[विशेषांक- एक अत्यंत महान् आदर्श व्यक्तित्व स्वामी विवेकानंद जी।]

परम् श्रद्धेय स्वामी विवेकानंद जी अत्यंत महान् शुभचिंतक, महान् देशभक्त, उच्च कोटि के दार्शनिक, कांतिमय युवा संन्यासी, राष्ट्र के युवाधन के श्रेष्ठ मार्गदर्शक अर्थात् युवाओं के अद्वितीय प्रेरणास्रोत और एक अत्यंत महान् आदर्श व्यक्तित्व के धनी थे। भारतीय नवजागरण का अग्रदूत यदि परम् श्रद्धेय स्वामी विवेकानंद जी को कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। “विवेकानंद” दो शब्दों से मिलकर बना है– “विवेक” और “आनंद”। “विवेक” संस्कृत मूल का शब्द है। “विवेक” का अर्थ होता है- विशिष्ट ज्ञान और “आनंद” का अर्थ होता है- “अपार खुशियाँ “। और यही दो अनमोल खजाने अर्थात् चीज़े वो पूरी दुनियाँ में बाँटकर गए है।
माँ भारती के इस अनमोल रत्न की पहचान पूरी दुनिया को तब हुई जब 11 सितंबर, सन् 1893 ई0 को विश्व धर्म सम्मेलन में उन्होंने अपना संबोधन “अमेरिका के भाइयों और बहनों” से प्रांरभ किया। इस संबोधन पर पूरा का पूरा हाॅल तालियों की शानदार गड़गड़ाहट से कॉफी देर तक गूँजता रहा। माँ भारती के अनमोल रत्न परम् श्रद्धेय स्वामी विवेकानंद जी के अद्भुत प्रेरणात्मक भाषण की शुरुआत “मेरे अमेरिकी भाइयों एवं बहनों” के साथ करने के संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था। इससे पहले कोई भी प्रवक्ता अपने भाषण की शुरुआत “लेडीज एंड जेंटलमैन” यानि की “देवियों और सज्जनों” कहकर ही किया करते थे।
ये स्वामी विवेकानंद ही थे जिन्होंने पहली बार अपने भाषण की शुरुआत इतनी आत्मीयता से की थी। इसके बाद अपने विचारों और स्वभाव से परम् पूज्य स्वामी विवेकानंद जी देश ही नहीं बल्कि सारी दुनिया के युवाओं को प्रेरित करते रहे। ये उनके विचारों की गौरवमयी गरिमा और उज्ज्वल तीव्रता ही थी कि उस ज़माने में जब न तो इन्टरनेट था न ही सोशल मिडिया, तब भी उनके विचार युवाओं में चर्चा का विषय बने रहे।
परम् पूज्य स्वामी विवेकानंद जी ने युवाओं का आह्वान करते हुए कठोपनिषद का एक मंत्र कहा था-
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।”
अर्थात् कहने का अर्थ यह है कि – “उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक कि अपने लक्ष्य तक न पहुँच जाओ।”
यही कारण है कि भारत में परम् पूज्य स्वामी विवेकानन्द जी की जयंती प्रत्येक वर्ष 12 जनवरी को “राष्ट्रीय युवा दिवस” के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनायी जाती है।
4 जुलाई सन् 1902 ई0 को बेलूर के श्री रामकृष्ण मठ में उन्होंने ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण कर प्राण त्याग दिए। मात्र 39 वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में परम् पूज्य स्वामी विवेकानंद जी जो काम कर गए, वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक राष्ट्र की भावी पीढ़ियों का सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शन करते रहेंगे। माँ भारती के इस अनमोल रत्न को संपूर्ण प्राणी जगत बड़ी श्रद्धा शीश झुकाकर बारंबार कोटि-कोटि नमन करता है।
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )
आभार – पंडित राकेश कुमार कौशिक जी ( शिक्षाविद् )।
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ।
