- परमाराध्य शङ्कराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती 1008

जब कोई व्यक्ति भगवद्साक्षात्कार की ओर चलता है तो अनेक सिद्धियाँ साधक के पास स्वतः आने लगती हैं। यदि साधक अपने भगवद्साक्षात्कार के लक्ष्य से भटक जाए तो वह केवल इन सिद्धियों में ही फंसा रह जाएगा। इसलिए सच्चे साधक को सिद्धियों में ही न भटककर एकमात्र लक्ष्य भगवद्साक्षात्कार में लगे रहना चाहिए।
उक्त उद्गार परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती महाराज ने चातुर्मास्य प्रवचन के अन्तर्गत चल रहे ब्रह्मलीन द्विपीठाधीश्वर के 14 दिवसीय जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर कही।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार लोक में सामान्य रूप से यह देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति अपनी मांगों को लेकर अनशन पर बैठता है तो अधिकारी उसकी एक दो मांगों को मानकर उसका अनशन समाप्त करवाना चाहते हैं। यदि व्यक्ति दृढता से डटा रहे और एक दो मांगों को मानकर न उठे तो उसकी पूरी मांग माननी ही पडती है। ठीक ऐसे ही भगवान् अपनी सिद्धियों को भेजकर साधक की परीक्षा लेते हैं कि वह अपने लक्ष्य में कितना दृढ है। यदि वह सिद्धि पाकर ही प्रसन्न हो जाता है तो अपना साक्षात्कार देने से वे पीछे हट जाते हैं।
शङ्कराचार्य जी ने आठ प्रकार की सिद्धियों अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व आदि की विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि ब्रह्मलीन द्विपीठाधीश्वर जी के पास भी सिद्धियाँ थी पर वे कभी इसका प्रदर्शन नहीं करते थे। वे जानते थे कि इससे भगवद्साक्षात्कार में बाधा होगी।
उन्होंने काशी की महिमा बताते हुए कहा कि काशी भी अन्य सभी नगरों की भाॅति सामान्य नगर ही है पर उसमें वैशिष्ट्य इस बात का है कि वह सबको प्रकाशित करती है। इसी कारण तो काशी को सर्वप्रकाशिका कहा गया है। सबको प्रकाशित करने वाले उस परम तत्व का जब ज्ञान मनुष्य को हो जाता है तब वह उसी को प्राप्त हो जाता है।
पूज्य शङ्कराचार्य जी के प्रवचन के पूर्व निजी सचिव श्री सुबुद्धानन्द ब्रह्मचारी जी, अग्निपीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर ब्रह्मर्षि श्रीमद् रामकृष्णानन्द जी महाराज, परमधर्मसंसद् के गुजरात प्रदेश के धर्मांसद श्री किशोर दवे जी, विदुषी डा गार्गी पण्डित जी, काशी विद्वत्परिषद् के श्री कमलाकान्त त्रिपाठी जी, भारत धर्म महामण्डल के श्री परमेश्वरदत्त शुक्ल जी, श्री योगेश ब्रह्मचारी जी, श्री दिनेश जी आदि ने अपने विचार व्यक्त किए।
धर्मशास्त्रपुराणेतिहासाचार्य श्री राजेन्द्र प्रसाद द्विवेदी जी ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। ज्योतिष्पीठ पण्डित आचार्य रविशङ्कर द्विवेदी शास्त्री जी ने विरुदावली गान किया। संचालन ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द जी ने तथा संयोजन अरविन्द मिश्र जी ने किया।
श्री शङ्कराचार्य बाल विद्या निकेतन का छात्रों ने मिलकर शिव ताण्डव, राम लीला, राजस्थानी नृत्य, गुजराती डांडिया आदि प्रस्तुत किए।
वरिष्ठ गुरु भक्त शंकराचार्य जी की सेवा में लगे रहे , तुलाराम जी नेमा परमेश्वर दत्त शुक्ल, डा कमलाकान्त त्रिपाठी, डा गार्गी पण्डित, श्री किशोर दवे, सुश्री आनन्दी शुभे, कृष्ण कुमार जी आदि को शङ्कराचार्य सेवा सम्मान से परमाराध्य ने सम्मानित किया।
प्रमुख रूप से मंच पर प्रमुख रूप से शंकराचार्य जी महाराज के निजी सचिव चातुर्मास्य समारोह समिति के अध्यक्ष ब्रह्मचारी सुबुद्धानन्द जी,आचार्य महामंडलेश्वर रामकृष्णानंद जी, ज्योतिष्पीठ पण्डित आचार्य रविशंकर द्विवेदी शास्त्री जी ज्योतिष पीठ शास्त्री पं राजेन्द्र शास्त्री जी, दंडी स्वामी श्री अम्बरीशानन्द जी महाराज,पं,राजकुमार तिवारी,ब्रह्मचारी ब्रम्हविध्या नंद जी,आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। मंच पर प्रमुख रूप से पूज्यपाद शङ्कराचार्य जी महाराज की पूर्णाभिषिक्त शिष्या साध्वी पूर्णाम्बा एवं साध्वी शारदाम्बा,परमहंसी गंगा आश्रम व्यवस्थापक सुंदर पांडे,ब्रह्मचारी अचलानंद जी, ब्रह्मचारी विमलानंद जी,ब्रह्मचारी सहजानंद जी ब्रह्मचारी मुकुंदानंद जी, ब्रह्मचारी परमात्मा नंद जी ब्रह्मचारी राघवानंद जी
कार्यक्रम में इनकी रही उपस्थित पंडित आनंद तिवारी जगद्गुरुकुलम् संस्कृत विद्यापीठ के प्रधानाचार्य , पद्मनाभधर् द्विवेदी, उप प्रधानाध्यापक शारदानंद द्विवेदी सोहन तिवारी माधव शर्मा रघुवीर प्रसाद तिवारी राजकुमार तिवारी,दीपक शुक्ला,अमित तिवारी,पुरसोत्तम तिवाजी,दीपेश दवे आशीष तिवारी योगेश दुबे,सत्यनारायण तिवारी, लक्ष्मी नारायण तिवारी, टिंकू अग्रवाल, राजाराम तिवारी, इंजीनियर गर्ग, योगेश ठाकुर, परम लाल यादव, रोहित यादव, बद्री चौकसे,नारायण गुप्ता ,जगदीश पटैल,कलू पटैल,अरविंद पटैल, अजय विश्कर्मा,रामकुमार तिवारी , सत्येंद्र मेहरा,कपिल नायक सहित श्री मद भागवत पुराण का रस पान करने बड़ी संख्या में गोलू साहू भक्तों की उपस्थिति रही सभी ने कथा का रसपान कर अपने मानव जीवन को धन्य बनाया भागवत भगवान की कथा आरती के उपरांत महाभोग प्रसाद का वितरण किया
