धर्म संसारः धर्मो रक्षति रक्षितः!

[विशेषांक: दृढ़ इच्छा शक्ति की अनमोल शख्सियत- पंडित मदन मोहन मालवीय जी।]

व्यक्ति अगर किसी कार्य को करने का दृढ़ संकल्प हृदय में धारण कर ले और उसके लिए पूरी शक्ति से जुट जाए तो उसका वह कार्य पूरा होने से कोई नहीं रोक सकता है। इस वाक्य को यथार्थ के धरातल पर उतारने वाले किसी व्यक्ति का स्मरण करे तो पंडित मदन मोहन मालवीय का नाम ही प्रमुखता से सामने आता है। एक ऐसा महान् प्रकांड महाविद्वान व्यक्ति जिसकी इच्छाशक्ति इतनी प्रबल थी कि बगैर किसी संसाधन के ही राष्ट्र के आंचल में एक ऐसे महान् विश्वविद्यालय की स्थापना कर दी, जो कालांतर में पूरे राष्ट्र में ही नहीं पूरी दुनिया में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के नाम से विश्वविख्यात हुआ। पंडित मदन मोहन मालवीय जी एक उच्च कोटि के महान् स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, वकील और समाज सुधारक थे। महात्मा गाँधी द्वारा दी गई उपाधि महामना के नाम से प्रसिद्ध पंडित मदन मोहन मालवीय
जी की स्वर्णजयंती संपूर्ण जगत में बड़े हर्षोल्लास से मनाई गई।
महामना का जन्म 25 दिसंबर सन् 1861ई0 को प्रयागराज ( उत्तर प्रदेश ) में हुआ और शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय में। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षक की नौकरी की, वकालत की और एक समाचार पत्र का संपादन भी बखूबी निभाया। लेकिन देश में शिक्षा का अभाव देख कर उन्होंने सन् 1915 ई0 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की।
महात्मा गाँधी भी महामना की दृढ़ संकल्पशक्ति के इतने कायल थे कि वह उन्हे अपना बड़ा भाई मानते थे और सच्चे हृदय से पंडित महामना जी हार्दिक सम्मान भी करते थे। पंडित महामना जी, देश की गुलामी की स्थिति से बहुत दु:खी थे और आजादी के प्रबल समर्थक। उन्होंने करीब 50 वर्षों तक कांग्रेस से जुड़ कर आजादी की लड़ाई में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सविनय अवज्ञा तथा असहयोग आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई थी। वह राष्ट्र को आजाद देखना चाहते थे लेकिन आजादी मिलने से एक वर्ष पूर्व ही राष्ट्र एवं शिक्षा जगत को रोशन करने वाला यह चिराग अचानक अस्त हो गया।

पंडित महामना जी के संबंध में एक किस्सा बहुत ही मशहूर है, जिसमे उन्होंने हैदराबाद के निजाम को सबक सिखाया था। हुआ कुछ यूँ कि पंडित महामना जी उन दिनों बनारस विश्वविद्यालय के लिए पूरे राष्ट्र में घूम-घूम कर चंदा एकत्र कर रहे थे। इसी क्रम में पंडित जी हैदराबाद के निजाम के पास भी पहुँचे और उनसे विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए कुछ आर्थिक सहायता माँगी। जिस पर निजाम ने साफ इनकार ही नहीं किया बल्कि उनका अपमान करने के लिए कहा कि उन्हे दान में देने के लिए उसके पास केवल जूता ही है। इस पर महामना जी ने निजाम से उसके जूते ले लिए और बाजार में खडे़ होकर उसको बेंचने लगे। हैदराबाद के निजाम को जब इस बात की खबर लगी तो उसने बदनामी के ड़र से पंडित महामना जी को बुलाया और बहुत बड़ी रकम दान में दे कर इज्जत के साथ विदा किया। अंग्रेजी शासन के दौर में देश में एक स्वदेशी विश्वविद्यालय के निर्माण कार्य को पूरा कराना पंडित महामना जी की बहुत ही बड़ी उपलब्धि थी। वही साथ ही साथ राष्ट्र माननीय पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की भी जयंती बड़े हर्षोल्लास से मना रहा है। परम् श्रद्धेय अटल जी ने निःस्वार्थ भाव से राष्ट्र एवं समाज की सेवा की। जहाँ एक ओर उन्होंने परमाणु परीक्षण और कारगिल युद्ध में विश्व को उभरते भारतवर्ष की शक्ति का एहसास करवाया, तो वहीं दूसरी ओर राष्ट्र में सुशासन की परिकल्पना को चरितार्थ भी कर दिखाया उनके अत्यंत विराट योगदान को देश हमेशा याद रखेगा।
विश्व के श्रेष्ठ महाविद्वान पंडित मदन मोहन मालवीय जी एवं परम् श्रद्धेय पूर्व प्रधानमंत्री आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती पर उनका स्मरण कर संपूर्ण प्राणी जगत उन्हें बड़ी श्रद्धा से शीश झुकाकर बारंबार कोटि-कोटि नमन करता हैं।
जय हिंद -जय भारत -जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )
आभार -पंडित राकेश शर्मा जी।
(शिक्षाविद् )।
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ।

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