धर्म-संसार: धर्मो रक्षति रक्षित:!

वंदे मातरम् – श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति की सदा जय – सत्यमेव जयते!

संपूर्ण विश्व की अति प्राचीन एवं सर्वश्रेष्ठ श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के महान् पूज्य महाग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता का यह श्लोक जीवन के सार और सत्य को भलीभाँति रूप से प्राणी जगत को अवगत कराता है। निराशा के घने बादलों के बीच पवित्र ज्ञान की एक रोशनी की तरह है।  यह श्लोक श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के परम् श्रद्धेय पूज्य महाग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता के प्रमुख श्लोकों में एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह श्लोक परम् श्रद्धेय एवं पूज्य महाग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय संख्या – 4 का अति पवित्र श्लोक संख्या- 7 और श्लोक संख्या- 8 के अंतर्गत है। जानिए मानव कल्याण हेतु पवित्र पावन संस्कृति के महान् विशिष्ट पूर्ण श्लोक को-

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥4-7॥”

“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥4-8॥”

भारतीय श्री सत्य सनातन धर्म अर्थात् हिंदू धर्म संस्कृति के इस पवित्र पावन श्लोक का भावार्थः
परम् श्रद्धेय एवं पूज्य ग्रंथ के अनुसार सृष्टि के पालनहार –
मैं अवतार लेता हूँ। मैं प्रकट होता हूँ। जब जब धर्म की हानि होती है, तब तब मैं आता हूँ। जब जब अधर्म बढ़ता है तब तब मैं साकार रूप से (मानव कल्याण हेतु) लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मैं आता हूँ ।  दुष्टों के विनाश करने के लिए मैं आता हूँ। धर्म की स्थापना के लिए मैं आता हूँ । और ( सृष्टि के कल्याण हेतु ) युग युग में जन्म लेता हूँ।
अति पवित्र पावन श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति की सदा जय।
वंदे मातरम् – जय हिंद – जय भारत -जय भारतीय संस्कृति।

“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
( ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया।। जय श्रीराम ।।
आभार – पंडित राकेश शर्मा जी ( शिक्षाविद् )।

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