विशेषांकः “राष्ट्रीय बाल दिवस” अद्भुत, अद्वितीय और अविस्मरणीय शौर्य की बेमिसाल शौर्यगाथा

आज संसार मानवता धार्मिक कट्टरता व आतंकवाद से ग्रस्त है। भारतवर्ष सदियों से इन समस्याओं से जूझता आया है परंतु भारत के अनमोल लालों ने शूरवीरता, धर्मरक्षा और निर्भयता के ऐसे-ऐसे कारनामे कर दिखाए हैं जो पूरी दुनिया के लिए अचंभित करने वाले हैं। इन लाखों-करोड़ों वीरों की बलिदानी परंपरा में दो नाम ऐसे भी हैं जिन्होंने मात्र पांच साल और सात साल की अल्पायु में धार्मिक कट्टरता, असहिष्णुता और आतंकवाद के खिलाफ स्वधर्मरक्षा, मानवता की अविस्मरणीय बुलंद आवाज उठाई। इन धर्मरक्षक सिंहशावकों के नाम हैं परम् श्रद्धेय परम् पूज्यनीय गुरु गोबिंदसिंह जी के छोटे साहिबजादे जोरावर सिंह जी (सात वर्ष) एवं फतेह सिंह जी (मात्र पांच वर्ष)। जिस अद्भुत शूरवीरता, निर्भयता एवं परिपक्व विचारधारा पर दृढ़ रह कर इन परम् पूज्यनीय बाल भुजंगियों ने न केवल अत्याचारों के सम्मुख झुकने से इंकार कर दिया अपितु अपने जवाब से सरहिंद के नवाब को ऐसा निरुत्तर कर दिया कि वह अपने ही दरबार में बगले झाँकने लगा। 26 दिसंबर सन् 1705 ई0 को इन अत्यंत महान् आत्माओं ने भारतीय शौर्य, आत्मा की अमरता, सभी धर्मों व आस्थाओं का सम्मान करने की भारतीय परंपरा को नया आयाम दिया जो पूरी की पूरी दुनिया में बेमिसाल बिलकुल सोने जैसा खरा उदाहरण है। भारतीय बच्चों के लिए परम् श्रद्धेय फतेह सिंह एवं परम् श्रद्धेय जोरावर सिंह से अधिक प्रेरक कोई व्यक्तित्व नहीं हो सकता। मेरे हृदय की सच्ची आवाज यहीं है कि क्यों न 26 दिसंबर को “राष्ट्रीय बाल दिवस” घोषित किया जाए।
अद्भुत, अद्वितीय और अविस्मरणीय बलिदान की शौर्यगाथा संपूर्ण कहानी यूँ है, कि उस समय देश में मुगलों का शासन था और पंजाब का गवर्नर था वजीर खाँ जो कट्टरपंथी और दूसरे धर्मों से नफरत करने वाला था। परम् श्रद्धेय गुरु गोबिंद सिंह जी का धर्म व देश की रक्षा के लिए विदेशी शासकों से युद्ध चल रहा था। सरसा नदी पर जब परम् पूज्य गुरु गोबिंद सिंह जी परिवार जुदा हो रहा थे, तो एक ओर जहाँ परम् श्रद्धेय बड़े साहिबजादे आदरणीय गुरुजी के साथ चले गए, वहीं दूसरी ओर परम् पूज्य छोटे साहिबजादे जोरावर सिंह जी और फतेह सिंह जी, परम् श्रद्धेय एवं पूज्यनीय माता गुजरी जी के साथ रह गए थे। उनके साथ न कोई सैनिक था और न ही कोई उम्मीद थी जिसके सहारे वे परिवार से वापस मिल सकते। अचानक रास्ते में उन्हें गंगू मिल गया, जो किसी समय पर गुरु महल की सेवा किया करता था। गंगू ने उन्हें यह यकीन दिलाया कि वह उन्हें उनके परिवार से मिलाएगा और तब तक के लिए वे लोग उसके घर में रुक जाएँ। परम् पूज्यनीय माता गुजरी जी और साहिबजादे गंगू के घर चले तो गए लेकिन वे गंगू की असलियत से वाकिफ नहीं थे। गंगू ने लालच में आकर तुरंत वजीर खाँ को गोबिंद सिंह की माता और छोटे साहिबजादों के उसके यहाँ होने की खबर दे दी जिसके बदले में वजीर खाँ ने उसे सोने की मोहरें भेंट की। यह देश का दुर्भाग्य रहा है कि यहाँ गंगू जैसे गद्दारों की कभी कमी नहीं रही।
खबर मिलते ही वजीर खाँ के सैनिक माता गुजरी जी और सात वर्ष की अल्पायु के साहिबजादा जोरावर सिंह जी और पाँच वर्ष की अल्पायु के साहिबजादा फतेह सिंह जी को गिरफ्तार करने गंगू के घर पहुँच गए। उन्हें लाकर ठंडे बुर्ज में रखा गया और उस ठिठुरती ठंड से बचने के लिए कपड़े का एक टुकड़ा तक ना दिया। रात भर ठंड में ठिठुरने के बाद सुबह होते ही दोनों साहिबजादों को वजीर खाँ के सामने पेश किया गया, जहाँ भरी सभा में उन्हें इस्लाम धर्म कबूल करने को कहा गया। कहते हैं सभा में पहुँचते ही बिना किसी हिचकिचाहट के दोनों साहिबजादों ने जोर से जयकारा लगाया- “जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल”।
भरी सभा में यह देख सब दंग रह गए, उन दिनों वजीर खाँ की मौजूदगी में कोई ऐसा करने की हिम्मत भी नहीं कर सकता था लेकिन परम् श्रद्धेय गुरुजी की नन्हीं जिंदगियां ऐसा करते समय एक पल के लिए भी ना डरीं। सभा में मौजूद मुलाजिम ने साहिबजादों को वजीर खां के सामने सिर झुकाकर सलामी देने को कहा, लेकिन इस पर उन्होंने जो जवाब दिया वह सुनकर सबने चुप्पी साध ली। दोनों ने सिर ऊँचा करके जवाब दिया कि “हम अकाल पुरख और अपने गुरु पिता के अलावा किसी के भी सामने सिर नहीं झुकाते। ऐसा करके हम अपने दादा जी की कुर्बानी को बर्बाद नहीं होने देंगे, यदि हमने किसी के सामने सिर झुकाया तो हम अपने दादा जी को क्या जवाब देंगे जिन्होंने राष्ट्र धर्म की रक्षा के नाम पर सिर कलम करवाना सही समझा, लेकिन झुकना नहीं”। वजीर खाँ ने दोनों साहिबजादों को काफी डराया, धमकाया और प्यार से भी इस्लाम कबूल करने के लिए कहा, लेकिन दोनों अपने निर्णय पर अटल थे। आखिर में दोनों साहिबजादों को जिंदा दीवारों में चुनवाने का ऐलान किया गया। कहते हैं दोनों साहिबजादों को जब दीवार में चुनना आरंभ किया गया तब उन्होंने “जपुजी साहिब” का पाठ करना शुरू कर दिया और दीवार पूरी होने के बाद अंदर से जयकारा लगाने की आवाज भी आई।
ऐसा कहा जाता है कि वजीर खाँ के कहने पर दीवार को कुछ समय के बाद तोड़ा गया, यह देखने के लिए कि साहिबजादे अभी जिंदा हैं या नहीं। तब दोनों साहिबजादों के कुछ श्वास अभी बाकी थे, लेकिन मुगल मुलाजिमों का कहर अभी भी जिंदा था। उन्होंने दोनों साहिबजादों को जबर्दस्ती मौत के गले लगा दिया। उधर दूसरी ओर साहिबदाजों की शहीदी की खबर सुनकर माता गुजरी जी ने अकाल पुरख को इस गर्वमयी शहादत के लिए शुक्रिया किया और अपने श्वास त्याग दिए।
परम् पूज्यनीय गुरुपुत्रों का यह बलिदान केवल भारतीय इतिहास में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास में अद्भुत, अद्वितीय और अविस्मरणीय है। धार्मिक असहिष्णुता, अत्याचार, आतंकवाद के खिलाफ यह दिन भारतीय बच्चों के लिए प्रेरणादायी आंदोलन का अत्यंत उत्कृष्ट गौरवमयी शंखनाद है। परम् पूज्य गुरु साहिब के चारों साहिबजादों से बढ़ कर भारतीय समाज व विशेषकर बच्चों के लिए आदर्श कौन हो सकता है? वर्तमान में हर साल 14 नवंबर को बाल दिवस मनाया जाता है जो पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिन है। कहते हैं कि नेहरू जी को बच्चे चाचा के नाम से पुकारते थे और उन्हीं की याद में इस दिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। नेहरु जी देश के पहले प्रधानमंत्री एवं आधुनिक भारत के निर्माता तो हैं परंतु हमारे बच्चों के लिए आदर्श तो परम् पूज्य गुरुपुत्र ही हो सकते हैं। अगर राष्ट्रीय बाल दिवस मनाना है तो परम् श्रद्धेय एवं परमपूजनीय आदरणीय गुरुगोविन्द सिंह जी के चारों अत्यंत महान् साहिबजादों के नाम पर मनाना चाहिए जिन्होंने राष्ट्र धर्म की रक्षार्थ हेतु अपने प्राणों की आहुति हंसते-हंसते दे दी और पूरी दुनिया में माँ भारती का नाम रोशन कर दिया। नन्हें बालकों की ऐसी बेमिसाल शौर्यगाथा पूरी दुनिया के इतिहास में देखने को भी नहीं मिलती। इन परम् श्रद्धेय साहिबजादों के अद्भुत, अद्वितीय और अविस्मरणीय बलिदान के लिए संपूर्ण प्राणी जगत बड़ी श्रद्धा से शीश झुकाकर बारंबार कोटि-कोटि नमन करता है। धन्य परम् श्रद्धेय गुरुपुत्र।
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी)
आभार –
पंडित राकेश शर्मा जी ।
(शिक्षाविद् )।
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ।
