“ॐ” ही है संपूर्ण संसार का सार-

“ॐ” सनातन धर्म का प्रतीक चिह्न ही नहीं बल्कि सनातन परम्परा का सबसे पवित्र शब्द है।
संपूर्ण संसार की सर्वश्रेष्ठतम एवं अति पवित्र प्राचीन संस्कृति मानव सभ्यता की कला ही नहीं अपितु मानव कल्याण का सर्वश्रेष्ठ सार भी है, अति पवित्र पावन भारतीय संस्कृति के अंतर्गत जानिए ॐ की महत्ता की एक सूक्ष्म सी झलक –
तस्य वाचकः प्रणवः सृष्टि के पालनहार श्री ईश्वर का वाचक प्रणव “ॐ” है।
अक्षर का अर्थ जिसका कभी क्षरण न हो। ऐसे तीन अक्षरों— अ उ और म से मिलकर बना है अति पवित्र पावन- “ॐ”। संपूर्ण संसार मेंं चहुँओर गुंजायमान है, कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से सदा “ॐ” की ध्वनि निसृत होती रहती है। हमारी और आपके प्रत्येक श्वास से “ॐ” की ही ध्वनि निकलती है। यही हमारे-आपके श्वास की गति को नियंत्रित भी करता है। संपूर्ण संसार मेंं माना गया है कि अत्यंत पवित्र और परम् शक्तिशाली है- “ॐ”। श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अनुसार किसी भी मंत्र से पहले यदि “ॐ” जोड़ दिया जाए तो वह पूर्णतया शुद्ध और परम् शक्ति-सम्पन्न हो जाता है। किसी भी परम् श्रद्धेय देवी-देवता, ग्रह या परम् पूज्य श्री ईश्वर के मंत्रों के पहले ॐ लगाना अत्यंत आवश्यक होता है, जैसे- मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी का मंत्र- “ॐ रामाय नमः!”, श्री विष्णु हरि जी का मंत्र – “ॐ विष्णवे नमः!”, संपूर्ण सृष्टि के पालन- हार श्री शिवजी का मंत्र – “ॐ नमः शिवाय!”, अतिप्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि ॐ से रहित कोई मंत्र फलदायी नहीं होता, चाहे उसका कितना भी जाप हो। मंत्र के रूप में मात्र “ॐ” भी पर्याप्त है। माना जाता है कि एक बार “ॐ” का जाप हज़ार बार किसी मंत्र के जाप से महत्वपूर्ण है। “ॐ” का दूसरा नाम प्रणव (परमेश्वर) है। “तस्य वाचकः प्रणवः” अर्थात् उस परमेश्वर का वाचक प्रणव है। इस तरह प्रणव अथवा ॐ एवं ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। “ॐ” अक्षर है इसका क्षरण अथवा विनाश कभी भी नहीं होता।
“छान्दोग्योपनिषद्” में ब्रह्मऋषियों – ऋषियों ने बड़ी परम् श्रद्धा से गाया है –
“ॐ” इत्येतत् अक्षरः (अर्थात् “ॐ” अविनाशी, अव्यय एवं क्षरण रहित है।)
“ॐ” धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदायक है। मात्र “ॐ” का जप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली। कोशीतकी ऋषि निस्संतान थे, संतान प्राप्तिके लिए उन्होंने श्री सूर्यदेव जी का ध्यान कर “ॐ” का जाप किया तो उन्हें परम् पुत्र की प्राप्ति हो गई।
गोपथ ब्राह्मण ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि जो “कुश” के आसन पर पूर्व की ओर मुख कर एक हज़ार बार “ॐ” रूपी मंत्र का जाप करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
सिद्धयन्ति अस्य अर्थाः सर्वकर्माणि च!
श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के महान् ग्रंथ- श्रीमद्भागवत् में “ॐ” के महत्व को कई बार रेखांकित किया गया है। इसके आठवें अध्याय में उल्लेख मिलता है कि जो “ॐ” अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परम गति प्राप्त करता है।
“ॐ” अर्थात् ओउम् तीन अक्षरों से बना है, जो सर्व विदित है। अ उ म्। “अ” का अर्थ है आर्विभाव या उत्पन्न होना, “उ” का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास, “म” का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् “ब्रह्मलीन” हो जाना। “ॐ” सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है। “ॐ” में प्रयुक्त “अ” तो सृष्टि के जन्म की ओर इंगित करता है, वहीं “उ” उड़ने का अर्थ देता है, जिसका मतलब है “ऊर्जा” सम्पन्न होना। किसी ऊर्जावान मंदिर या तीर्थस्थल जाने पर वहाँ की अगाध ऊर्जा ग्रहण करने के बाद व्यक्ति स्वप्न में स्वयं को आकाश में उड़ता हुआ देखता है। मौन का महत्व ज्ञानियों ने बताया ही है। अंग्रजी में एक उक्ति है — “साइलेंस इज़ सिल्वर ऍण्ड ऍब्सल्यूट साइलेंस इज़ गोल्ड”। श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अंतर्गत महान् ग्रंथ श्री गीता जी में परमेश्वर श्रीकृष्ण जी ने मौन के महत्व को प्रतिपादित करते हुए स्वयं को मौनका ही पर्याय बताया है-
मौनं चैवास्मि गुह्यानां
“ध्यान बिन्दुपनिषद्” के अनुसार ॐ मन्त्र की विशेषता यह है कि पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में जो इसका जप करता है, उसे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। जिस तरह कमल-पत्र पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी तरह जप-कर्ता पर कोई कलुष नहीं लगता।
“तैत्तिरीयोपनिषद शिक्षावल्ली अष्टमोऽनुवाकः” में “ॐ” की महत्ता के विषय में कहा गया है-
ओमिति ब्रह्म ! ओमितीदँसर्वम् ! ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति! ओमिति सामानि गायन्ति! ओँशोमिति शस्त्राणि शँसन्ति ! ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति ! ओमिति ब्रह्मा प्रसौति ! ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति!ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥
अर्थात- कहने का तात्पर्य यह है कि ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। “ॐ” ही इसकी (जगत की) अनुकृति है।
हे आचार्य! ॐ के विषय में और भी समझाइए। आचार्य समझाते हैं। “ॐ” से प्रारम्भ करके साम गायक सामगान करते हैं। ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मंत्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मंत्रों का उच्चारण करता है। “ॐ” कहकर ही अग्निहोत्र प्रारम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ही ब्रह्म को प्राप्त करने की बात करता है। ॐ के द्वारा ही वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्तितपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति! यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्तितत्ते पदँ संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ –(कठोपनिषद, अध्याय १, वल्ली २),
अर्थात- संपूर्ण संसार मेंं श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अति सर्वश्रेष्ठ एवं अकाट्य समस्त वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, समस्त तपों को जिसकी प्राप्ति के साधक कहते हैं, जिसकी इक्षा से (मुमुक्षुजन) ब्रह्मचर्य का पालन करते है, उस पद को मैं तुमसे संक्षेप में कहता हूँ- “ॐ” यही वह पद है।
ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षंसामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते! तमोंकारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान्यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति॥ ७॥
— ( प्रश्नोपनिषद प्रश्न ५, श्लोक ७)।
अर्थात- संपूर्ण संसार के साधक अति पवित्र पावन महाग्रंथ ऋग्वेद द्वारा इस लोक को, यजुर्वेद द्वारा आन्तरिक्ष को और सामवेद द्वारा उस लोक को प्राप्त होता है जिसे विद्वजन जानते हैं। तथा उस ओंंकाररूप आलम्बन के द्वारा ही विद्वान् उस लोक को प्राप्त होता है जो शान्त, अजर, अमर, अभय एवं सबसे पर (श्रेष्ठ) है।
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत॥
— ( मुण्डकोपनिषद्, मुनण्डक २, खण्ड २, श्लोक-४)।
अर्थातः- प्रणव धनुष है, (सोपाधिक) आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। उसका अत्यंत ही सावधानी पूर्वक बेधन करना चाहिए और बाण के समान तन्मय हो जाना चाहिए।। ४।।
ओमित्येतदक्षरमिदंसर्व तस्योपव्याख्यानं भूत,भवभ्दविष्यदिति सर्वमोंंकार एव! यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव॥ १॥
— (माण्डूक्योपनिषद, गौ० का० श्लोक १)।
अर्थात- “ॐ” यह अक्षर ही सब कुछ है। यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसी की व्याख्या है; इसलिये यह सब ओंकार ही है। इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है।
सोऽयमात्माध्यक्षरमोंकारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।। ८।।
— (माण्डूक्योपनिषद् आ०प्र० गौ०का० श्लोक ८)
वह यह आत्मा ही अक्षर दृष्टि से ओंंकार है; वह मात्राओं का विषय करके स्थित है। पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है; वे मात्रा अकार, उकार और मकार हैं।
श्री सत्य सनातन धर्म ही नहीं, अपितु भारतवर्ष के अन्य पंथ, संप्रदाय, मजहब एवं धर्म-दर्शनों में भी “ॐ” को विशिष्ट महत्व प्राप्त है। बौद्ध-दर्शन में “मणिपद्मेहुम” का प्रयोग जप एवं उपासना के लिए प्रचुरता से होता है। इस मंत्र के अनुसार “ॐ” को “मणिपुर” चक्र में अवस्थित माना जाता है। यह चक्र दस दल वाले कमल के समान है। जैन दर्शन में भी “ॐ” के महत्व को दर्शाया गया है। महात्मा कबीर दास जी र्निगुण महासंत एवं सर्वश्रेष्ठ कवि थे। उन्होंने भी “ॐ” के महत्व को स्वीकारा और इस पर “साखियाँ” भी लिखीं-
“ओ ओंकार आदि मैं जाना।लिखि औ मेटें ताहि ना
माना ॥
ओ ओंकार लिखे जो कोई।सोई लिखि मेटणा न होई ॥”
परम् श्रद्धेय एवं परम् पूज्य आदर्श गुरु नानक देव जी ने “ॐ” के महत्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा है-
एक ओंकार सतनाम कर्ता पुरुष निभौं निर्वेर अकालमूर्तयानी “ॐ” सत्यनाम जपनेवाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं “अकाल-पुरुष के” सदृश हो जाता है।
“ॐ” ब्रह्माण्ड का नाद है एवं मनुष्य के अन्तर में स्थित ईश्वर का प्रतीक। धन्य श्री वैदिक सत्य सनातन धर्म संस्कृति – धन्य भारतीय संस्कृति ।
अत्यंत महान् भारतीय संस्कृति को शत-शत नमन!
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति ।
” पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
( ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
आभार –
जो व्यक्ति “ॐ” और “ब्रह्म” जी के पास रहता है, वह अविरल प्रवाह नदी के पास लगे हुए वृक्षों की तरह है जो कभी भी नहीं मुर्झाते।
सर्वे भवंतु सुखिनः
सर्वे संतु निरामया ।।
जय श्रीराम ।
पंडित राकेश शर्मा जी ।
( शिक्षाविद् )।
