ञान और अद्वितीय, अद्भुत और अविस्मरणीय चमत्कारों से भरी पड़ी है। श्री सत्य सनातन धर्म वेद को मानता है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने घोर तप, कर्म, उपासना, संयम के जरिए वेद में छिपे इस गूढ़ ज्ञान और विज्ञान को ही जानकर हजारों साल पहले ही कुदरत से जुड़े कई रहस्य उजागर करने के साथ कई आविष्कार किए और युक्तियां बताईं। ऐसे विलक्षण ज्ञान के आगे आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक होता है। कई ऋषि-मुनियों ने तो वेदों की मंत्र शक्ति को कठोर योग व तपोबल से साधकर ऐसे अद्भुत कारनामों को अंजाम दिया कि बड़े-बड़े राजवंश व महाबली राजाओं को भी झुकना पड़ा। उन्हीं में से एक अत्यंत महान् ऋषि ब्रह्मऋषि और श्री भगवान विष्णु जी के छठे अवतार श्री भगवान परशुराम जी है। जिन परम् श्रद्धेय एवं परमपूजनीय जी की जयंती आज संपूर्ण संसार बड़े हर्षोल्लास से मना रहा है।
परम् श्रद्धेय श्री भगवान परशुराम जी त्रेता युग अर्थात् रामायण काल में एक उच्च कुलीन ब्राह्मण वंशीय ऋषि के यहाँ जन्मे थे। जो सृष्टि के पालनहार श्रीभगवान विष्णु जी के छठा अवतार हैं। भारतीय संस्कृति के पवित्र पावन पौरोणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म महर्षि भृगु जी के सुपुत्र परम् श्रद्धेय महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र जी के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका जी के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को मध्य प्रदेश के इंदौर जनपद में ग्राम मानपुर के जानापाव पर्वत में हुआ। वे भगवान विष्णु जी के आवेशावतार हैं। महाभारत और विष्णुपुराण के अनुसार परशुराम जी का मूल नाम राम था किन्तु जब परमपूजनीय श्री भगवान शिवजी ने उन्हें अपना परशु नामक अस्त्र प्रदान किया तभी से उनका नाम परशुराम जी हो गया। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम कहलाए। वे जमदग्नि का सुपुत्र होने के कारण जामदग्न्य और सृष्टि के पालनहार श्रीभगवान शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम जी कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से शार्ङ्ग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर जी के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। श्री भगवान शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो श्रीभगवान विष्णु जी ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया। वे शस्त्रविद्या के अत्यंत ही महान् गुरु थे। उन्होंने भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य व दुनिया के श्रेष्ठ दानवीर कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होनें कर्ण को श्राप भी दिया था। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त “शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र” भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-

“ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नः परशुराम: प्रचोदयात्।”

वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे। उन्होंने महर्षि अत्रि जी की पत्नी अनसूया, महर्षि अगस्त्य जी की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था। अवशेष कार्यों में श्री भगवान कल्कि जी अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना और महायोगिश्वर ब्रह्मऋषि याज्ञवल्क्य जी को कुलगुरु होना भी बताया गया है। उन्होंने हैहयवंशी क्षत्रियों का इक्कीस बार विनाश किया।
हैहयवंशी क्षत्रियों का विनाश-
माना जाता है कि श्री भगवान परशुराम जी ने 21 बार हैहयवंशी क्षत्रियों को समूल नष्ट किया था। क्षत्रियों का एक वर्ग है जिसे हैहयवंशी वंश कहा जाता है। इसी वंश में एक राजा हुआ था- सहस्त्रार्जुन। परशुराम ने इसी राजा और इसके पुत्र और पौत्रों का वध किया था और उन्हें इसके लिए 21 बार युद्ध करना पड़ा था। ऋषि वशिष्ठ जी से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्रार्जुन की मति मारी गई थी। सहस्रार्जुन ने श्री भगवान परशुराम जी के पिताश्री जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिताश्री के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। युद्ध में सहस्रार्जुन की सभी भुजाएँ कट गईं और वह मारा गया। तब सहस्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता जमदग्नि को मार डाला। परशुराम की माँ रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस घोर घटना ने परशुराम जी को अत्यंत क्रोधित कर दिया और उन्होंने दृढ़ संकल्प लिया कि-

“मैं हैहय वंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूँगा”।

उसके बाद उन्होंने अहंकारी और दुष्ट प्रकृति के हैहयवंशी क्षत्रियों को 21 बार युद्ध में बहुत भयंकर तरह से परास्त किया। अतः आवश्यक हो जाता है कि जब- जब धरातल पर अधर्म अर्थात् पाप बढ़ता तब-तब श्री भगवान अवश्य ही दुष्टों का सर्वनाश करने के लिए किसी-न-किसी रूप में अवश्य ही इस धरातल पर अवतरित होते हैं। इस पवित्र पावन महापर्व अर्थात् श्री भगवान परशुराम जी की जयंती पर संपूर्ण प्राणी जगत बड़ी ही श्रद्धा से शीश झुकाकर बारंबार कोटि-कोटि नमन करता है। श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय।
जय हिंद -जय भारत -जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
आभार –
पंडित राकेश शर्मा जी। (शिक्षाविद् )।
मुज़फ्फरनगर (उत्तर प्रदेश)।

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