[विशेषांक- भारतीय संस्कृति का अत्यंत अनमोल महापर्व रक्षा बंधन महापर्व।]

संपूर्ण संसार की सबसे प्राचीन एवं सर्वश्रेष्ठतम संस्कृति-
श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति
(हिंदू धर्म संस्कृति) है। इसी अत्यंत महान् विशिष्ट संस्कृति के अंतर्गत रक्षा-बंधन का महापर्व श्रवण मास की पूर्णिमा को बहुत ही धूम-धाम व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह महापर्व भाई – बहन के रिश्तों की अटूट डोर का प्रतीक है।
रक्षा-बंधन महापर्व से संबंधित पौराणिक कथा:
परम् पूज्यनीय श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति ( हिंदू धर्म संस्कृति) के अंतर्गत रक्षा-बंधन महापर्व भारतीय परंपराओं का यह एक ऐसा अद्भुत और अनमोल महापर्व है, जो केवल भाई-बहन के अटूट स्नेह के साथ साथ हर सामाजिक ताने-बाने के संबंध को मजबूत करता है। इसलिए यह महापर्व भाई-बहन को परस्पर अनमोल रिश्तों में जोड़ने के साथ-साथ श्रद्धा व सांस्कृतिक, सामाजिक महत्व की डोर को भी अत्यंत मजबूत रखता है।
यह अनमोल महापर्व रक्षा करने और करवाने के लिए बांधा जाने वाला पवित्र धागा रक्षा-बंधन कहलाता है। रक्षा बंधन के महत्व को समझने के लिए सबसे पहले इसके अर्थ को गहराई से समझना होगा। “रक्षाबंधन” अर्थात् रक्षा+बंधन दो शब्दों से मिलकर बना है। यानी कि यह एक ऐसा बंधन है जो रक्षा का वचन लें। इस दिन भाई अपनी बहन को उसकी दायित्वों का वचन अपने ऊपर लेते हैं।
श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अति पवित्र पावन महापर्व रक्षा-बंधन की अति पौराणिक कथा-
अत्यंत महाबलशाली महा- राजा बली बहुत दानी राजा थे और श्रीभगवान विष्णु जी के अनन्य भक्त भी थे। एक बार उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया। इसी दौरान उनकी परीक्षा लेने के लिए भगवान श्रीविष्णु हरि जी वामनावतार लेकर आए और दान में राजा बलि से तीन पग भूमि देने के लिए कहा। लेकिन उन्होंने दो पग में ही संपूर्ण पृथ्वी और आकाश नाप लिया। इस पर राजा बलि समझ गए कि श्री भगवान जी उनकी परीक्षा ले रहे हैं। तीसरे पग के लिए उन्होंने श्रीभगवान जी का पग अपने सिर पर रखवा लिया। फिर उन्होंने श्रीभगवान जी से बड़ी श्रद्धापूर्वक याचना की कि अब तो मेरा सबकुछ चला ही गया है, प्रभु! आप मेरी विनती स्वीकारें और मेरे साथ पाताल में चलकर रहें। परम् श्रद्धेय श्री भगवान जी ने भक्त की बात मान ली और बैकुंठ छोड़कर पाताल चले गए। उधर जगत जननी परम् श्रद्धेय देवी लक्ष्मी परेशान हो गईं। फिर उन्होंने लीला रची और गरीब महिला बनकर राजा बलि के सामने पहुंचीं और राजा बलि को राखी बांधी। महाराजा बलि ने कहा कि मेरे पास तो आपको देने के लिए कुछ भी नहीं हैं, इस पर परम् श्रद्धेय जगतजननी देवी लक्ष्मी जी अपने साक्षात् स्वरूप में आ गईं और बोलीं, कि आपके पास तो साक्षात् भगवान हैं, मुझे वही चाहिए मैं उन्हें ही लेने आई हूँ। इस पर बलि ने श्री भगवान विष्णु हरि जी को माता लक्ष्मी जी के साथ जाने दिया। जाते समय श्री भगवान विष्णु जी ने राजा बलि को वरदान दिया कि वह हर साल चार महीने पाताल में ही निवास करेंगे। यह चार महीना चर्तुमास के रूप में जाना जाता है जो देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठानी एकादशी तक होता है।
श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति अर्थात् हिंदू धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बाँधते समय कर्मकांडी पंडित जी या आचार्य जी संस्कृत में एक श्लोक का उच्चारण करते हैं, जिसमें रक्षा-बंधन का संबंध महाराजा बलि जी से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। भारतीय संस्कृति के महाग्रंथ भविष्यपुराण के अनुसार इंद्राणी जी द्वारा निर्मित रक्षासूत्र को परमपूज्य श्री देवगुरु बृहस्पति जी ने इंद्र के हाथों बाँधते हुए निम्न -लिखित स्वस्तिवाचन किया- यह पवित्र पावन श्लोक भारतीय संस्कृति के महान् महापर्व रक्षा-बंधन का अभीष्ट मूल मन्त्र है-
येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥
इस श्लोक का हिंदी भावार्थ है- “जिस रक्षासूत्र से महान् शक्तिशाली दानवेन्द्र महाराजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी)! तुम अडिग रहना अर्थात् तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।”
श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय।
ख्यातिप्राप्त ज्योतिषाचार्य जी के अनुसार, 30 अगस्त 2023, को पूर्णिमा तिथि के साथ सुबह 10 बजकर 59 मिनट पर भद्रा काल आरंभ हो जाएगा और भद्रा काल का समापन रात्रि 9 बजकर 2 मिनट पर होगा। वैदिक ज्योतिष में भद्रा को अशुभ काल माना जाता है और इस काल में कोई भी शुभ कार्य करने की मनाही होती है। इसलिए, 30 अगस्त, 2023 को रात्रि 9 बजकर 2 मिनट के बाद से राखी बांधी जा सकती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, राखी बाँधने के लिए दोपहर का समय शुभ माना जाता है। लेकिन यदि दोपहर के समय भद्रा काल हो तो फिर प्रदोष काल में राखी बाँधना शुभ होता है। ऐसे में 30 अगस्त, 2023 के दिन भद्रा काल के कारण राखी बाँधने का मुहूर्त सुबह के समय नहीं होगा। उस दिन रात्रि में ही राखी बाँधने का शुभ मुहूर्त है। 31 अगस्त, 2023 को श्रावण पूर्णिमा सुबह 07 बजकर 05 मिनट तक है, इस समय में भद्रा का साया भी नहीं है। इसलिए 31 अगस्त, 2023 को सुबह 7 बजकर 5 मिनट तक के शुभ मुहूर्त में आप राखी बंधवा सकते हैं। ऐसे में भारतीय संस्कृति का यह पावन महापर्व रक्षाबंधन महापर्व 30 और 31अगस्त दोनों दिन मनाया जा सकता है।
इस महापर्व में राखी बाँधने के लिए कुल 10 घंटे का शुभ मुहूर्त मिलेगा, जिसमें राखी बाँधना सबसे शुभ माना जा रहा है। अर्थात् 30 अगस्त, 2023 को रात्रि 9 बजकर 2 मिनट के बाद राखी बाँध सकते हैं और फिर 31 अगस्त, 2023 को सुबह 7 बजकर 5 मिनट से पहले राखी बाँध सकते हैं। श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय ।
सर्वे भवंतु सुखिनः।
सर्वे संतु निरामया ।।
जय हिंद -जय भारत -जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी ।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )
आभार – पंडित राकेश कुमार कौशिक जी । (शिक्षाविद् )।
