अत्यंत महान् महर्षि आर्यभट्ट जी के अद्वितीय परम् ज्ञान से आज भी शिक्षा लेता है- “नासा”।
[जयंती विशेषांक- 14.04.2023]

लाखों वर्ष पहले से ही माँ भारती के आँचल को अपने पवित्र पावन परम् ज्ञान व तपोनिष्ठ बल से सुशोभित करने वाले अत्यंत महान् ऋषि-मुनि विभिन्न क्षेत्रों में हमेशा ही अद्भुत ज्ञान और अद्वितीय खोज में अध्ययनरत रहते थे। उनका मस्तिष्क सृजनात्मक और बहुआयामी था। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में संसार को उनकी कई महत्वपूर्ण देनें हैं, जिसके लिए पूरा विश्व, राष्ट्र और समाज आज भी उनका ऋणी है और नतमस्तक है।
अंग्रजो के पिट्ठुयो के, इतिहास में लुटेरे के, आक्रांताओं के , आक्रमणकारी- लुटेरे मुगलों के और अंग्रेजो का ही इतिहास पढ़ाया जाता है जिन्होंने पवित्र पावन भारतीय संस्कृति को केवल तहस – नहस करने का प्रयास किया गया, भारी भरकम जजिया कर लगाकर मानवता के साथ खिलवाड़ किया। वास्तव में जिन्होंने विश्व और समाज के लिए उपयोगी खोज किया उनका इतिहास ही खत्म कर दिया गया लेकिन वे महापुरुषों किसी परिचय के मोहताज नहीं थे और न ही झोलाछाप इतिहासकारों की लेखनी के बिना विस्मृत होने वाले हैं। उन तमाम महान आत्माओ में से एक हैं महान् खगोलशात्री एवं सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञ आर्यभट्ट जी। जिनका आज जयंती महोत्सव विश्व पटल पर बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। विश्व पटलीय “नासा” आज भी उनकी ही शिक्षा से प्रयोगशाला चला रही है लेकिन अफ़सोस की बात तो ये है कि हम में से कोई भी उनके बारे में जानते ही नहीं हैं।
खगोलशास्त्र का अर्थ है ग्रह, नक्षत्रों की स्थिति एवं गति के आधार पर पंचांग का निर्माण। जिससे शुभ कार्यों के लिए उचित मुहूर्त निकाला जा सके। इस क्षेत्र में भारत का लोहा दुनिया को मनवाने वाले वैज्ञानिक आर्यभट्ट जी के समय में अंग्रेजी तिथियाँ प्रचलित नहीं थीं। अपने एक ग्रन्थ में उन्होंने कलयुग के 3,600 वर्ष बाद की मध्यम मेष संक्रान्ति को अति श्रेष्ठ ब्राह्मण वंश में जन्मे आर्यभट्ट जी ने अपनी आयु 23 वर्ष बतायी। इस आधार पर विद्वान् उनकी जन्मतिथि 21 मार्च 476 ई0 मानते हैं। उन्होंने स्वयं अपना जन्मस्थान कुसुमपुर बताया है। कुसुमपुर का अर्थ है फूलों का नगर।
जिसे आज पाटलिपुत्र या वर्तमान पटना शहर के नाम से जाना जाता हैं। 973 ई0 में भारत आये पर्शिया के विद्वान अलबेरूनी ने भी अपने यात्रा वर्णन में ‘कुसुमपुर के आर्यभट्ट जी’ की चर्चा अनेक स्थानों पर बड़ी आन-बान और शान से की है। कुछ विद्वानों का मत है कि उनके पंचांगों का प्रचलन उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में अधिक है, इसलिए कुसुमपुर कोई दक्षिण भारतीय नगर होगा। कुछ लोग इसे विन्ध्य पर्वत के दक्षिण में बहने वाली नर्मदा और गोदावरी के बीच का कोई स्थान बताते हैं। कुछ विद्वान आर्यभट्ट जी को केरल निवासी मानते हैं।
पहले आर्यभट्ट जी गणित, खगोल या ज्योतिष के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिक नहीं थे पर उनके समय तक पुरानी अधिकांश गणनाएँ एवं मान्यताएँ विफल हो चुकी थीं। पितामह सिद्धान्त, सौर सिद्धान्त, वशिष्ठ सिद्धान्त, रोमक सिद्धान्त और पौलिष सिद्धान्त, यह पाँचों सिद्धान्त पुराने पड़ चुके थे। इनके आधार पर बतायी गयी ग्रहों की स्थिति तथा ग्रहण के समय आदि की प्रत्यक्ष स्थिति में काफी अन्तर मिलता था। इस कारण भारतीय ज्योतिष पर से लोगों का विश्वास उठ गया। ऐसे में लोग इन्हें अवैज्ञानिक एवं अपूर्ण मानकर विदेशी एवं विधर्मी पंचांगों की ओर झुकने लगे थे। उस काल में, संपूर्ण विश्व के पटल पर चमकते ध्रुव समान रूपी- महान् आर्यभट्ट जी ने इस स्थिति को समझकर इस शास्त्र का गहन अध्ययन किया और उसकी कमियों को दूरकर नये प्रकार से जनता के सम्मुख प्रस्तुत किया। उन्होंने पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों की अपनी धुरी तथा सूर्य के आसपास घूमने की गति के आधार पर अपनी गणनाएँ कीं। इससे लोगों का विश्वास फिर से भारतीय खगोलविद्या एवं ज्योतिष पर जम गया इसी कारण से विश्व प्राणी जगत उन्हें भारतीय खगोलशास्त्र का महान् प्रवर्तक भी मानते हैं। उन्होंने एक स्थान पर स्वयं को ‘कुलप आर्यभट’ कहा है। इसका अर्थ कुछ
- विद्वान् यह लगाते हैं कि वे विश्वप्रसिद्ध नालन्दा विश्व विद्यालय के कुलपति भी थे। उनके ग्रन्थ ‘आर्यभटीयम्’ से हमें उनकी महत्वपूर्ण खोज एवं शोध की जानकारी मिलती है। इसमें कुल 121 श्लोक हैं, जिन्हें –
- गीतिकापाद, गणितपाद, कालक्रियापाद और गोलापाद नामक चार भागों में बाँटा है।
वृत्त की परिधि और उसके व्यास के संबंध को ‘पाई’ कहते हैं। महर्षि आर्यभट्ट जी द्वारा बताये गये इसके मान को ही आज भी गणित में प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त * पृथ्वी, चन्द्रमा आदि ग्रहों के प्रकाश का रहस्य, छाया का मापन, कालगणना, बीजगणित, त्रिकोणमिति, व्यासविधि, मूल-ब्याज, सूर्योदय व सूर्यास्त के बारे में भी उन्होंने निश्चित सिद्धान्त बताये। * आर्यभट जी की इन खोजों से गणित एवं खगोल का परिदृश्य बदल गया। उनके अद्वितीय, अद्भुत और अविस्मरणीय योगदान को सदा स्मरण रखने के लिए 19 अप्रैल, 1975 ई0 को अन्तरिक्ष में स्थापित कियेे गये भारत में ही निर्मित प्रथम कृत्रिम उपग्रह का नाम ‘आर्यभट’ रखा गया। ऐसा महान् आदर्श सम्मान परम् श्रद्धेय महर्षि आर्यभट्ट जी एवं भास्कराचार्य जी से पहले शायद किसी को मिला भी न हो। देश के जाने-माने अत्यंत महान् वैज्ञानिक एवं भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर जी ने कहा कि वेद के कुछ श्लोकों में चंद्रमा पर जल की मौजूदगी का जिक्र है और आर्यभट्ट जी जैसे- अत्यंत महान् खगोलविद्वान न्यूटन से भी कहीं पहले गुरुत्वाकर्षण बल के बारे में जानते थे।
पद्म विभूषण से सम्मानित किये जा चुके 71 साल के नायर ने कहा कि भारतीय संस्कृति के महान् विशिष्ट अकाट्य सत्य प्रमाणित महाग्रंथो- वेदों और प्राचीन हस्तलेखों में भी * धातुकर्म, * बीजगणित, * खगोल शास्त्र, गणित, वास्तुकला एवं ज्योतिष-शास्त्र के बारे में सूचना थी और यह जानकारी उस वक्त से थी, जब पश्चिमी देशों को इनके बारे में कुछ पता भी नहीं था।
नायर जी ने कहा कि वेदों में दी गई जानकारी ‘संक्षिप्त स्वरूप’ में थी जिससे आधुनिक विज्ञान के लिए उन्हें स्वीकार करना मुश्किल हो गया। नायर जी ने कहा, एक वेद के कुछ श्लोकों में कहा गया है कि चंद्रमा पर जल है, लेकिन किसी ने इस पर भरोसा नहीं किया। हमारे चंद्रयान मिशन के जरिये हम इसका पता लगा सके और यह पता लगाने वाला हमारा देश विश्व में पहला और अग्रणी देश रहा है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति के अत्यंत पवित्र और अकाट्य महान् महाग्रंथ वेदों में लिखी सारी बातें नहीं समझी जा सकतीं क्योंकि वे (अति प्राचीन शुद्धतम् संस्कृत लिपि) क्लिष्ठ संस्कृत में हैं। पाँचवीं सदी के अत्यंत महान् खगोलविद्वान और गणितज्ञ आर्यभट्ट जी की तारीफ में नायर जी ने कहा– हमें वास्तव में गर्व है कि महान् विशिष्ट विभूति आर्यभट्ट जी और भास्कर जी ने ग्रहों एवं बाहरी ग्रहों के विषय पर गहन कार्य किया है। यह एक चुनौतीपूर्ण क्षेत्र था। उन्होंने कहा, यहाँ तक कि चंद्रयान के लिए भी आर्यभट्ट का समीकरण इस्तेमाल किया गया। गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के बारे में भी न्यूटन को इसके बारे में करीब 1500 साल बाद पता चला जबकि अंग्रेजों ने विश्व पटल पर न्यूटन को महान् बताकर सिर्फ और सिर्फ अपना बोलबाला और भारतीय संस्कृति को धूमिल करने की तुच्छ मानसिकता की परिचायक मात्र थी। यह जानकारी हमारे अति विशिष्ट और सत्य प्रमाणित पौराणिक महाग्रंथो में स्वर्णिम इतिहास के रूप में उपलब्ध है।
आज उस अत्यंत महानतम वैज्ञानिक और संसार को संसार के बारे में बताने वाले उस खगोलशास्त्री को उनके जयंती महापर्व पर भारतवासी बारम्बार नमन करते हुए उनकी अद्वितीय, अद्भुत और अविस्मरणीय गौरवगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेते है। भारतीय संस्कृति की इस शोधशाला में महान् शिक्षाविद् आदरणीय ऋषिपाल जी ने कहा कि महान् खगोलशात्री व गणितज्ञ आर्यभट्ट जी की अद्भुत और अविस्मरणीय गौरवगाथा का इतिहास हमेशा चमकते सूर्य की भाँति संपूर्ण संसार को रोशन करता रहेगा। ऐसी अत्यंत महान् विशिष्ट विभूति महाविद्वान प्रकांड महापंडित आदरणीय आर्यभट्ट जी के जयंती महापर्व पर समस्त प्राणी जगत बड़ी श्रद्धा से शीश झुकाकर बारंबार कोटि-कोटि नमन करता है।
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति ।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
( ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
आभार –
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी। ( शिक्षाविद् )। लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ।
उत्तर प्रदेश ।
