धर्म संसारः धर्मो रक्षति रक्षितः!

[विशेषांक – मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी के प्रति दुनिया के श्रेष्ठ संतों की श्रेष्ठ वाणी]

दुनिया के सर्वश्रेष्ठ महाकवि तुलसीदास जी की श्री राम जी के प्रति अटूट श्रद्धा भक्ति –

सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू,
बिधि हरि हर बंदित पद रेनू।

सेवत सुलभ सकल सुखदायक,
प्रणतपाल सचराचर नायक॥

दुनिया के सर्वश्रेष्ठ महाकवि महापंडित तुलसीदास जी कहते है कि जिनके चरणों की वंदना विधि, हरि और हर यानी श्री ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही करते है, तथा जिनके स्वरूप की प्रशंसा सगुण और निर्गुण दोनों करते हैं; उनसे वे क्या वर माँगें? इस बात का उल्लेख करके परम् श्रद्धेय प्रकांड महापंडित महाकवि तुलसीदास जी ने उन लोगों को भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी की ही बड़ी श्रद्धा से आराधना करने की सलाह दी है जो केवल निराकार को ही परमब्रह्म मानते हैं।

महान् महाकवि सूरदास जी के नाम से प्रसिद्ध- मुस्लिम दिव्यांग कवि- अकबर ताज मंसूरी के प्यारे श्रीरामचंद्र जी- भक्ति का अनूठा संगम।

श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के प्रति अटूट आस्था एवं परम् श्रद्धेय भगवान श्रीरामचंद्र जी के अति उत्तम चरित्र से प्रेरित होकर उन्होंने अपनी शैली में लिखा है-

मुझे तू राम के जैसा, या
फिर लक्ष्मण बना देना।

सिया के मन के जैसा,
मन मेरा दर्पण बना देना।

मुझे अंधा बनाया है,
तो मुझको गम नहीं इसका।

मेरी संतान को भगवन,
मगर श्रवण बना देना।।

प्रेम से बोलिए – जय श्रीराम – जय श्रीराम।

महान् भक्त रहीमदास जी के अति प्यारे श्रीरामचंद्र जी –

रहिमन धोखे भाव से,
मुख से निकसे राम।
पावत पूरन परम गति, कामादिक कौ धाम।।

यदि कभी धोखा से भी भावपूर्वक मुँह से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी का नाम ले लिया जाए, तो उसे अवश्य ही कल्याणमय परम गति प्राप्त होती है। भले ही वह काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा पाप से क्यों न ग्रस्त हो। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्रथम पत्रकार एवं ब्रह्मऋषि नारदजी के मार्गदर्शन द्वारा ही श्रीराम नाम का जाप उल्टा लेकर भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ परमपूजनीय वाल्मीकिजी ब्रह्मऋषि बन गए और उन्होंने परम् श्रद्धेय श्रीरामचन्द्र जी के जन्म से पहले ही भविष्य में घटनेवाली सारी घटनाओं का अति उत्तम चरित्र वर्णन लिखकर रख दिया। श्री राम जी के नाम की महिमा अपरंपार है, जिनके अति पवित्र पावन नाम लेने से इंसान तो क्या पत्थर भी सागर जलतल पर तैरने लगते है। प्रेम से बोलिए- जय श्रीराम – जय श्रीराम।

प्रकांड महाविद्वान महापंडित मध्वाचार्य भट्ट जी की श्रीराम जी के प्रति अद्भुत श्रद्धाभक्ति

राम मंत्र निज कर्ण सुनावा,

परंपरा पुनि तत्व लखावा।

संप्रदाय विधि मूल प्रधाना,

अधिकारी तहां महं हनुमाना।

मध्य रूप सोई अवतरिया,

मत अभेद जिन खंडन करिया।

[नृत्य राघव मिलन- पृष्ठ संख्या-45, रामसखे]

अत्यंत महान् संत परम् श्रद्धेय माध्वाचार्य भट्ट जी ने भगवान भक्ति को ही मोक्ष का सर्वोपरि साधन स्वरूप मानने वाले श्री रामानुज-सम्प्रदाय के पश्चात एक तीसरा द्वैत सम्प्रदाय निकाला हैं। इन्होंने ब्रह्म सूत्र और दस उपनिषदों की व्याख्या लिखी। इनके पिताश्री प्रकांड महाविद्वान महापंडित परम् श्रद्धेय मध्यगेह भट्ट जी थे।

परम् श्रद्धेय स्वामी रामानन्द जी श्रीराम मंत्रराज की परम्परा में अति उत्तम स्थान पर वर्णित हैं-

परधाम्नि स्थितो रामःपुण्डरीकायतेक्षणः। सेवया परया जुष्टो जानक्यै तारकं ददौ॥1॥

श्रियः श्रीरपि लोकानां दुखोद्धरणहेतवे।
हनूमते ददौ मन्त्रं सदा रामाङ्घ्रिसेविने॥2॥

ततस्तु ब्रह्मणा प्राप्तो मुह्यमानेन मायया।
कल्पान्तरे तु रामो वै ब्रह्मणे दत्तवानिमम्॥3॥

मन्त्रराजजपं कृत्वा धाता निर्मातृतां गतः।
त्रयीसारमिमं धातुर्वसिष्ठो लब्धवान् परम्॥4॥

पराशरो वसिष्ठाच्च सर्वसंस्कारसंयुतम् ।
मन्त्रराजं परं लब्ध्वा कृतकृत्यो बभूव ह ॥5॥

पराशरस्य सत्पुत्रो व्यासः सत्यवतीसुतः।
पितुः षडक्षरं लब्ध्वा चक्रे वेदोपबृंहणम्॥6॥

व्यासोऽपि बहुशिष्येषु मन्वानः शुभयोग्यताम्।
परमहंसवर्य्याय शुकदेवाय दत्तवान्॥7॥

शुकदेवकृपापात्रो बह्मचर्यव्रतेस्थितः।
नरोत्तमस्तु तच्छिष्यो निर्वाणपदवीं गतः ॥8॥

स चापि परमाचार्यो गङ्गाधराय सूरये ।
मन्त्राणां परमं तत्त्वं राममन्त्रं प्रदत्तवान् ॥9॥

गङ्गाधरात् सदाचार्यस्ततो रामेश्वरो यतिः।
द्वारानन्दस्ततो लब्ध्वा परब्रह्मरतोऽभवत्
।।10॥

देवानन्दस्तु तच्छिष्यः श्यामानन्दस्ततोऽग्रहीत्। तत्सेवयाश्रुतानन्दश्चिदानन्दस्ततोऽभवत्
॥11॥

पूर्णानन्दस्ततो लब्ध्वा श्रियानन्दाय दत्तवान्। हर्यानन्दो महायोगी श्रियानन्दाङ्घ्रिसेवकः
॥12॥

हर्यानन्दस्य शिष्यो हि राघवानन्ददेशिकः।
यस्य वै शिष्यतां प्राप्तो रामानन्दः स्वयं हरि
॥13॥

परम् श्रद्धेय स्वामी रामानंद जी ने श्रीराम भक्ति का द्वार समस्त प्राणी जगत के लिए अत्यंत सुलभ कर दिया। परम् श्रद्धेय स्वामी रामानंद जी ने भक्ति करने वालों के लिए अति प्रिय नारा दिया-

जात-पात पूछे ना कोई,
जो हरि को भजै सो,
सो हरि का होई।। 

जय श्रीराम । जय श्रीराम ।
 

महान् संत महाकवि कबीर दास जी के प्रिय श्रीराम जी –

राम नाम की लूट है,
लूट सके सो लूट ।
अंत काल पछतायेगा,
प्राण जायेगा छूट ॥

ईश्‍वर का भजन अत्यंत सुगम है। श्रीराम नाम जितना लूट सकते हैं, हमें अवश्य लूटना चाहिए। मृत्यु के समय श्रीराम जी नाम न ले पाने से अत्यंत दुःख होगा। वस्तुतः श्रीराम मात्र एक नाम भर नहीं, बल्कि वह जन-जन के कंठहार हैं, मन-प्राण हैं, जीवन-आधार हैं। प्रेम से बोलिए- जय श्रीराम – जय श्रीराम।

परमपूजनीय गुरु नानक देव जी के प्यारे श्रीरामचंद्र जी –

राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा।
बिखु खावै बिखु बोलै बिनु नावै निहफलु मटि भ्रमना ।।

पुसतक पाठ व्याकरण बखाणै संधिया करम निकाल करै।
बिनु गुरुसबद मुकति कहा प्राणी राम नाम बिनु अरुझि मरै।।

परम् श्रद्धेय गुरु नानक देव जी कहते हैं कि जो श्रीरामचन्द्र जी के नाम का जप नहीं करता है, उसका संसार में आना और मानव शरीर पाना बेकार चला जाता है। बिना कुछ बोले विष का पान करता है तथा मोहमाया में भटकता हुआ मर जाता है अर्थात् श्रीरामचन्द्र जी का गुणगान न करके माया के जाल में फँसा रहता है। शास्त्र-पुराण की चर्चा करता है, सुबह, शाम एवं दोपहर तीनों समय संध्या बंदना करता है। परम् पूज्य गुरु नानक देव जी लोगों से कहते है कि गुरु ( श्रीभगवान) का भजन किए बिना व्यक्ति को संसार से मुक्ति नहीं मिल सकती तथा सांसारिक मायाजाल में उलझकर रह जाना पड़ता है। अर्थात गुरु नानक देव जी का कहना कि संसार असत्‍य है। सत्‍य केवल ईश्‍वर ही है। प्रेम से बोलिए – जय श्रीराम – जय श्रीराम।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी की प्रेरणादायक देशभक्ति-

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

श्री लंका विजय के बाद भगवान श्रीरामचंद्र जी ने अपने प्रिय अनुज भ्राता लक्ष्मण जी को आदेश दिया कि लंका जाकर विभीषण का राजतिलक सम्पन्न कराओ। अनुज भ्राता लक्ष्मण जी लंका पहुँचे तो स्वर्ण नगरी की अत्यंत अनूठी मनभावन शोभा तथा चमक-दमक ने उन्हें मोह लिया। श्री लंका की वाटिका के तरह-तरह के सुगंधित अति सुंदर पुष्पों को वह काफी समय तक निहारते रहे। विभीषण का विधिपूर्वक राजतिलक सम्पन्न कराने के बाद वे श्रीरामचंद्र जी के पास लौट आए। उन्होंने श्रीरामचंद्र जी के चरण दबाते हुए कहा, ‘महाराज लंका तो अत्यंत दिव्य सुंदर नगरी है। मन चाहता है कि मैं कुछ समय के लिए लंका में निवास करूँ। आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा है।’

‘प्रभु वास्तव में हमारी अयोध्या तीनों लोकों से न्यारी है।’

प्रिय अनुज भ्राता लक्ष्मण का लंका नगरी के प्रति आकर्षण देखकर श्रीरामचंद्र जी बोले, ‘‘लक्ष्मण यह ठीक है कि लंका सचमुच स्वर्ग पुरी के समान आकर्षक है, प्राकृतिक सुषमा से भरपूर है, किंतु यह ध्यान रखना कि अपनी मातृभूमि “अयोध्या नगरी” तो तीनों लोकों से कहीं अधिक सुंदर है। जहाँ मानव जन्म लेता है, वहाँ की मिट्टी की सुगंध की किसी से तुलना नहीं की जा सकती है।’’

अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।

भ्राता लक्ष्मण जी अब अपनी जन्मभूमि “अयोध्या नगरी” के महत्व को भलीभाँति समझ गए। उन्होंने कहा, परम् श्रद्धेय ‘‘प्रभु वास्तव में हमारी अति पवित्र पावन अयोध्या नगरी तीनों लोकों से न्यारी है।’’
प्रेम से बोलिए –
अपनी संस्कृति अपना धाम ।
मिलकर बोलिए जय श्रीराम।।

जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति।

“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
आभार –
सर्वे भवंतु सुखिनः
सर्वे संतु निरामया ।।

पंडित राकेश कुमार कौशिक ।
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ।

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