[विशेषांक- पवित्र पौराणिक श्लोकों से जानिए श्रीराम जी का मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्रजी होने का भाव]

भारत के देव भूमि कहलाने के प्रमुख कारण इस प्रकार है-
पूरी दुनिया मेंं केवल एक मात्र भारतमाता का ही वह अति पवित्र पावन आँचल है जहाँ ईश्वरीय सत्ता अवतरित होती है। दुनिया के अन्य देशों में ईश्वर के संदेशवाहक आए। भारतमाता के आँचल को अति सुंदर संस्कारों से सुशोभित करने में भगवान श्री रामचंद्रजी, भगवान श्रीकृष्ण जी, भगवान बुद्ध जी, भगवान महावीर जी आदि रूपों में साक्षात् ईश्वर ही साकार हो आए।
इसके अतिरिक्त भारतमाता अर्थात् देवभूमि ने परम् श्रद्धेय ब्रह्मनिष्ठ ऋषिगणों का चरण स्पर्श पाया था। ऐसे अनमोल ज्ञानवर्धक पूर्वजों की तपोभूमि होने के कारण भी यह भूमि का आधार अध्यात्म पोषित बन पाई।
इसी पावन भूमि पर आध्यात्म से परिपूर्ण लोकोपकार व परकल्याण की वेद-ध्वनियां प्रस्फुटित हुई- “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्”- आओ समस्त विश्व को श्रेष्ठ बनाएँ; “सर्वे भवन्तु सुखिनः सब सुखी हो।” जो पूरी दुनिया के अन्य किसी भी प्रान्त में देखने को नहीं मिलती।
नौमी तिथि मधुमास पुनीता।
सुकल पच्छ अभिजित हरि प्रीता।।
नवमी तिथि, पवित्र चैत्रमास, शुक्ल पक्ष, भगवान के प्रिय अभिजित मुहूर्त में, मध्यांहकाल में मर्यादा पुरुषोत्तम कृपालु, माँ कौशल्या जी के हितकारी भगवान श्रीराम जी प्रकट हुए। अति सुंदर नेत्र, मेघ के समान शरीर, चारों भुजाओं में आयुध धारण किए हुए, मनभावन सुंदर आभूषण पहने, गले में कंठमाला धारण किए लक्ष्मीपति श्रीहरि के समक्ष हाथ जोड़े माता कौशल्या जी ने कहा कि माया से रचे अनेक ब्रह्मांड आपके रोम-रोम में हैं, ऐसा श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के पवित्र महाग्रंथ वेद कहते हैं। आप माया, गुण और ज्ञान से अतीत अर्थात् परे हैं ऐसा परम् श्रद्धेय वेद और पुराण कहते हैं। अत: आप यह चतुर्भुज रूप त्याग कर अत्यंत प्रिय बाल-लीला कीजिए। इस प्रकार साधु-पुरुषों के कल्याण के लिए माया, गुण और इन्द्रियों से परे भगवान ने मनुष्य रूप में अवतार धारण किया।
काक भुशुंडि ने बालस्वरूप भगवान श्रीरामचंद्र जी ध्यान का ज्ञान प्राप्त करने हेतु परम् श्रद्धेय महर्षि लोमश ऋषि जी को बाध्य किया। क्रोधवश जब ऋषि जी ने भगवान श्रीराम जी की साकार भक्ति हेतु प्रतिबद्ध काक भुशुंडि को कौआ बनने का श्राप दिया, तब ऋषि को पछतावा हुआ। उन्होंने आदरपूर्वक काक भुशुंडि जी को प्रसन्नतापूर्वक श्री राममंत्र दिया श्रीभगवान शिव की कृपा से प्राप्त गूढ़ और रामचरितमानस को महर्षि लोमश ऋषि जी ने काक भुशुंडि को प्रदान किया और वरदान दिया कि तुम्हारे हृदय में अटल श्रीराम जी भक्ति बसेगी।
काक भुशुंडि भगवान श्री हरि विष्णु जी के वाहन गरुड़ जी से कहते हैं कि मेरी आयु के 27 कल्प बीत चुके हैं। श्री सनातन धर्मरक्षक परब्रह्म भगवान श्री राम जब-जब भक्तों के हित के लिए अयोध्या में शरीर धारण करते हैं-
‘‘तब-तब जाइ राम पुर रहऊं।
सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊं।।’’
तब-तब मैं जाकर अयोध्या में रहता हूँ और प्रभु की बाल-लीला देखकर सुख पाता हूँ । हे गरुड़ जी! श्री रामजी का बालक रूप अपने हृदय में रखकर अपने आश्रम में आ जाता हूँ।
‘‘जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं।
तीरथ सकल जहां चलि आवहिं।।’’
जिस दिन श्री राम जी का जन्म होता है, परम् पूज्य श्री वेद कहते हैं, उस दिन समस्त तीर्थ श्री अयोध्या नगरी में चले आते हैं। मानव जाति के कल्याण के लिए, वैदिक सनातन धर्म की रक्षा के लिए, असुरों के विनाश के लिए भगवान श्रीरामचंद्र जी इस धरा पर अवतरित हुए। भगवान श्री कृष्ण जी स्वयं श्री गीता जी में कहते हैं-
‘‘राम:शस्त्र भृतामहम्।।’’
अर्थात शस्त्रधारियों में श्रीराम मैं हूँ ।
‘‘यसमात्क्षरमतीतोऽहम क्षरादपि चोत्तम:।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरषोत्तम:।।’’
मैं नाशवान शरीर से तथा नाशवान जड़वर्ग से अतीत हूँ तथा अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ इसलिए लोक और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ ।
अहिल्या, केवट, शबरी, सुग्रीव तथा विभीषण भगवान की शरण प्राप्त कर कल्याण को प्राप्त हो गए। जटायु ने आदिशक्ति सीता जी की रक्षा हेतु रावण से युद्ध किया और घायल हो गए। तब अंत समय भगवान श्री राम जी की कृपा प्राप्त कर भगवान के धाम को प्राप्त किया।
भगवान ने सदा अपने भक्तों को सम्मान दिया। रुद्रावतार हनुमान जी की अपने स्वामी प्रभु श्री रामजी के प्रति अटूट भक्ति ने उन्हें सभी लोकों में पूज्य बना दिया। ब्रह्मऋषि कश्यप जी और अदिति ने अपनी कठिन तपस्या के फलस्वरूप भगवान श्रीहरि को पुत्र रूप में प्राप्त किया।
भारतीय जन मानस के समक्ष जीवन का जो आदर्श उन्होंने राजा के रूप में तथा आज्ञाकारी पुत्र के रूप में सबके सामने रखा तथा सबके प्रति अति स्नेह, करुणा और सेवा का भाव रखा, वह संपूर्ण भारतीय समाज तथा मानव जाति के लिए अनुकरणीय है और हमेशा-हमेशा के लिए अनुकरणीय रहेगा।
भगवान श्रीरामचंद्र जी की मर्यादित कर्त्तव्य-परायणता से भारतीय सनातन संस्कृति अत्यंत गौरवान्वित हुई है। समाज के कल्याण के प्रति संवेदनशीलता, वन में रह कर भी लोक कल्याण के कार्य करना, सनातन संस्कृति के ध्वजवाहक ऋषियों-मुनियों को समुचित सम्मान प्रदान करना, नारी के गौरव एवं सम्मान की रक्षा, ये सब प्रभु श्री राम जी की गौरवमयी गाथा के अनुपम उदाहरण हैं।
भारतीय सनातन समाज सदैव उनके सद्-आचरण से प्रेरणा लेता रहेगा। परम् श्रद्धेय महाकवि तुलसीदास जी श्रीराम जी की स्तुति में कहते हैं, ‘‘जिनकी माया के वश में सम्पूर्ण जगत, ब्रह्मादिक देवता व असुर हैं, जिनकी सत्ता से भ्रम की भांति माया रूपी जगत सत्य-सा प्रतीत होता है एवं जिनके चरण ही संसार सागर से तर जाने की इच्छा करने वाले प्राणियों की एकमात्र नौकारूप हैं, उन आदि पुरुष परब्रह्म, माया से परे श्री राम रूपी भगवान श्री हरि को मैं बड़ी श्रद्धा से दोनों हाथ जोड़कर-नतमस्तक होकर कोटि-कोटि नमन करता हूँ।’’ संपूर्ण संसार के आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी की सदा जय ।
श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति की सदा जय।
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी ।
( ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
आभार –
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी (शिक्षाविद्)।
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ।
