[विशेषांक: ब्राह्मण वंश में “भट्ट” उपाधि]

चतुर्विशति गौत्राणां नामानि प्रवदाम्यहम् ।
कृष्णात्रेयंच प्रथमं पाराशरः मत परम् ।।
कात्यायनंच गर्गच शांडिल्यं कुशिकं तथा ।
कौशिकं वत्स वात्संच भारद्वाजंच गार्ग्यकम् ।।
उपमन्युश्च कौन्डिन्यं गौतमम् काश्यपं तथा ।।
विष्णुवृद्धं मुदलंच मौनसम् वर्द्धिसंज्ञकम् ।
अत्रि गौत्रं चांतिमं वैगौत्राण्ये वं विनिर्दिशे ।।
श्रीभट्ट ब्राह्मण वंश- श्री भट्ट ब्राह्मण, ये वेदों में श्रेष्ठ, तथा ऊँचकुलिन घराने के अत्यंत श्रेष्ठतम ब्राह्मण हैं। [ वेदों की प्राप्ति ~ वेदों का ज्ञाता, नालंदा हिंदी शब्द कोष पृष्ठ संख्या-608, ब्रह्माऋषि विश्वामित्र जी के ज्येष्ठ सुपुत्र महर्षि देवरात जी के सुपुत्र एवं चक्रवर्ती सम्राट महाराजा जनक जी के कुलगुरु महर्षि यज्ञवल्कय जी तथा शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ के रचयिता एवं सर्वश्रेष्ठ स्मृतिकार, स्वं देवताओं से रक्षित, नालंदा हिंदी शब्द कोष पृष्ठ संख्या-616,1074 एवं अन्य हिंदी शब्दकोष पृष्ठ संख्या -585] तथा श्री ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण [ सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मायज्ञ से उत्पन्न महर्षि कवि जी की उपाधि, वेदों का ज्ञाता – नालंदा हिंदी शब्दकोष पृष्ठ संख्या -1003] यह गोत्र ब्राह्मणों के तीन मुख्य ऊँचे गोत्रो में से एक है। क्या आप जानते है? महाभारत के रचयिता तो परम् श्रद्धेय महर्षि वेद व्यास जी, द्रोणाचार्य जी, अश्वथामा जी, कृपाचार्य जी, श्री भगवान परशुराम जी, श्री विष्णु स्वामी जी, आदि जगत गुरु शंकराचार्य जी, श्री रामानुजाचार्य जी, विश्व के महान गणितज्ञ एवं श्रेष्ठ खगोलशास्त्री आर्यभट्ट जी, सर्वश्रेष्ठ ज्योतिषचार्य जी एवं परम् श्रेध्य वराहमिहिर जी, संस्कृत की प्रथम गद्य रचना देने वाले प्रकांड महाविद्वान् बाणभट्ट जी,आयुर्वेद के महान जनक वांगभट्ट जी, श्री माधवचार्य जी, श्री वल्लभाचार्य जी, आदरणीय नाना साहब जी, अत्यंत महान प्रकांड महा विद्वान् पंडित कुमारिल भट्ट जी, आदि श्री भट्ट ब्राह्मण है! वेदों के मीमांषक विश्वविख्यात आचार्य – 1. सूत्रकार जैमिनि जी, 2. भाष्यकार शबर स्वामी जी 3. प्रकांड महापंडित कुमारिल भट्ट जी 4. प्रभाकर मिश्र जी 5. मंडन मिश्र अर्थात प्रकांड महा विद्यवान पंडित विश्वशर भट्ट जी 6. शालिकनाथ मिश्र जी 7. वाचस्पति मिश्र जी 8. सुचरित मिश्रजी 9. पार्थसारथि मिश्र जी 10. पंडित भवदेव भट्ट जी, 11 भवनाथ मिश्रजी 12. नंदीश्वर जी 13. माधवाचार्य जी , 14. भट्ट सोमेश्वर जी , 15. आप देव,16. अप्पय दीक्षित, 17. सोमनाथ जी 18. शंकर भट्ट जी , 19. गंगा भट्ट जी , 20. खंडदेव जी , 21. शंभु भट्ट जी और 22. वासुदेव दीक्षित जी।
आसीत सह्यकुलाचलाश्रितपुरे त्रैविद्यविद्वज्जने।नाना जज्जनधाम्नि विज्जडविडे शाण्डिल्यगोत्रोद्विजः॥श्रौतस्मार्तविचारसारचतुरो निःशेषविद्यानिधि।साधुर्नामवधिर्महेश्वरकृती दैवज्ञचूडामणि॥ (गोलाध्याये प्रश्नाध्यायः श्लोक संख्या -६१)
इस श्लोक के अनुसार भास्कराचार्य शांडिल्य गोत्र के भट्ट ब्राह्मण थे और सह्याद्रि क्षेत्र के विज्जलविड नामक स्थान के निवासी थे। सम्पूर्ण विश्व में विख्यात “महाभारत अनुशासन पर्व” के अनुसार अत्यंत महान युधिष्ठिर जी की सभा में विद्यमान ऋषियों में शाण्डिल्य जी का नाम भी अत्यंत प्रमुखता से है। ब्राह्मणों से ही इस संसार का अस्तित्व भी है अतः इस संसार के प्रारंभ सतयुग से ही शांडिल्य ऋषि जी और अन्य ब्राह्मणों का अस्तित्व कायम है, अतः मान्यता यह भी है के सबसे पहले सतयुग में वेद-शास्त्र तथा शस्त्रों की शिक्षा भी ऋषि शांडिल्य जी तथा गार्गस्य ऋषि जी के आश्रम में ही प्रारंभ हुई। शांडिल्य ऋषि जी त्रेतायुग में विश्व विख्यात महा राजा दिलीप के राजपुरोहित बताए गए है, वहीं द्वापर में वे राजा नंद के पुजारी हैं, एक समय में वे राजा त्रिशुंक के पुजारी थे तो दूसरे समय में वे महाभारत के नायक परम् श्रद्धेय भीष्म पितामह जी तथा अपने ब्राह्मण भ्राता श्री भगवान परशुराम जी के साथ वार्तालाप करते हुए दिखाए गए हैंं। कलयुग के प्रारंभ में वे जन्मेजय के पुत्र शतानीक के पुत्रेष्ठित यज्ञ को पूर्ण करते दिखाई देते हैं। इसके साथ ही वस्तुतः शांडिल्य ऋषि जी एक अत्यंत महान ऐतिहासिक ब्राह्मण ऋषि हैं लेकिन कालांतर में उनके नाम से उपाधियां शुरू हुई है जैसे- महान वशिष्ठ जी, महान विशवामित्र जी और व्यास जी नाम से उपाधियां होती हैं। ये सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। इनका गोत्र श्रीमुख शांडिल्य त्रि- प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है! जिसमें श्री राम घराना, श्री कृष्ण घराना, श्री नाथ घराना अर्थात श्री विष्णु घराना, श्री मणि घराना है, इन चारो का उदय सोहगोरा गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारो का अस्तित्व पूर्ण रूप से कायम है।
शाण्डिल्य नामक आचार्य अन्य शास्त्रों में भी स्मृत हुए हैं। हेमाद्रि के लक्षणप्रकाश में शाण्डिल्य को आयुर्वेदाचार्य कहा गया है। विभिन्न व्याख्यान ग्रंथों से पता चलता है कि इनके नाम से एक गृह्यसूत्र एवं एक स्मृतिग्रंथ भी!
ब्राह्मणों में भट्ट, ब्रह्मभट्ट उपाधियों एवं कॉमन नाम शर्मा जी को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। ये एक ही ब्राह्मण है इनके सभी गोत्र समान है! सभी भूमिहार ब्राह्मण अत्यंत महान ऋषि शांडिल्य जी गोत्र से ही संबंधित है।
“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी
(वेदपाठी – ज्योतिषचार्य )
आभार -पंडित आर. के. कौशिक जी
(शिक्षाविद्).लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर.
