विशेषांक –
अपनी संस्कृति अपना धाम।
अपना भारतवर्ष देश महान् ।।

गंगा बड़ी न गोदावरी,
तीरथ बड़ौ न प्रयाग।
सबसे बड़ी अयोध्या नगरी,
जहाँ श्रीराम लियो अवतार।।
यह एक प्रचलित कहावत है, इससे ही जन मानस में रचे बसे प्रभु श्रीराम जी के लिए श्रद्धा प्रेम भाव और अति पवित्र पावन तीर्थ नगरी अयोध्या परम् धाम की महत्ता का पता चलता है।
इस संपूर्ण ब्रह्मांड में सृष्टि की कल्पना के साथ ही पवित्र पावन पौराणिक अयोध्या धाम का भी अस्तित्व कल्पित होने लगता है। आज का विज्ञान जिन करोड़ो ब्रह्मांडों की बात कहता है उनमे से जिस ब्रह्मांड पर हम है उसकी पृथ्वी और उस पर रची जा चुकी सृष्टि की जानकारी होना भी अत्यंत ही जरूरी है जैसे कि-
1- पृथ्वी के अस्तित्व का इतिहास क्या है?
2- पृथ्वी पर सृष्टि के अस्तित्व का इतिहास क्या है?
3- सृष्टि के जीवो का इतिहास क्या है?
4- जीवो की सभ्यता का इतिहास क्या है?.. … …
यह सब सदा से ही कौतुक के विषय रहे है। समय समय पर सभ्यताओं के विकास के साथ ही तत्समय के विद्वान् लोग इन सभी विषयो को जानने की चेष्टा करते रहे है। हमें फिलहाल उसके भेद, विभेद या तर्क आदि में नहीं जाना। यह प्रश्न परम् श्रद्धेय भारत देवभूमि पर अवस्थित एक पौराणिक तीर्थ धाम के अति सुंदर इतिहास से जुड़ा हुआ है जिसका नाम है- अति पवित्र पावन तीर्थ नगरी अयोध्या धाम जी।
यह इतिहास भी इसलिए बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि अत्यंत प्राचीन भारत देवभूमि की यह अयोध्या नगरी कोई सामान्य नगरी या बस्ती या शहर मात्र नहीं है। अपितु प्राचीन भारतीय वांग्मय, ग्रंथो,श्रुतियो, स्मृतियों, पुराणों और इतिहास के गहन विचरण और अध्ययन के बाद जब भी तीर्थ नगरी- अयोध्या शब्द सामने आता है तो उसी के साथ धरातल पर मनुष्य के आविर्भाव की गाथा भी सामने आने लगती है। हजारो प्रमाण इस बात के मौजूद है कि अयोध्या नाम का नगर किसी ख़ास वर्ग, जाति, धर्म, पंथ मज़हब, संप्रदाय या अर्वाचीन शिल्पी द्वारा बसाया या बनाया गया नहीं है। यह अति पवित्र पावन पौराणिक धार्मिक नगरी अयोध्या इस धरातल पर तब से है जब से यह सृष्टि है। अति पौराणिक पवित्र पावन तीर्थ नगरी अयोध्या ही वह स्थल है जहाँ मनुष्य नाम के प्राणी का सबसे पहले आविर्भाव हुआ और मानव सभ्यता का भी जन्म हुआ। भारतीय वांगमयो के अध्ययन और उत्कृष्ट श्रेणी के आचार्यों तथा शुभचिंतकों का निष्कर्ष है कि सृष्टि की रचना के समय मनुष्य के रूप में पहले मानव का आविर्भाव इसी अति सुंदर पवित्र पावन नगरी अयोध्या धाम में हुआ। धरती पर जब सृष्टिकर्ता ने मनुष्य को उतार उससे पहले उसने अयोध्यापुरी दी और साथ में दिया श्रुति ग्रंथ, ताकि जिस प्राणी को वह सृष्टि के लिए भेज रहे या उतार रहे है वह श्रुति से संस्कार प्राप्त कर संसार का सृजन कर्म आगे बढ़ाए।
यह तो हमारी बहुत ही बड़ी अज्ञानता या लापरवाही है कि सृष्टि की उत्पत्ति की उस कहानी को हम पढ़ और पढ़ा रहे हैं जिसमे मनुष्य को बंदर की संतान बताया जाता है। वास्तव में यह हमारे अज्ञान का ही परिचायक है। हम पश्चिम के उस कथित विज्ञान को सबकुछ मानने लगे है जो चौक चौक कर एक एक कदम चलता है, और अपने ही प्रतिपादन को आगे आकर खारिज़ भी करता है। पश्चिम की नक़ल के इस युग में हम अपने ही इतिहास को पूरी तौर पर भूल गए। वे कथित सभ्य लोग जिनमें से किसी का इतिहास दो हजार साल, किसी का मात्र डेढ़ हजार साल का है, उनकी धारणाओं और उनके कथन को मील का पत्त्थर बना कर हमने स्कूली- पाठ्यक्रम बना लिए और अपने खुद के उपलब्ध लाखों वर्ष के पौराणिक इतिहास को कूड़े में डाल दिए। एक पश्चिमी आदमी ने कह दिया की मनुष्य के पूर्वज बंदर थे,और हमने मान लिया। यह जानने का भी प्रयास नहीं किया कि मनुष्य शब्द आया कहा से है।
यही से अयोध्या की भी कहानी शुरू होती है। भारतीय श्रुतियो और अन्य वांग्मयो में हजारो ऐसे प्रमाणित प्रमाण है जो साबित करते है कि धरती पर प्रथम मानव हमारे आदि पुरुष परम् श्रद्धेय श्री भगवान ब्रह्मा जी के मानस पुत्र मनु जी ही थे। हम सभी परम् श्रद्धेय मनु जी की ही संतान है। इसी मनु शब्द से मनुष्य शब्द का भी जन्म हुआ है। मनु के वंशज अर्थात मानव। यह कितने दुःख की बात है कि खुद की वंशावली होते हुए भी आज का मानव बंदरो में अपनी वंशावली की तलाश कर रहा है।
बहरहाल, यहाँ पर चर्चा पवित्र पावन धाम अयोध्या नगरी की हो रही है। पौराणिक तीर्थ नगरी अयोध्या के उस पावन इतिहास की जो त्रेता युग से पहले, त्रेता युग में और त्रेता युग के बाद का है। इसको समझने के लिए जरूरी है कि पहले युगों की काल गणना को संक्षेप में जान लिया जाए। सृष्टि का इतिहास कल्प में और सृष्टि में मानव उत्पत्ति व उत्थान का इतिहास मन्वंतरों में वर्णित किया गया है और उसके पश्चात् मन्वन्तरों का इतिहास युग-युगान्तरों में विस्तार से समझाया गया है।
‘प्राचीन ग्रंथों में मानव इतिहास को पाँच कल्पों में विभाजित किया गया है।
1- हमत् कल्प 1 लाख 9 हजार 8 सौ वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर 85800 वर्ष पूर्व तक,
2- हिरण्य गर्भ कल्प 85800 विक्रमीय पूर्व से 61800 वर्ष पूर्व तक, ब्राह्म कल्प 60800 विक्रमीय पूर्व से 37800 वर्ष पूर्व तक,
3- ब्राह्म कल्प 60800 विक्रमीय पूर्व से 37800 वर्ष पूर्व तक,
4- पाद्म कल्प 37800 विक्रम पूर्व से 13800 वर्ष पूर्व तक,
5- वराह कल्प 13800 विक्रम पूर्व से आरम्भ होकर इस समय तक चल रहा है।
यह भी सौभाग्य का विषय है कि सृष्टि का सबसे शुद्ध काल मापन की व्यवस्था भारतीय प्रणाली में मौजूद रही है। भारत का अति पवित्र प्राचीन साहित्य स्पष्ट करता है कि सृष्टि के उद्भव से अब तक का कितना समय बीत चुका है और सृष्टि की अब तक की उम्र क्या है?
वैदिक संवत के अनुसार-
“ द्वितीयपरार्धे वैवस्तमन्वन्तरे अष्टाविशंति – कलौ युगे ५११६ गताब्दे “
अर्थात यह वैवस्त मनु का अठाईसवा कलि है जिसके ५११६ वर्ष बीत चुके है। परम् श्रद्धेय श्री भगवान ब्रह्मा जी के एक दिन को कल्प अथवा सृष्टि समय कहते हैं। यह कल्प १४ मंवंतरो अथवा एक सहस्त्र चतुर्युगियो का होता है। अब तक छह मंवंतर बीत चुके है। एक मंवंतर लगभग ७१ चतुर्युगियों का होता है। वैवस्त मनु की २७ चतुर्युगी बीत चुकी है। अठाईसवि में भी ( कृत, त्रेता और द्वापर ) तीन युग बीत चुके है। चौथे कलि के भी ५११६ वर्ष बीत चुके है। एक मंवंतर में 71 चतुर्युगियां होती हैं। एक चतुर्युग में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं। सतयुग में 1728000 वर्ष,
त्रेता में 1296000 वर्ष, द्वापर में 864000 वर्ष और कलियुग में 432000 वर्ष होते हैं। इन चारों युगों में कुल 4320000 वर्ष होते हैं। 71 चतुर्युगियों में कुल 306720000 वर्ष होते हैं। छः मंवंतर अर्थात् 1840320000 वर्ष पूरे बीत चुके हैं और अब सातवें मंवंतर की 28वीं चतुर्युगी चल रही है। गणित करके देखा गया है कि इस गणना के अनुसार यह समय 1960853115 वर्ष बनते हैं। यही समय मानव उत्पत्ति का है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स ने कल्प को समय का सर्वाधिक लंबा मापन घोषित किया है। शेष आगामी पृष्ठों में जारी रहेगा ।
धन्य भारतीय संस्कृति।
जय हिंद -जय भारत -जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ।
