महर्षि शांडिल्य जी एक अत्यंत महान ऋषि थे, और इसी के नाम पर ब्राह्मण वंश में शांडिल्य गोत्र एवं संबंधित श्रेष्ठ गोत्र का विस्तार हुआ। शांडिल्य एक सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण गोत्र है, ये वेदों में श्रेष्ठ और उच्चकुलिन घराने के ब्राह्मण हैं। यह गोत्र ब्राह्मणों के तीन मुख्य ऊंचे गोत्रों में से एक है।
परम् श्रद्धेय महर्षि वेद व्यास जी द्वारा रचित भारतीय संस्कृति के विश्वविख्यात महान् महाग्रंथ महाभारत-अनुशासन पर्व के अनुसार – धर्मराज युधिष्ठिर जी की सभा में समस्त परम् श्रद्धेय ऋषियों में महर्षि शांडिल्य जी का नाम भी प्रमुख रूप से आता है। ब्राह्मणों से ही इस संसार का अस्तित्व है इस संसार की शुरुआत सतयुग से ही शांडिल्य ऋषि और अन्य ब्राह्मणों का अस्तित्व बना हुआ है, इसलिए मान्यता यह भी है, कि सबसे पहले सतयुग में वेद-शास्त्र और शास्त्रों की शिक्षा भी महर्षि शांड्य जी और महर्षि गार्गस्य ऋषि जी के अज्ञान में ही शुरू हुआ था। परम् श्रद्धेय महर्षि शांडिल्य जी त्रेतायुग में चक्रवर्ती सम्राट दिलीप के राजपुरोहित बताए गए हैं, वहीं द्वापर में वे विश्वप्रसिद्ध चक्रवर्ती सम्राट राजा नंद जी के पुजारी हैं, एक समय में वे चक्रवर्ती सम्राट महाराजा त्रिशुंक जी के पुजारी थे तो दूसरी बार वे विश्वप्रसिद्ध महाभारत के नायक भीष्म पितामह और अपने ब्राह्मण भ्राता भगवान श्री परशुराम जी के साथ बोलते हुए दिखाए गए हैं। कलयुग के प्रारंभ में वे पैदा हुए पुत्रों के पुत्र शतानिक के पुत्रेष्ठ यज्ञ को पूर्ण रूप से प्रकट होते हैं। इसके साथ ही वस्तुतः परम् श्रद्धेय महर्षि शांडिल्य जी एक अनोखे, अटूट और अनमोल ऐतिहासिक ब्राह्मण ऋषि हैं लेकिन कालांतर में उनके नाम से डिग्रीयां शुरू हुई हैं जैसे वशिष्ठ, विश्वामित्र और व्यास नाम से डिग्रीयां हैं। महर्षि शांडिल्य जी गोत्र के अनुसार-गोत्र (गौड़ ब्राह्मण, तिवारी ब्राह्मण, त्रिपाठी ब्राह्मण, राय ब्राह्मण, शर्मा ब्राह्मणों में कॉमन डिग्री, मिश्रा ब्राह्मण, गोस्वामी ब्राह्मण शैली) महर्षि शांडिल्य जी के बारह बेटे दिखाते हैं, जो इन दस गांवों के प्रमुख स्थानों से हैं अधीन रहते हैं। पिंडी, सोहगोरा, संराएं, श्रीजन, धतूरा, बगराइच, बलूआ, हलदी, झूडीयां, उनवलियां, लोनापार, कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है और कालांतर में इन छोटे बारह गांवों से आज चारों ओर उनका विकास हुआ है, ये सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। ये गोत्र श्रीमुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का वोग है जिसमें राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ प्रकार विष्णु घराना, मणि घराना है, इन चारों का उदीयमान सोहगोरा गोरखपुर शहर से आज भी इसके चारों ओर अति सुंदर अस्तित्व बना हुआ है। इस गोत्र के लोग श्रावस्ती के बारांवा हरगुन मे भी निवास करते हैं जो अधिकतर शर्मा ब्राह्मण वंशीय होते हैं ये उच्चकोटि के उत्तम वंशीय उच्चकुलीन ब्राह्मण डलिया के भट्ट ब्राह्मण वंशीय है। ये प्रचार – प्रसार सृष्टि में विस्तृत हैं। महर्षि शांडिल्य जी आदि उच्चकोटि के मंडल अन्य शास्त्रों में भी स्मृत हुए हैं। हेमाद्रि के लक्षण प्रकाशित में शांडिल्य जी को एक महान आयुर्वेद कहा गया है। विभिन्न पाठ ग्रंथों से पता चलता है कि किस नाम से विख्यात एक गृह्यसूत्र एवं एक स्मृतिग्रंथ भी था। ब्राह्मण वंश के अंतर्गत कुछ अन्य अनोखे,अद्भुत और अजीब अत्यंत महान विशिष्ट विभूतियां जो धर्मो रक्षति रक्षितः! भरी सब कुछ न्यौछावर कर दिया।
राष्ट्र के चहुँओर श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति की अनमोल पताका फहराने वाले परम् पूज्य आदि जगतगुरु शंकराचार्य जी, अखंड भूमंडलाचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य जी और विश्वविख्यात महाविद्वान भाष्य भााचार्य जी, परम् श्रद्धेय एवं पूज्यनीय रामानुजाचार्य जी, परम् पूज्य मध्वाचार्य जी, महाविद्वान प्रकांड महापंडित आदरणीय कुमार जी, श्रीभट्ट ब्राह्मण वंश की अत्यंत महान विशिष्ट विभूतियां हैं। ये अत्यंत महान विशिष्ट विभूतियों को श्रद्धा से शीशा झटकते बारंबार कोटि-कोटि नमन।
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म प्रथा का कभी नाश न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी)।
शुभ-
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी।
लक्ष्मीनगर, मुजफ्फरनगर।
उत्तर प्रदेश।

