[विशेषांक : सर्वश्रेष्ठ “सनातन धर्म रक्षक” महावीर – परम् श्रेध्य भगवान श्री परशुराम जी जन्मोत्सव महापर्व! 10.05.2024]

भारतीय संस्कृति की अनमोल, अद्भुत और अविस्मरणीय छठाँ सारी दुनिया के लिए ही आलौकिक दिव्य दृष्टि का सच्चा स्वरूप हैं!
क्योंकि “सर्वे भवन्तु सुखिन:”, “अथिति देवो भव” और “वसुधैव कुटुंबकम” जैसी अत्यंत अनमोल विचारधारा शायद अन्य संस्कृति में देखना भी दुर्लभ हैं! इसीलिए पूरी दुनिया में श्री सनातन धर्म संस्कृति अपनी विशिष्ठ पहचान के लिए अविस्मरणीय और परम् पूजनीय हैं! संस्कृति ने सर्वदा ही सच्चे धर्म के मार्ग को अपनाया हैं,भारतीय संस्कृति के सच्चे सनातन धर्म रक्षक का अनमोल उदाहरण परम् श्रेध्य भगवान श्री परशुराम जी हैं, जिन्होंने सच्ची धर्म संस्कृति को अपनाया और भावी पीढ़ी को राष्ट्र धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया हैं|आइए इस महापर्व को हम सब मिलकर बड़े हर्षोउल्लास और बड़ी धूमधाम से मनाए और राष्ट्रधर्म के मार्ग पर चलकर राष्ट्र की सच्ची सेवा कर राष्ट्र की भावी पीढ़ी को भी सच्चे राष्ट्रभक्त बनने के लिए प्रेरित करें|
परम् श्रेध्य एवं परम् पूजनीय जमदग्नि नंदन रेणुका पुत्र भगवान श्री हरि विष्णु जी के छठे अवतार समस्त शस्त्रों एवं शास्त्रों के ज्ञाता भगवान परशुराम जी का प्राकट्य वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया के दिन हुआ। अत्याचारी राजा के राज्य में प्रजा कभी सुखी नहीं रह सकती। न्यायपूर्वक धर्म के मार्ग पर चल कर अगर राजा सुख संसाधनों का उपभोग करता है तो उसमें कोई अनीति नहीं है, परंतु अगर कोई राजा अपनी प्रजा को कष्ट देकर अन्यायपूर्ण ढंग से उनके संसाधनों को बलपूर्वक छीन कर उनका प्रयोग अपने स्वार्थ के लिए करता है उससे बड़ा कोई अधर्म नहीं है।
भगवान श्री हरि विष्णु जी ने ऐसे ही अहंकार और घमंड में चूर अत्याचारी राजाओं के मानमर्दन के लिए भगवान परशुराम जी के रूप में अवतार लिया तथा परम् श्रेध्य एवं परम् पूजनीय श्री भगवान शिव जी द्वारा प्रदान अमोघ फरसे के साथ उनसे युद्ध करके उन अधर्मी राजाओं को दंडित कर प्रजा को भय मुक्त किया। धर्म से द्वेष करने वाले अन्यायियों का दमन करने के लिए तथा जगत की रक्षा के लिए श्री सत्य सनातन धर्म मर्यादा के रक्षक भगवान परशुराम जी ने परशु को धारण किया।
जब परम् श्रेध्य सीता जी के स्वयंवर के समय मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी ने शिव धनुष तोड़ा तब भृगुकुल नंदन भगवान श्री परशुराम जी चक्रवर्ती सम्राट महाराजा जनक जी के राज दरबार में पधारे। तब दुनिया के सर्वश्रेष्ट रचनाकार महाकवि तुलसीदास जी भगवान परशुराम जी की पावन छवि का वर्णन करते हुए कहते हैं-
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला।
चारु जनेउ माल मृगछाला ॥
कटि मुनिबसन तून दुइ बांधें।
धनु सर कर कुठारु कल कांधें॥
भावार्थनुसार महाकवि जी कहते हैं कि बृषभ के समान ऊंचे और पुष्ट कंधे हैं, छाती और भुजाएं विशाल हैं। सुंदर यज्ञोपवीत धारण किए, माला पहने और मृगचर्म लिए हैं। कमर में मुनियों का वस्त्र (वल्कल) और दो तरकश बांधे हैं। हाथ में धनुष-बाण और सुंदर कंधे पर फरसा धारण किए हैं। जब क्रोधित हुए भगवान परशुराम जी सभा में पधारे तो सभा में सभी उपस्थित राजा उनके क्रोधित रूप को देखकर भय से व्याकुल हो गए थे।
परमपूजनीय भगवान श्री परशुराम जी के महान पराक्रम से अधर्मी राजा थर-थर कांपते थे। भगवान शिव से उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मंत्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। शस्त्र विद्या के महान ज्ञाता भगवान परशुराम जी ने भीष्म, द्रोण तथा कर्ण को शस्त्र विद्या प्रदान की थी।
ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार एक समय कैलाश में प्रवेश करते समय भगवान श्री परशुराम जी को श्री गणेश जी द्वारा रोक लिए जाने पर, दोनों में युद्ध प्रारंभ हो गया। तब भगवान श्री परशुराम जी के फरसे के प्रहार से श्री गणेश जी का दांत टूट गया था जिससे परम् श्रेध्य भगवान श्री गणेश जी एकदंत कहलाए।
परम् पूजनीय श्री परशुराम जी भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। इनके पिताश्री महर्षि जमदग्नि जी भृगुवंशी परम् श्रेध्य ऋचीक ऋषि जी के सुपुत्र थे तथा उनकी गणना अत्यंत महान सप्तऋषियों में होती है। भगवान श्री परशुराम जी ने ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर न केवल वेद शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया, अपितु क्षत्रिय स्वभाव को धारण करते हुए शस्त्रों को भी धारण किया तथा इससे वह समस्त सनातन जगत के आराध्य तथा समस्त शस्त्रों एवं शास्त्रों के ज्ञाता कहलाए।
सनातन धर्म की स्थापना के लिए भगवान श्री परशुराम जी ने प्रत्येक युग के किसी न किसी कालखंड में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज भी भगवान परशुराम जी महेन्द्र पर्वत पर समाधिस्थ हैं। अष्ट चिरंजीवियों में शामिल अजर-अमर अविनाशी भगवान परशुराम जी अपने भक्तों को दर्शन प्रदान करते हैं। कल्कि पुराण के अनुसार ये भगवान विष्णु के दसवें अवतार परम् पूजनीय कल्कि जी के गुरु और महायोगिश्वर ब्रह्मऋषि याज्ञव्लक्य जी कुलगुरु होंगे और उन्हें समस्त विद्याओं के साथ साथ धर्मयुद्ध की शिक्षा देंगे। वे ही भगवान श्री कल्कि जी को परम् पूजनीय भगवान श्री शिव की तपस्या करके उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए कहेंगे।
भगवान श्री परशुराम जी ने सामाजिक न्याय तथा समानता की स्थापना के उद्देश्य से तथा समाज के शोषित तथा पीड़ित वर्ग के अधिकारों की रक्षा के लिए शस्त्र उठाया। उनकी महान पितृ-मातृ भक्ति वन्दनीय है।उन्होंने समस्त पृथ्वी को दान स्वरूप ब्रह्म ऋषि कश्यप जी को प्रदान किया। कमल लोचन परम् श्रेध्य जमदग्नि नन्दन भगवान् श्री परशुराम जी आगामी मन्वन्तर में सप्तर्षियों के मंडल में रहकर वेदों का विस्तार करेंगे।
इस प्रकार सर्वशक्तिमान विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि जी ने इस प्रकार भृगुवंशियों में अवतार ग्रहण करके पृथ्वी के भारभूत राजाओं को दंडित कर पृथ्वी पर सत्य, दया तथा शांति युक्त कल्याणमय श्री सत्य सनातन धर्म की स्थापना की।
ऋद्धि सिद्धिप्रदाता विधाता
भुवो ज्ञानविज्ञानदाता प्रदाता
सुखम् विश्वधाता सुत्राताऽखिलं विष्टपम्
तत्वज्ञाता सदा पातु माम् निर्बलम्
पूज्यमानं निशानाथभासं विभुम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥
भगवान श्री परशुराम जी की क्षमाशीलता, दानशीलता, श्री सत्य सनातन धर्म मर्यादा, न्यायप्रियता, मातृ-पितृ भक्ति, समस्त मानवीय समाज के लिए अनुकरणीय एवं वंदनीय है। भगवान श्री परशुराम जी की पावन र्कीत युगों-युगों तक अमर रहेगी।
नम: परशुहस्ताय नम: कोदंड धारिणे।नमस्ते रुद्ररुपाय विष्णवे वेदमूर्तये॥
हाथ में परशु धारण करने वाले श्री सत्य सनातन धर्म रक्षक भगवान श्री परशुराम जी को बड़ी श्रद्धा से शीश झुकाकर बारम्बार नमस्कार है। हाथ में धनुष धारण करने वाले श्री परशुराम जी को नमस्कार है। रुद्र रूप श्री परशुराम जी को नमस्कार है। साक्षात वेदमूर्ति भगवान श्री विष्णु रूप भगवान श्री परशुराम जी को नमस्कार है।
अक्षय तृतीया के दिन सर्वकामना की सिद्धि हेतु भगवान श्री परशुराम जी के गायत्री मंत्रों का जाप कीजिए और अति सुंदर भविष्य की कामना प्राप्त कीजिए। मंत्र इस प्रकार हैं-
- ‘ॐ ब्रह्मक्षत्राय विद्महे क्षत्रियान्ताय धीमहि तन्नो राम: प्रचोदयात्।।’
- ‘ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात्।।’
- ‘ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नम:।।’
श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय! सर्व ब्राह्मण वंश जिंदाबाद! जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति!
“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी!
(वेदपाठी – ज्योतिषचार्य )
आभार –
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी!
( शिक्षाविद्द )
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर|
