श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति महापर्व- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव – विशेषांक:

मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो।।
संपूर्ण संसार की सर्वश्रेष्ठतम संस्कृति श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अंतर्गत अत्यंत महान् भारतवर्ष ने जहाँ एक ओर विदेशी क्रूर आक्रांताओं का दंश झेला, अत्याचार सहे वहीं दूसरी ओर इस अत्यंत परम् पुण्यभूमि पर अनेकों विशिष्ट विभूतियों ब्रह्मऋषियों, ऋषि-मुनियों, महापुरूषों का पदार्पण हुआ। इस परम् श्रद्धेय देवभूमि को तो साक्षात् श्रीभगवानों की परम पूज्य श्री माताजी कहलाने का भी अविस्मरणीय वैभवशाली गौरव प्राप्त है और हम आर्यावर्त भरतवंशियों को श्री भगवानों का वंशज कहलाने का भी परम सौभाग्य मिला है।
परम् श्रद्धेय भारतीय संस्कृति में अनेक अवतार हुए परंतु परम् श्रद्धेय श्रीकृष्ण उनमें सबसे अति लोकप्रिय हैं। परम् पूज्य भक्तवत्सल भगवान श्रीहरि विष्णु जी के आठवें अवतार श्रीकृष्ण जी चौसठ कलाओं के परम् ज्ञाता थे इसी कारण उन्हें पूर्ण पुरुष भी कहा जाता है।
श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के पृष्ठों पर स्वर्णिम अभीष्ट छाप अंकित करने वाले श्रीकृष्ण अद्वितीय प्रेम की अनमोल मूरत हैं। उनके नटखट बालस्वरूप की तो सारी दुनिया ही दीवानी है। उनके जन्म के हजारों वर्षों पश्चात भी प्रभु की सुमधुर बाल लीलाएं इतनी प्रसिद्ध हैं कि परम् श्रद्धेय भारत की हर माता वात्सल्य में अपने प्यारे लाल को कान्हा ही पुकारती है। संपूर्ण संसार मेंं श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति को धारण करने वाले आज भी “मैय्या मोरी मैं नहीं माखन खायो” जनमानस का अत्यंत प्रिय भजन है। आज भी राधाजी और श्रीकृष्ण जी की अनमोल प्रेम कहानी प्रेमियों के लिए आदर्श है। पूरी दुनिया में सच्ची मित्रता की जब भी चर्चा होती है तो सर्वप्रथम जनमानस की जुबां पर परम् श्रद्धेय श्री द्वारिकाधीश और सुदामा जी का ही अभीष्ट उदाहरण दिया जाता है। उनकी मित्रता की करुण कथा से सबकी आँखें नम हो जाती हैं। स्त्री अस्मिता पर जब आँच आती है तो सुदर्शन चक्रधारी का न्याय याद आता है। श्रीकृष्ण के नारीवाद के समक्ष संसार के समस्त तथाकथित नारीवाद फीके पड़ जाते हैं। श्री प्रभु जी ने हर रिश्ते को जी भर जिया है और समाज के समक्ष श्रेष्ठ आदर्श प्रस्तुत किया है।
जब श्रीकृष्ण धरती पर मनुज रूप में अवतरित हुए तब साधारण मनुष्य की भाँति ही उनका भी जीवन कष्टों, संघर्षों और पग-पग पर चुनौतियों से भरा हुआ था। उनके जन्म से पूर्व ही उन्हें मारने का षड्यंत्र रच दिया जाता है। राजकुमार होते हुए भी कारागृह में जन्म और तत्क्षण अपने माता-पिताश्री से वियोग सहना पड़ता है। प्रतिक्षण मृत्यु का सामना करने वाले बाल गोपाल सदैव आनंदित ही रहते थे। वह जो भी कार्य करते उसमें जनकल्याण का भाव छिपा रहता। यही कारण है कि “माखनचोरी से लेकर महाभारत युद्ध” को भी श्री प्रभु जी की लीला ही कहा जाता है।
संपूर्ण जनमानस के पुरुषार्थ हेतु माखनचोरी का उद्देश्य भी जानिए- भक्तगण तो माखनचोरी को मात्र अपने कन्हैया जी की लीला ही समझकर वात्सल्य रस में डूब जाते हैं परन्तु गुणिजनों ने इस संदर्भ की विविध प्रकार से व्याख्या की है। तत्कालीन परिस्थिति यह थी कि मथुरा में अत्याचारी कंस का शासन था। नंदगांव, बरसाना, गोकुल, वृंदावन और आस-पास के इलाकों में अहिर अथवा यादव दुग्ध का व्यापार करते थे, पशुपालन, गौ पालन करते थे। अपने क्रूर राजा के आदेशानुसार वे लोग घी, दही, छाछ, मक्खन, मलाई बनाते थे परन्तु उसका एक छटांक भी वे अपने परिवार के लिए नहीं रख पाते। भयवश मक्खन आदि के पात्र को मटके में भरकर बच्चों की पहुँच से दूर, रस्सी में बाँधकर लटका दिया जाता। समय आने पर सभी वस्तुओं को मथुरा भेज दिया जाता जहाँ बड़े-बड़े घरों में लोग दूध पान करते, कंस की दोनों रानियाँ अपने सौन्दर्य के लिए मक्खन का लेप करती, दुग्ध स्नान करती। अपने अधिकार को जताने हेतु ही श्रीकृष्ण ने बाल-सखाओं के साथ मिलकर माखनचोरी की लीला की थी। इस लीला में चार मंडल बने। सबसे पहले हृष्ट-पुष्ट बालकों का समूह खड़ा होता, जो आज के संदर्भ में मजदूर वर्ग हैं अर्थात शारीरिक श्रम करने वाले लोग जिनमें अथाह बल होता है। उसके ऊपर सबकी सुरक्षा करने वाला क्षत्रिय वर्ग उसके ऊपर वैश्य वर्ग जिनके व्यापार के कारण ही हमें तमाम आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त होती हैं और अंत में ब्राह्मण वर्ग। इन सबके ऊपर सबकी रक्षा और सम्मान करने वाले लीलाधारी भगवान श्रीकृष्ण छीके तक चढ़ते और मटकी फोड़कर जो भी नवनीत प्राप्त होता वह सबमें बाँट देते। इसीलिए तो उन्हें परम् पूज्यनीय योगेश्वर भी कहा जाता है। इस लीला से यह सन्देश मिलता है कि यदि किसी व्यक्ति को समाज का मक्खन अर्थात् शिक्षा, सम्मान, यश, वैभव, धन-दौलत, प्राप्त हुआ है तो उसका कर्त्तव्य बनता है कि समाज के हर वर्ण के साथ वह उसे बांटे। क्योंकि उसने जो भी पाया है समाज के हर वर्ग से पाया है।
सरलतम शब्दों में इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि यदि अन्नदाता किसान खेती करना छोड़ दे तो अपार धन-संपदा का स्वामी होने के पश्चात भी क्या अन्न का एक दाना भी नसीब हो सकता है? यदि सफाई कर्मचारी हमारे द्वारा फैलाई गंदगी को साफ करने से मना कर दे तो क्या उस परिवेश में जीवित रहा जा सकता है? यदि सेना राष्ट्र रक्षा करना छोड़ दे तो क्या कोई चैन की नींद सो पाएगा? यदि शिक्षक ज्ञान धारा को रोक दे तो क्या कोई ज्ञानी बन सकता है?
परम् पूज्यनीय स्वामी विवेकानंद जी कहते थे-
“ जब तक लाखों लोग भूखे और अज्ञानी है; तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हूँ जो उनके बल पर शिक्षित हुआ और अब वह उनकी ओर ध्यान नहीं देता।” स्पष्ट है कि हम सब अपने समाज के ऋणी होते हैं। अपने परम् श्रद्धेय देश अर्थात् भारतमाता का ऋण सबसे बड़ा ऋण होता है क्योंकि इसी की मिट्टी, वनस्पति, वायु, जल, आदि को ग्रहण कर हम सबल और सुदृढ शरीर पाते है, इसलिए सभी धर्मी- संप्रदाय प्राणी जगत अपनी परम् पूज्यनीय भारत माता जी के सम्मुख बड़ी श्रद्धा से शीश झुकाए, यदि इसका एकांश भी चुका पाए तो बाकी सब ऋण स्वतः ही उतर जाता है। अतः हमें अपने भीतर सेवा, करुणा और संवेदनशीलता और दायित्वबोध को बढ़ाना होगा।
“जीवने यावदादानं स्यात्प्रदानं ततोऽधिकम् ”
जैसे महामंत्र को मन में धारण कर परमार्थ में जुटना होगा। यही हमारा परम् कर्म भी है और धर्म भी।
जानिए रासलीला का संदेश:
सदैव स्थितप्रज्ञ रहने वाले परम् श्रद्धेय महायोगेश्वर श्रीकृष्ण परमानंद की मूर्ति थे। वह कहते थे कि जीवन को उत्सव के समान जीना चाहिए। रासलीला का परिदृश्य ऐसा है कि चारों ओर संकटों के बादल मंडराए हुए थे। दुराचारी कंस, जरासंध और उसके आसुरी मित्रों का आतंक अपने चरम पर था। नित नवीन षड्यंत्र रचकर श्रीकृष्ण जी की हत्या का प्रयास किया जाता। ऐसी विकट परिस्थिति में भी प्रिय मुरलीधर ने अपनी बंसी पर तान छेड़ कर गोपियों के साथ आनंदित हो नृत्य किया।
कान्हा जी हमें छोटे-छोटे क्षणों का आनन्द उठाना सिखलाते हैं। भविष्य की चिंता न करके वर्तमान में जीना सिखलाते हैं। हर प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं पर नियंत्रण, विधाता पर विश्वास, सकारात्मकता, शांति और आनंद बनाए रखना ही रास कहलाता है। हम सब गोपियाँ ही तो हैं जो कुंठित हैं और यदि ईश्वर में चित्त लगा लें तो सदा के लिए आनंद की अमृतधारा में डूब जायेंगे और यह समझ जायेंगे की संकट अस्थायी है और बिना विचलित हुए भी उसका सामना किया जा सकता है।
श्रीभगवान गीता में स्वयं ही अपने जन्म का कारण बताते हुए कहते हैं-
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥4-7॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥4-8॥”
महाभारत काल में जब युद्ध से पहले ही भटके हुए महायोद्धा अर्जुन ने हथियार डाल दिए थे तब परम् श्रद्धेय भगवान श्री कृष्ण जी ने उसे मार्ग पर लाने के लिए जो पवित्र ज्ञान की गंगा बहाई उसे हम गीता कहते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है वरन् प्राणिमात्र के कल्याण का दुर्लभ ग्रंथ है। संसार भर के विभिन्न क्षेत्र के दिग्गजों, विद्वानों- महाविद्वानों और महापुरुषों ने इस पवित्र ग्रंथ को अपना जीवन आदर्श और प्रेरणास्रोत माना है।
जीवन रूपी महासमर में हम सब भी उसी भटके हुए अर्जुन के समान हैं परन्तु हम वीर, पराक्रमी योद्धा अर्जुन की तरह शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से उन्नत नहीं हैं अतः प्रत्यक्ष रूप से तो ईश्वर हमारे लिए प्रकट नहीं हुए तथापि गीता के रूप में अवश्य हमारे सारथी बनकर आए हैं।
श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अंतर्गत अत्यंत महान् परम् पूज्य ग्रंथ श्री गीता समस्त वेद, पुराणों के दर्शन का सार है। इसे पूरी दुनिया का सर्वप्रथम एवं सर्वश्रेष्ठ मनोवैज्ञानिक ग्रंथ कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। अतः इसमें जीवन के हर रहस्य, हर प्रश्न का उत्तर व्याप्त है। जिस प्रकार कलियुग के प्रत्येक पात्र को महाभारत में ढूँढा जा सकता है ठीक उसी प्रकार इस युग की हर समस्या का निदान पवित्र ग्रंथ गीता जी में व्याप्त है।
गोपियों की भाँति एक दिन के लिए नृत्य करके, सज-संवर के सोशल मीडिया पर सेल्फी डालकर, लड्डू गोपाल जी को झूला झुलाकर, स्वयं के स्वाद हेतु केक, चॉकलेट, बिस्कुट, कोल्ड ड्रिंक आदि अशोभनीय पदार्थों का तथाकथित भोग लगाने जैसा अशास्त्रीय आचरण करके भगवद् प्राप्ति हो या न हो किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता पढ़कर निश्चित रूप से परमब्रह्म की अनुभूति की जा सकती है।
जीवन जीने की असली कला पवित्र पावन ग्रंथ गीता पढ़कर ही आएगी, सफल और सार्थक जीवन का मंत्र हमें उसी से प्राप्त होगा। अतः संपूर्ण संसार की सर्वश्रेष्ठ श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति- जन्माष्टमी महापर्व के शुभ अवसर पर परम् श्रद्धेय श्री गीता जी को लाल कपड़े में लपेटकर, धूप-बत्ती जलाकर मन्दिर में ना सजाएँ अपितु संकल्प लें कि दैनिक जीवन में नित्य इसका पाठ करेंगे और एक सार्थक जीवन की ओर अग्रसर होंगे।
जय हिंद -जय भारत -जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी)
आभार – पंडित राकेश कुमार कौशिक जी।
(शिक्षाविद्)।
लक्ष्मीनगर, मुज़फ्फरनगर ( उत्तर प्रदेश )।
