धर्म-संसारः धर्मो रक्षित रक्षति:

[सृष्टि के सृजनकर्ता – श्री भगवान विश्वकर्मा जी जयंती विशेषांक: 17.09.2023 ]

पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी के अनुसार –
संपूर्ण संसार की सर्वश्रेष्ठतम संस्कृति श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति अर्थात् हिंदू धर्म संस्कृति के अंतर्गत परम् श्रद्धेय श्री भगवान विश्वकर्मा जी को निर्माण एवं सृजन का परम् पूज्य देवता माना गया है। वे परम् पूज्य श्री वास्तुदेव जी के सुपुत्र एवं परम् श्रद्धेय श्रीमाता अंगिरसी जी के प्रिय पुत्र थे। पौराणिक मान्यता है कि लंकेश नरेश विश्वविजेता प्रकांड महापंडित महाविद्वान महाराजा रावण जी की सोने की लंका का निर्माण भी श्री भगवान विश्वकर्मा जी ने ही किया था, जो वर्तमान में श्री लंका राष्ट्र के रूप से जानी जाती है।  पौराणिक काल में विशाल भवनों का निर्माण श्रीभगवान विश्वकर्मा जी ही किया करते थे। उन्होंने ही भव्य नगरीयों जैसे- इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, पांडवपुरी, कुबेरपुरी, शिवमंडलपुरी तथा सुदामापुरी आदि का निर्माण किया था।  सोने की लंका के अलावा कई ऐसे भवनों का निर्माण उन्होंने किया था, जो उस समय स्थापत्य और सुंदरता में अद्भुत, अद्वितीय होने के साथ-साथ वास्तु के हिसाब भी सर्वश्रेष्ठम् एवं अत्यंत महत्वपूर्ण थे। 
ये मंदिर देवी-देवताओं, राजा-महाराजाओं द्वारा बनवाए जाते थे। ऐसा माना जाता है कि श्रीभगवान विश्वकर्मा जी को इतना गहरा अनुभव था कि वे अपनी कार्यशक्ति से पानी में चलने वाला खड़ाऊ भी बना सकते थे। 

संपूर्ण सृष्टि के सर्वश्रेष्ठतम् शिल्पकार परम् श्रद्धेय श्री भगवान विश्वकर्मा जी की आराधना जनकल्याणकारी है अतएव प्रत्येक व्यक्ति को तकनीकी और विज्ञान के महान् जनक श्रीभगवान विश्वकर्मा जी की पूजा-अर्चना हमेशा बहुत ही श्रद्धापूर्वक करनी चाहिए। 

सोने की लंका के निर्माण संबंधी एक पौराणिक कहावत है कि त्रिलोक विजेता बनने के बाद महाविद्वान प्रकांड महापंडित महाराजा रावण जी के मन में अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल ऐसे नगर के निर्माण का विचार आया जिसके सम्मुख परम् श्रद्धेय देवताओं की अलकापुरी नगरी भी तुच्छ नजर आए। उसने संपूर्ण सृष्टि के पालनहार श्रीभगवान शिवजी की आराधना कर उनसे सोने की लंका बनाने में परम् श्रद्धेय देवशिल्पी श्री भगवान विश्वकर्मा जी का सहयोग माँगा। 

सृष्टि के पालनहार परम् श्रद्धेय शिवजी के कहने पर दुनिया के सबसे श्रेष्ठतम् शिल्पकार श्रीभगवान विश्वकर्मा जी ने सोने की लंका का ऐसा आलौकिक प्रारूप बनाया जिसे देखते ही लंकापति नरेश महाराजा रावण जी की  बांछें खिल गईं। उसी के आधार पर बनी सोने की लंका की सुंदरता देखते ही बनती थी। प्रकांड महाविद्वान महापंडित महाराजा रावण लंका में आने वाले हर महत्वपूर्ण अतिथि को वहाँ के दर्शनीय स्थलों को बड़े गर्व के साथ दिखाता था। 

ऐसे ही एक बार वह बड़े ऋषि-मुनियों को लंका का भ्रमण करा रहा था। वे भी लंका का  सौंदर्य देखकर अचंभित थे। इस बीच रास्ते में मिलने वाले लंकावासी महान् प्रकांड महाविद्वान महापंडित महाराजा रावण को देखकर भय से नतमस्तक हो जाते, लेकिन अतिथियों का कोई अभिवादन नहीं करता। ऐसा ही व्यवहार लंका नरेश महाराजा रावण के मंत्रियों, सैनिकों और कर्मचारियों ने भी किया। 

भ्रमण समाप्ति पर प्रकांड महापंडित महाविद्वान लंका नरेश रावण ने ऋषियों से पूछा- ‘आपको हमारी लंका कैसी लगी?’ 

एक महर्षि बोले- ‘लंका तो अद्भुत और अद्वितीय लंकेश जी लेकिन यह शीघ्र ही नष्ट हो जाएगी, क्योंकि आपने लंका के सौंदर्य और सुरक्षा के लिए तो बहुत कुछ किया है, लेकिन इसके स्थायित्व के लिए कुछ भी नहीं। जहाँ के निवासियों के मुख पर प्रसन्नता की जगह भय के भाव हों और जिनमें  सदाचार का अभाव हो, वह नगर समय के साथ नष्ट हो जाते है, और यही बात सच्चे धर्म संस्कृति पर भी लागू होती है। जो धर्म, प्राणियों पर जबर्दस्ती अथवा भयंकर भय से थौपा जाता है वह धर्म भी यथाशीघ्र ही नष्ट हो जाता है क्योंकि यह धर्म नहीं, अपितु अधर्म और दानवता की निशानी है। अतः निर्मल मन सच्चाई की असली कसौटी है। भारतीय परंपरा में निर्माण कार्य से जुड़े लोगों को ‘श्री भगवान विश्वकर्मा जी की संतान’ कहा गया है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार उन्हीं के प्रारूप पर स्वर्ग, देवताओं के अस्त्र-शस्त्र, पुष्पक विमान, द्वारिका, इन्द्रप्रस्थ आदि का भव्य निर्माण हुआ।

भारतीय संस्कृति के महान् ग्रंथ स्कंद पुराण- प्रभात खंड के निम्न श्लोक की भाँति किंचित पाठ भेद से सभी पुराणों में यह श्लोक मिलता है-

बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी।

प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च।

विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापतिः॥

विवाहदिषु यज्ञषु गृहारामविधायके।

सर्वकर्मसु संपूज्यो विशवकर्मा इति श्रुतम॥

स्पष्ट है कि श्री भगवान विश्वकर्मा जी की आराधना जन कल्याणकारी है। अतएव प्रत्येक प्राणी सृष्टिकर्ता, शिल्प कलाधिपति, तकनीकी और विज्ञान के जनक श्रीभगवान विश्वकर्मा जी की पूजा-अर्चना अपनी व अपने प्रिय राष्ट्र की अति उत्तम उन्नति के लिए अवश्य ही करनी चाहिए।

जगदचक विश्वकर्मन्नीश्वराय नम:॥

श्री भगवान विश्वकर्मा जी का वर्णन मदरहने वृध्द वशिष्ठ पुराण मे भी दृष्टित है।

माघे शुकले त्रयोदश्यां दिवापुष्पे पुनर्वसौ।

अष्टा र्विशति में जातो विशवकमॉ भवनि च॥

उत्तम फल प्राप्ति हेतु शुभ मुहूर्त-

श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अनुसार परम् श्रद्धेय श्री भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा-अर्चना का अत्यंत शुभ मुहूर्त वैसे तो श्री भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा दिन भर की जाएगी, लेकिन इनकी पूजा के लिए शुभ मुहूर्त 17 सितंबर का शुभ समय सुबह 10 बजकर 15 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 26 मिनट तक रहेगा। इस शुभ मुहूर्त में पूजा-अर्चना करने से शुभ फल की प्राप्ति होगी।

अतः हम स्पष्ट रूप से कह सकते है कि – परम् श्रद्धेय श्री भगवान विश्वकर्मा जी अद्भुत, अद्वितीय, अविस्मरणीय और बहुमुखी कलाकारी के सर्वश्रेष्ठतम् शिल्पकार हैं। जनपद मुज़फ्फरनगर के समस्त मंदिरों, कल- कारखानों एवं संबंधित प्रतिष्ठानों को इस शुभ अवसर पर बहुत ही अति उत्तम एवं मनोहारी भव्य रूप से सजाया गया है, परंतु श्री विश्वकर्मा चौक स्थित श्री भगवान विश्वकर्मा जी के भव्य मंदिर की अति उत्तम – उत्कृष्ट, अद्भुत, अद्वितीय और मनोहारी छठा समस्त प्राणी जगत को अपनी ओर आकर्षित करती है, जो अपने आप में भारतीय संस्कृति की एक अभीष्ट पहचान है। श्री विश्वकर्मा जयंती के इस पवित्र पावन शुभ अवसर पर संपूर्ण प्राणी जगत बड़ी श्रद्धा से श्री भगवान विश्वकर्मा जी को शीश झुकाकर बारंबार कोटि-कोटि नमन करता है।

जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति।

“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो।”

पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
आभार –
पंडित राकेश कुमार कौशिक जी। (शिक्षाविद् )
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *