धर्म-संसारः धर्मो रक्षति रक्षितः

[विशेषांकः मानवता की सच्ची पहचान श्री सत्य सनातन धर्म की यश और कीर्ति अत्यंत महान् ]

‘यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।

धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥’

 संपूर्ण संसार को शुशोभित करने वाले माँ भारती के अद्वितीय, अद्भुत और अविस्मरणीय सत्य प्रमाणित महाग्रंथो- ग्रंथों एवं पौराणिक तथ्यों के अनुसार संपूर्ण संसार में पहले वैदिक धर्म ही था। कालांतर में लोगों और तथाकथित संतों ने मतभिन्नता को जन्म दिया और इस तरह एक ही धर्म के लोग कई जातियों व उप-जातियों और वर्गों में बंट गए।
इसमें से एक वर्ग स्वयं को वैदिक धर्म का अनुयायी और आर्य कहता था तो दूसरा जादू-टोने में विश्वास रखने वाला और प्रकृति तत्वों की पूजा करने वाला था।

पौराणिक तथ्यों के अनुसार कहा हैं कि सृष्टि के पालनहार श्रीभगवान श्रीकृष्ण जी के काल में ऐसे 72 से अधिक अवैदिक समुदाय दुनिया में मौजूद थे। ऐसे में श्रीभगवान श्रीकृष्ण जी ने सभी को एक किया और फिर से श्री वैदिक सनातन धर्म की स्थापना की अर्थात् श्री सत्य सनातन धर्म की स्थापना की।

● आज हिंदू धर्म की हालत यह है कि हर संत का अपना एक धर्म और हर जाति का अपना अलग धर्म है। लोग भ्रम और भटकाव में जी रहे हैं। वेदों को छोड़कर संत, पंथ, रिलीजन और अन्य लोग दूसरे या मनमाने धर्म के समर्थक बन गए हैं। खैर…

 ● अक्सर यह कहा जाता है कि हिंदू धर्म का कोई संस्थापक नहीं। इस धर्म की शुरुआत का कुछ अता-पता नहीं। हालाँकि धर्म शास्त्रों के ज्ञाता एवं शिक्षाविद् पंडितों के अनुसार वर्तमान में जारी इस धर्म की शुरुआत परम् श्रद्धेय प्रथम मनु स्वायम्भुव मनु जी के मन्वन्तर से हुई थी।
● परम् श्रद्धेय ब्रह्मा जी, परम् श्रद्धेय श्रीविष्णु जी एवं परम् श्रद्धेय महेश सहित अग्नि, आदित्य, वायु और अंगिरा ने इस अनमोल धर्म की स्थापना की। क्रमश: कहे तो श्री विष्णु जी से श्री ब्रह्मा जी, श्री ब्रह्मा जी से 11 रुद्र,11 प्रजापतियों और स्वायंभुव मनु जी के माध्यम से इस अत्यंत महान् धर्म की स्थापना हुई। इसके बाद इस धा‍र्मिक ज्ञान की श्री शिव के सात शिष्यों से अलग-अलग शाखाओं का निर्माण हुआ। वेद और मनु सभी धर्मों का मूल है। मनु के बाद कई संदेशवाहक आते गए और इस ज्ञान को अपने-अपने विवेकानुसार प्राणी जगत (लोगों) तक पहुँचाया।

 लगभग 90 हजार से भी अधिक वर्षों की परंपरा से यह परम् ज्ञान श्रीभगवान श्रीकृष्ण जी और गौतम बुद्ध जी तक पहुँचा। यदि कोई पूछे- कौन है हिंदू धर्म का संस्थापक तो कहना चाहिए श्रीभगवान ब्रह्मा जी है प्रथम और श्री भगवान श्रीकृष्ण-बुद्ध हैं अंतिम। जो पूछते हैं उन्हें कहिए कि …अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ने हिंदू धर्म अर्थात् श्री सत्य सनातन धर्म की स्थापना की। यह किसी पदार्थ नहीं परम् श्रद्धेय अत्यंत महान् ऋषियों के नाम हैं।

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।

दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु : समलक्षणम्॥- मनु स्मृति

● जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा जी को प्राप्त कराए उन परम् श्रद्धेय श्री ब्रह्मा जी ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा से ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद को ग्रहण किया। -मनु स्मृति

● आदि सृष्टि में अवान्तर प्रलय के पश्चात् श्री भगवान श्री ब्रह्मा जी के पुत्र स्वायम्भुव मनु जी ने धर्म का उपदेश दिया। परम् श्रद्धेय मनु जी ने श्री भगवान श्री ब्रह्मा जी से अद्भुत, अद्वितीय और अनमोल शिक्षा पाकर भृगु, मरीचि आदि ऋषियों को वेद की शिक्षा दी। इस वाचिक परम्परा के वर्णन का पर्याप्‍त भाग मनुस्मृति में यथार्थरूप में से मिलता है।

● चक्रवर्ती सम्राट महाराजा जनक जी के कुलगुरु परम् श्रद्धेय महायोगिश्वर महर्षि याज्ञवल्क्य के अति पवित्र पावन धार्मिक ग्रंथ “श्रीशतपथ ब्राह्मण ग्रंथ” के अनुसार अग्नि, वायु एवं सूर्य ने तपस्या की और ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद को प्राप्त किया।

● प्राचीनकाल में ऋग्वेद ही था फिर ऋग्‍वेद के बाद यजुर्वेद व सामवेद की शुरुआत हुई। बहुत काल तक यह तीन वेद ही थे। इन्हें वेदत्रयी कहा जाने लगा। मान्यता अनुसार इन तीनों के ज्ञान का संकलन श्रीभगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था।

● अथर्ववेद के संबंध में मनुस्मृति के अनुसार- इसका ज्ञान सबसे पहले महर्षि अंगिरा जी को हुआ। बाद में अंगिरा जी द्वारा सुने गए अथर्ववेद का संकलन ऋषि अथर्वा द्वारा कि‍या गया। इस तरह हिंदू धर्म दो भागों में बंट गया एक वे जो ऋग्वेद को मानते थे और दूसरे वे जो अथर्ववेद को मानते थे। इस तरह चार पवित्र पावन धार्मिक ग्रंथों का अवतरण हुआ। जो संपूर्ण संसार मेंं पूर्णतः सत्य प्रमाणित हैं और अकाट्य हैं। श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के सदा जय।

● श्रीकृष्ण जी के समय महर्षि पराशर जी के सुपुत्र श्री कृष्ण द्वैपायन(श्रीभगवान वेदव्यास) जी ने वेद को चार प्रभागों में संपादित किया। इन चारों प्रभागों की शिक्षा चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु जी को दी। उस क्रम में ऋग्वेद- पैल को, यजुर्वेद- वैशम्पायन को, सामवेद- जैमिनि को तथा अथर्ववेद- सुमन्तु जी को सौंपा गया। परम् श्रद्धेय श्रीकृष्ण द्वैपायन को ही श्रीवेद व्यास जी कहा जाता है।

● भारतीय संस्कृति के पवित्र पावन पौराणिक ग्रंथ- गीता में श्रीभगवान श्रीकृष्ण जी के माध्यम से परम् श्रद्धेय परमेश्वर जी कहते हैं कि ‘मैंने इस अविनाशी ज्ञान को आदित्य से कहा, आदित्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु जी से कहा और मनु जी ने अपने सुपुत्र चक्रवर्ती सम्राट इक्ष्वाकु जी से कहा। इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग ज्ञान को राजर्षियों ने जाना।

● परमेश्वर से प्राप्त यह ज्ञान परम् श्रद्धेय श्री ब्रह्मा जी ने 11 प्रजापतियों, 11 रुद्रों और अपने ही स्वरूप स्वायंभुव मनु जी और सतरूपा जी को दिया। स्वायंभुव मनु जी ने इस ज्ञान को अपने पुत्रों को दिया फिर क्रमश: स्वरोचिष, औत्तमी, तामस मनु, रैवत, चाक्षुष और फिर वैवश्वत मनु को यह ज्ञान परंपरा से मिला। अंत में यह ज्ञान गीता के रूप में श्री भगवान श्रीकृष्ण जी को मिला। अभी वराह कल्प में सातवें मनु वैवस्वत मनु जी का मन्वन्तर चल रहा है।

● ऋग्वेद की ऋचाओं में लगभग 414 ऋषियों के नाम मिलते हैं जिनमें से लगभग 30 नाम महिला ऋषियों के हैं। इस तरह वेद सुनने और वेद संभालने वाले ऋषि और मनु ही हिंदू धर्म के संस्थापक हैं।

पौराणिक तथ्यों एवं प्रमाणित महाग्रंथो के अनुसार हिंदू धर्म समूह का मानना है कि सारे संसार में धर्म केवल एक ही है, शाश्वत सनातन धर्म अर्थात् श्री सत्य सनातन धर्म। ब्रह्मांड की उत्पत्ति से जो धर्म चला आ रहा है, उसी का ही सच्चा एवं वास्तविक नाम श्री सत्य सनातन धर्म है। इसके अलावा तो सब पंथ, मजहब, रिलीजन मात्र ही है। हिंदुओं की पवित्र पावन परम् श्रद्धेय धार्मिक पुस्तकों-ग्रंथों अथवा महाग्रंथों वेद, अरण्यक, उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, पुराण, महाभारत आदि हैं। वेद विशुद्ध अध्यात्मिक और वैज्ञानिक ग्रंथ हैं। वेद पश्चिमी धर्म की परिभाषा तथा पंथ, संप्रदाय के विश्वास तथा दर्शन से परे शाश्वत सत्य ज्ञान सागर हैं। वेदों की रचना मानव को सत्य ज्ञान से परिचित कराने के लिए की गई है। भारतीय संस्कृति के पवित्र पावन सत्य प्रमाणित पौराणिक ग्रंथ वेद पूर्णतः सत्य एवं अकाट्य हैं। वेद- पंथ, संप्रदाय, मजहब, रिलीजन आदि का प्रतिनिधित्व न करके विश्व मानव कल्याण के लिए हैं। आओ हम सब मिलकर वेदों की ओर लौटे और अपनी अति पवित्र पावन भारतीय संस्कृति को श्रद्धा से शीश झुकाकर ग्रहण करें। इस पवित्र पावन संस्कृति में ही- “सर्वे भवंतु सुखिन -सर्वे संतु निरामया।।” की अति निर्मल भावना निहित है। श्रद्धापूर्वक सब मिलकर बोलिए श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय
हर-हर महादेव!

“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”

पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ।
आभार –
रघुकुल रीत सदा चली आई,
प्राण जाए पर वचन न जाई।
।।जय श्रीराम-जय श्रीराम ।।
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी। (शिक्षाविद् )।

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