धर्म-संसारः धर्मो रक्षति रक्षितः!

गुरु पूर्णिमा विशेषांक:

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः!

गुरुः साक्षात्परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः!!

भारतीय श्री सनातन हिंदू संस्कृति में आस्था रखने वाले व्यक्तियों के लिए उनके जीवन में गुरु का स्थान सबसे ऊँचा माना गया है। परम् पूज्य एवं परम् श्रद्धेय गुरुदेव जीवन में आने वाले विभिन्न संकटों से न केवल उबारते हैं बल्कि इस जीवन को जीने की कला को भी सिखाते हैं ताकि इस जीवन को सहज और सरल रूप से जिया जा सके। परम् श्रद्धेय गुरुदेव ही अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की क्षमता रखते हैं। भारतवर्ष के
मठ, मंदिरों एवं गुरुद्वारों में इसलिए प्रत्येक वर्ष श्री व्यास पूर्णिमा के दिन परम् श्रद्धेय गुरुदेव पूजन का विशेष पर्व
मनाया जाता है एवं इस शुभ दिन पर परम् श्रद्धेय गुरुओं की पूजा-अर्चना की जाती है ताकि उनका आशीर्वाद सदैव उनके भक्तों पर बना रहे। अनेकों मंदिरों में श्री गुरुदेव पूजन एवं ध्वजा वंदन के समय अनेक उत्कृष्ट भारतीय संस्कृति एवं लोक – मंगल कामना के मधुर गीत भी गाए जाते है, जैसे-

“हम श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के पावन गीत गाएंगे। जग में हम भगवा ध्वज लहराएंगे।।”

यदि भारत के गौरवशाली इतिहास पर नजर दौड़ाते हैं तो ध्यान में आता है कि हिंदू धर्म अर्थात् श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति के अंतर्गत कई महानुभावों को गुरुदेव जी के आशीर्वाद एवं सानिध्य से ही देवत्व की प्राप्ति हुई है। अर्थात् श्री देवत्व प्राप्त करने के लिए इन महानुभावों को श्री गुरुदेव जी के श्रीचरणों में ही जाना पड़ा है। इस प्रकार के कई उदाहरणों से भारतवर्ष का इतिहास भरा पड़ा है। जैसे, भीष्म को “भीष्म”
बनाने में महर्षि परशुराम जी की अहम भूमिका रही थी। महर्षि/आचार्य परम् श्रद्धेय चाणक्य जी ने चंद्रगुप्त को गढ़ने का बहुत ही महत्वपूर्ण
कार्य किया था। परम् श्रद्धेय समर्थ स्वामी रामदास जी ने परम् श्रद्धेय शिवाजी महाराज को राष्ट्रवादी राजा अर्थात् हिंदू हृदय सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज जी बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया था। स्वामी विवेकानंद ने परम् श्रद्धेय स्वामी रामकृष्ण परमहंस से दीक्षा ली थी एवं उनके सानिध्य में ही अपना जीवन प्रारम्भ कर विश्व ख्याति को प्राप्त किया था।
श्री गुरु पूर्णिमा को “श्री व्यास पूर्णिमा” के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि शताब्दियों पूर्व,आषाड़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को परम् श्रद्धेय महर्षि वेद व्यास जी का इस धरा पर पदार्पण हुआ था। महर्षि वेद व्यास ने वैदिक ऋचाओं का संकलन कर इनका चार वेदों- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं
अथर्ववेद के रूप में वर्गीकरण किया था। साथ ही 18 पुराणों, 18 उप-पुराणों, उपनिषदों,बृह्मसूत्र, महाभारत आदि अतुलनीय महाग्रंथों को लेखनबद्ध करने का श्रेय भी परम् श्रद्धेय महर्षि वेद व्यास जी को ही दिया जाता है। महान भारतीय परम्परा के अनुसार शिष्य, अपने गुरुदेव जी का पूजन करते हैं।
अतः गुरु वेद व्यास के शिष्यों ने भी सोचा कि महर्षि वेद व्यास का पूजन किस शुभ दिन पर किया जाय। बहुत गहरे विचार विमर्श के पश्चात समस्त शिष्य सहमत हुए कि क्यों न गुरुदेव वेदव्यास जी के इस धरा पर पदार्पण दिवस पर ही पूज्य गुरुदेव जी का पूजन किया जाय। इस प्रकार, परम् श्रद्धेय गुरुदेव वेदव्यास जी के शिष्यों ने इसी पुण्यमयी दिवस को अपने गुरु के पूजन का दिन चुना। यही कारण है कि श्रीगुरु पूर्णिमा को “श्री व्यास पूर्णिमा” भी कहा जाता है। तब से लेकर आज तक प्रत्येक शिष्य अपने परम् श्रद्धेय श्री गुरुदेव जी का पूजन वंदन इसी शुभ दिवस पर करता है।ऐसा कहा जाता है कि सृष्टि के पालनहार श्री भगवान शंकर जी ने परम् पूज्य सप्तऋषियों को योग की दीक्षा देना भी इसी दिन से प्रारम्भ किया था। प्राचीन काल में भारतवर्ष के गुरुकुलों में “श्री गुरु पूर्णिमा” को एक विशेष दिवस के
रूप में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता था। परम् श्रद्धेय श्री गुरु पूर्णिमा के दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि महोत्सव होता था।
गुरूकुल से सम्बंधित दो सबसे मुख्य कार्य गुरु पूर्णिमा के दिन ही सम्पन्न किए जाते थे। एक तो गुरु पूर्णिमा के शुभ मुहूर्त पर ही नए छात्रों को गुरूकुल में प्रवेश प्रदान किया जाता था। अर्थात् गुरु पूर्णिमा दिवस गुरूकुल में छात्र प्रवेश दिवस के रूप में मनाया जाता था। सभी जिज्ञासु छात्र इस दिन हाथों में समिधा लेकर पूज्य गुरुदेव जी के समक्ष आते थे। प्रार्थना करते थे कि हे परम् श्रद्धेय श्री गुरुवर, हमारे भीतर ज्ञान ज्योति प्रज्वलित करें। हम उसके लिए स्वयं को समिधा रूप में अर्पित करते हैं। दूसरे, गुरु पूर्णिमा की मंगल बेला में ही छात्रों को स्नातक उपाधियां प्रदान की जाती थीं। यानी गुरु पूर्णिमा के दिन ही गुरुकुलों में दीक्षांत समारोह के आयोजन किए जाते थे। जो छात्र गुरु की सभी शिक्षाओं को आत्मसात कर लेते थे और जिनकी कुशलता व क्षमता पर गुरु
को संदेह नहीं रहता था उन्हें इस दिन उपाधियां प्रदान की जाती थीं। वे गुरु चरणों में बैठकर प्रण लेते थे कि हे परम् श्रद्धेय श्री गुरुवर, आपके सान्निध्य में रहकर, आपकी कृपा से हमने जो ज्ञान अर्जित
किया है, उसे लोक हित और कल्याण के लिए ही उपयोग करेंगे। अपने परम पूज्य गुरुदेव को दक्षिणा देकर छात्र अपने कार्य क्षेत्र में उतरते थे। इस प्रकार प्राचीन काल में श्री गुरु पूर्णिमा के दिन गुरुकुलों में श्री गुरुदेव जी का कुल बढ़ता भी था और विश्व में फैलता भी था। श्री गुरु पूर्णिमा न केवल हिंदू धर्मावलम्बियों द्वारा एक पवित्र एवं अति महत्वपूर्ण त्यौहार के रूप में मनाया जाता है अपितु जैन एवं बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिए भी “श्री गुरु पूर्णिमा” का दिन अति विशिष्ट महत्वपूर्ण महापर्व के रूप में माना जाता है। श्री जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं। श्री भगवान महावीर जी 24वें परम तीर्थंकर के रूप में अभिवादित हैं।
श्री जैन धर्म के इतिहास में यह वर्णन भी मिलता है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन श्री भगवान महावीर जी ने इंद्रभूति गौतम जी को अपने प्रथम शिष्य के रूप में स्वीकार किया था अर्थात् श्री भगवान
महावीर जी ने गौतम जी को दीक्षित कर उसे अपना प्रथम शिष्य बनाने का गौरव प्रदान किया था। अतः इस दिन एक नया इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में इतिहास के पन्नों में दर्ज किया गया। तभी से श्री जैन सम्प्रदाय के अनुयायी भी
“श्रीगुरु पूर्णिम” को इसी अहोभाव से मनाते हैं कि इस दिन उन्हें श्री भगवान महावीर जी गुरु रूप में मिले थे। इसी प्रकार बौद्ध पंथ के इतिहास में भी यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि महाबुद्ध ने जब बुद्धत्व को प्राप्त कर लिया तो उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि सबसे पहले धम्मोपदेश किस
अनुयायी को दिया जाना चाहिए। तब उहें अपने उन पाँच साथियों का ध्यान आया, जो निरंजना नदी के तट पर उनके साथ तपस्या और काय क्लेश के पथ पर अग्रसर हुए थे। परंतु जब महाबुद्ध ने यह मार्ग छोड़ दिया था, तब उन पाँचों साथियों ने महाबुद्ध को छोड़ दिया था। परंतु चूंकि अब महाबुद्ध ने यह निर्णय कर लिया था कि धम्मोपदेश सबसे पहिले उन पाँच साथियों को ही दिया जाय। अतः महाबुद्ध ने उन पाँच साथियों को खोजना प्रारम्भ किया। जब
यह पता चला कि वे पाँच साथी सारनाथ के निकट ही मिगदाय में रहते हैं, तो महबुद्ध तीर्थ नगरी श्री सारनाथ धाम की ओर चल पड़े। जिस दिन महाबुद्ध सारनाथ पहुँचे और उन पाँच परिव्राजकों को धम्मोपदेश दिया, वह दिन आषाढ़ पूर्णिमा का था। बौद्ध सम्प्रदाय की मौलिक शिक्षाएं इसी दिन
अस्तित्व में आई। इसीलिए बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिए भी “श्री गुरु पूर्णिमा” का दिवस विशेष महत्व का दिन माना जाता है। अब तो ऐसा कहा जा रहा है कि वैज्ञानिक भी आषाड़ पूर्णिमा की महत्ता को अब समझ चुके
हैं। “विस्डम आफ ईस्ट” पुस्तक के लेखक श्री आर्थर चार्ल्स सटोक अपनी पुस्तक में लिखते हैं- कि जैसे भारत- वर्ष द्वारा खोज किए गए शून्य, छंद, व्याकरण आदि की महिमा अब पूरा विश्व गाता है, उसी प्रकार भारत द्वारा उजागर की गई सत्गुरु की महिमा को भी एक दिन पूरा विश्व जानेगा। विश्व यह भी जानेगा कि अपने महान परम् श्रद्धेय श्री गुरुदेव जी की पूजा के लिए उन्होंने आषाड़
पूर्णिमा का दिन ही क्यों चुना। श्री सटोक द्वारा आषाड़ पूर्णिमा को लेकर कई अधय्यन एवं शोध किए गए हैं। इन अध्ययनों एवं शोधों के आधार पर श्री सटोक कहते हैं कि “वर्ष भर में अनेकों पूर्णिमाएं आती हैं, जैसे शरद पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिका, वैशाख पूर्णिमा, आदि। पर
आषाढ़ पूर्णिमा भक्ति व ज्ञान के पथ पर चल रहे साधकों के लिए एक विशेष महत्व रखती है। इस दिन आकाश में अल्ट्रावायलेट रेडीएशन (पराबैंगनी विकिरण) फैल जाती है। इस कारण व्यक्ति का शरीर व मन एक विशेष स्थिति में आ जाता है। उसकी भूख, नींद व मन का बिखराव कम हो जाता है।” अतः यह स्थिति साधक के लिए बेहद लाभदायक है। वह इसका लाभ उठाकर अधिक से अधिक ध्यान साधना कर सकता है। कहने का भाव यह है कि आत्म उत्थान एवं श्रेष्ठ कल्याण के लिए गुरु पूर्णिमा का दिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अति उत्तम माना गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक किसी व्यक्ति या ग्रंथ की जगह केवल
भगवा ध्वज को अपना मार्गदर्शक और परम् श्रद्धेय श्री गुरुदेव मानते हैं। जब परम पूज्य एवं परम् श्रद्धेय डॉक्टर हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रवर्तन किया, तब अनेक स्वयंसेवक चाहते थे कि संस्थापक के नाते वे ही इस संगठन के परम् श्रद्धेय श्री गुरुदेव जी बने; क्योंकि उन सबके लिए परम् पूज्य श्री डॉक्टर हेडगेवार जी का व्यक्तित्व अत्यंत आदरणीय और प्रेरणादायी था।
इस आग्रहपूर्ण दबाव के बावजूद परम् पूज्य श्री डॉक्टर हेडगेवार जी ने श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति अर्थात् हिंदू संस्कृति, ज्ञान, त्याग और सन्यास के प्रतीक “श्री भगवा- ध्वज” को श्री गुरुदेव जी के रूप में प्रतिष्ठित करने का निर्णय किया। श्री हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष व्यास पूर्णिमा- “श्रीगुरुपूर्णिमा” के दिन संघ स्थान पर एकत्र होकर सभी स्वयं सेवक “श्री भगवा ध्वज” का बड़ी श्रद्धा से विधिवत पूजन करते हैं। अखंड भारतवर्ष में अपनी स्थापना के तीन साल बाद संघ ने साल 1928 ई0 में पहली बार गुरुदेव पूजा का आयोजन किया था। तब से यह परम्परा अबाध रूप से जारी है और “श्री भगवा
ध्वज” का स्थान संघ में सर्वोच्च बना हुआ है।
श्री भगवा ध्वज को परम् श्रद्धेय श्री गुरुदेव जी के रूप में प्रतिष्ठित करने के पीछे संघ का दर्शन यह है कि किसी व्यक्ति को गुरु बनाने पर उसमें पहिले से कुछ कमजोरियाँ
हो सकती हैं या कालांतर में उसके सदगुणों का क्षय भी हो सकता है, लेकिन ध्वज स्थायी रूप से अति उत्कृष्ट श्रेष्ठ गुणों की प्रेरणा देता रह सकता है। आइए इस पवित्र पावन दिवस के शुभ अवसर पर हम सब शपथ लें कि माँ भारती को फिर से संपूर्ण विश्व में “विश्वगुरु” बनाने में कोई भी कमी नहीं छोडेंगे, और इसकी सेवा में बड़ी श्रद्धा व सच्चे हृदय से तन-मन-धन न्यौछावर कर देंगे।
जय हिंद -जय भारत -जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी ।
( ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )।
आभार – पंडित राकेश शर्मा जी। ( शिक्षाविद् )।

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