धर्म-संसारः धर्मो रक्षति रक्षितः

[ॐ卐 हर-हर-महादेव 卐ॐ
माँ भारती के अनमोल रत्न जिनके सामने झुकती हैं संपूर्ण दुनिया- विशेषांक]

भारतीय श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति व सभ्यता विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति व सभ्यता है, और इसे विश्व की सभी संस्कृतियों की जननी माना जाता है; चाहे जीने की कला हो, विज्ञान हो या फिर राजनीति का क्षेत्र! भारतीय संस्कृति का विश्व पटल पर सदैव ही एक अनमोल, अद्वितीय, अद्भूत और अविस्मरणीय (विशेष) स्थान रहा है। अन्य देशों की संस्कृतियाँ तो समय की धारा के साथ-साथ नष्ट होती रही हैं किंतु परम् श्रद्धेय एवं परम् पूज्य मातृभूमि – माँ भारती अर्थात् हिंदू धर्म संस्कृति (भारतवर्ष) की संस्कृति व सभ्यता आदिकाल से ही अपने परंपरागत अस्तित्व के साथ आज भी अजर-अमर बनी हुई है। धन्य श्री सत्य सनातन धर्म संस्कृति की सदा जय! इसीलिए स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि भारतवर्ष की महानतम मातृ- भूमि ने ऐसे दिव्य रत्न प्रदान किए हैं जिनकी मनीषा और अभीष्ट विलक्षणता ने समस्त संसार को चौंका दिया है। आज भी उनकी बुद्धिमत्ता और ज्ञान रहस्य का विषय हैं। ज्योतिष भारतवर्ष की समृद्ध और यशस्वी परंपरा है। आइए जानते हैंं भारतवर्ष के दस ऐसे अत्यंत विशिष्ट ज्योतिर्विद्, जिन्हें ब्रह्मांड से लेकर पाताल तक के रहस्य की जानकारी थीं। 
1- महर्षि आर्यभट जी (प्रथम)- संपूर्ण दुनिया में चमकते हुए ध्रुव तारे की भाँति ही महर्षि आर्यभट जी ही ऐसे प्रथम महान् गणितज्ञ ज्योतिर्विद् हैं, जिनका ग्रंथ एवं विवरण प्राप्त होता है। वस्तुत: ज्योतिष का क्रमबद्ध इतिहास इनके समय से ही मिलता है। इनका गणित ज्योतिष से संबद्ध “आर्यभटीय-तंत्र” प्राप्त है, यह उपलब्ध ज्योतिष ग्रंथों में सबसे अधिक प्राचीन है। इसमें दशगीतिका, गणित, कालक्रिया तथा गोल नाम वाले चार पाद हैं। इसमें सूर्य और तारों के स्थिर होने तथा पृथ्वी के घूमने के कारण दिन और रात होने का संपूर्ण व अभीष्ट वर्णन है। इनके निवास स्थान के विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है, कुछ लोग दक्षिण देश के “कुसुमपुर” को इनका मूल निवास स्थान बताते हैं तथा कुछ लोग “अश्मकपुर” बताते हैं। इनका समय 397 शकाब्द बताया गया है। विश्व ख्यातिप्राप्त गणित ज्योतिष के विषय में आर्यभट जी के सिद्धांत अत्यंत ही सर्वोपरि रूप से मान्य हैं। इन्होंने सूर्य और चंद्र ग्रहण के वैज्ञानिक कारणों की व्याख्या की है और वर्ग, वर्गमूल, घन, घनमूल आदि गणितीय विधियों का महत्वपूर्ण विवेचन भी किया है। 
2- महान् ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर जी- चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जी के नौ रत्नों में अति विशिष्ट एवं श्री भगवान सूर्य देव जी के विशिष्ट कृपापात्र प्रकांड महापंडित वराहमिहिर जी ही पहले ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र को सि‍द्धांत, संहिता तथा होरा के रूप में बिलकुल स्पष्ट रूप से व्याख्यायित किया। इन्होंने तीनों स्कंधों के निरूपण के लिए तीनों स्कंधों से संबद्ध अलग-अलग ग्रंथों की रचना की। सिद्धांत (‍गणित)- स्कंध में उनकी प्रसिद्ध रचना है- पंचसिद्धांतिका, संहितास्कंध में बृहत्संहिता तथा होरास्कंध में बृहज्जातक मुख्य रूप से परिगणित हैं। इन्हें शकाब्द 427 में विद्यमान बताया जाता है। ये धर्म नगरी उज्जैन शहर के निवासी थे इसीलिए ये अवन्तिकाचार्य भी कहलाते हैं। इनके पिताश्री आदित्यदास जी प्रकांड महाविद्वान थे, उनसे इन्होंने संपूर्ण ज्योतिर्ज्ञान भलीभाँति रूप से प्राप्त किया। जैसे ग्रहों में परम् श्रद्धेय श्री भगवान सूर्य देव जी की स्थिति है, वैसे ही परम् पूज्य दैवज्ञों में प्रकांड महापंडित वराहमिहिर जी का विशिष्ट स्थान है। वे सूर्यस्वरूप हैं। उनकी रचना-शैली संक्षिप्तता, सरलता, स्पष्टता, गूढ़ार्थवक्तृता और ‍पांडित्य आदि गुणों से परिपूर्ण है। इन्होंने 13 ग्रंथों की रचनाएँ की हैं। इनका बृहज्जातक ग्रंथ फलित शास्त्र का सर्वाधिक प्रौढ़ तथा प्रामाणिक ग्रंथ है। इस पर भट्टोत्पली आदि अनेक महत्वपूर्ण टीकाएं हैं। आचार्य वराहमिहिर जी ने इस विज्ञान को अपनी प्रतिभा द्वारा बहुत विलक्षणता प्रदान की। ये भारतीय ज्योतिष शास्त्र के मार्तण्ड भी कहे जाते हैं। यद्यपि आचार्य के समय तक (नारद संहिता आदि में) ज्योतिष शास्त्र संहिता, होरा तथा सिद्धांत- इन तीन भागों में विभक्त हो चुका था तथापि आचार्य ने उन्हें और भी व्यवस्थित कर उसे अति विशिष्ट वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया। ज्योतिष के सिद्धांत स्कंध से संबद्ध इनके पंचसिद्धांतिका नामक ग्रंथ की यह विशेषता है कि इसमें इन्होंने अपना कोई सिद्धांत न देकर अपने समय तक के पूर्ववर्ती पांच आचार्यों (पितामह, वशिष्ठ, रोमश, पौलिश तथा सूर्य)- के सिद्धांतों (अभिमतों)- का संकलन कर महत्वपूर्ण कार्य किया है। इनकी बृहत्संहिता-स्कंध का सबसे प्रौढ़ तथा मान्य ग्रंथ है। इसमें अति महत्वपूर्ण 106 अध्याय हैं। इस पर महान् आचार्य पंडित भट्टोत्पल की टीका बड़ी ही प्रसिद्ध है। फलित ज्योतिष का बृहज्जातक को दैवज्ञों का कंठहार ही है। इसमें 28 अध्याय हैं। इसमें स्वल्प में ही फलित ज्योतिष के सभी पक्षों का प्रामाणिक वर्णन है। इसमें पूर्व प्रचलित पाराशरीय विंशोतरी दशा को न मानकर नवीन दशा-निरूपण दिया हुआ है। इस ग्रंथ का नष्टजातकाध्याय बड़े ही महत्व का है। 
3- महान् ज्योतिषाचार्य -गणितज्ञ पृथुयश जी- पृथुयश जी प्रकांड महाविद्वान एवं विश्व विख्यात आचार्य वराहमिहिर जी के सुपुत्र हैं। इनके द्वारा विरचित “षट्पंचाशिका” फलित ज्योतिष का प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसमें सात अध्याय हैं। 
4- जगप्रसिद्ध कल्याण वर्मा जी- इनका समय शकाब्द 500 के लगभग है। इनकी लिखी सारावली होराशास्त्र का प्रमुख ग्रंथ है। इन्हें गुर्जरदेश (गुजरात क्षेत्र)- का बताया गया है। सारावली फलादेश अत्यंत प्रामाणिक माना जाता है। इसमें 42 अध्याय हैं। कहा जाता है कि इन्हें माँ सरस्वती का वरदान प्राप्त था। आचार्य व प्रकांड महाविद्वान पंडित भट्टोत्पल जी ने बृहज्जातक की टीका में सारावली के कई श्लोक उद्धृत किए हैं जो इनकी अति विशिष्ट ख्याति को प्राचीन काल से वर्तमान तक जगप्रसिद्ध बनाए रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए हुए है। 
5- महापंडित लल्लाचार्य जी-अत्यंत महान् पंडित लल्लाचार्य जी ज्योतिष के सिद्धांत स्कंध से संबद्ध “शिष्यधीवृद्धितंत्र” ग्रंथ अत्यंत प्रसिद्ध है। इन्होंने रत्नकोष (संहिता ज्योतिष) तथा जातकसार (होरास्कंध) नामक ग्रंथों का भी प्रणयन किया। पंडित लल्लाचार्य जी गणित, जातक और संहिता इन तीनों स्कंधों में पूर्ण प्रवीण थे। शिष्यधीवृद्धितंत्र में प्रधान रूप से “गणिताध्याय” और “गोला ध्याय”- ये दो प्रकरण हैं। गणिताध्याय में अनेक अधिकार (प्रकरण) हैं। पंडित भास्कराचार्यजी इनके ज्ञान से विशेष प्रभावित थे। पंडित लल्लाचार्य जी (720-790 ई0) अखंड भारतवर्ष के एक महान् ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। वे विश्वप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित शाम्ब जी के पौत्र तथा प्रकांड महापंडित महाविद्वान भट्टत्रिविक्रम जी के सुपुत्र थे। उन्होने ‘शिष्यधीवृद्धिदतन्त्रम्’
(= शिष्य की बुद्धि बढ़ाने वाला तन्त्र) नामक एक ग्रन्थ की रचना की। इस ग्रन्थ की रचना का कारण बताते हुए पंडित लल्लाचार्य जी ने स्वयं को विश्व के चमकते हुए ध्रुव तारे- अत्यंत महान् खगोलशात्री, महान् गणितज्ञ और विश्वविख्यात ज्योतिषाचार्य महर्षि आर्यभट जी का शिष्य बताया है।
6- महाविद्वान प्रकांड महापंडित भास्कराचार्य जी -इनका समय 530 शकाब्ध के आसपास माना गया है। इनके महाभास्करीय तथा लघुभास्करीय- ये दो ग्रंथ हैं। आर्यभटीय का भी इन्होंने व्याख्यान किया है ।
विश्वविख्यात पंडित भास्कराचार्य जी का जन्म विज्जडविड नामक गाँव में हुआ था।जो सहयाद्रि पहाड़ियों में स्थित है।
आसीत सह्यकुलाचलाश्रितपुरे त्रैविद्यविद्वज्जने। नाना जज्जनधाम्नि विज्जडविडे शाण्डिल्यगोत्रोद्विजः॥श्रौतस्मार्तविचारसारचतुरो निःशेषविद्यानिधि।साधुर्नामवधिर्महेश्‍वरकृती दैवज्ञचूडामणि॥
(गोलाध्याये प्रश्नाध्यायः, श्लोक 61)
इस श्लोक के अनुसार पंडित भास्कराचार्य जी शांडिल्य गोत्र के उच्चकुलीन “श्रीभट्ट ब्राह्मण” वंशीय ब्राह्मण थे, और सह्याद्रि क्षेत्र के विज्जलविड नामक स्थान के निवासी थे। डॉ0 भाऊ दाजी (1822-1874ई0)ने महाराष्ट्रके चालीसगाँव से लगभग 16 किमी0 दूर पाटण गाँव के एक प्राचीन मंदिर में एक शिलालेख की खोज की थी। इस शिलालेख के अनुसार महान गणितज्ञ पंडित भास्कराचार्य जी के पिताश्री प्रकांड महाविद्वान महापंडित महेश्वर भट्ट जी था और उन्हीं से उन्होंने गणित, ज्योतिष, वेद, काव्य, व्याकरण आदि की विशिष्ट शिक्षा प्राप्त की थी।
गोलाध्याय के प्रश्नाध्याय, श्लोक 58 में भास्कराचार्य लिखते हैं –

रसगुणपूर्णमही समशकनृपसमयेऽभवन्मोत्पत्तिः। रसगुणवर्षेण मया सिद्धान्तशिरोमणि रचितः॥
भावार्थ : शक संवत 1036 में मेरा जन्म हुआ और छत्तीस वर्ष की आयु में मैंने सिद्धान्तशिरोमणि की रचना की। माँ भारती के अनमोल रत्न पंडित आर्यभट जी और पंडित भास्कराचार्य जी भारतवर्ष के ऐसे महान् विशिष्ट विभूति गणितज्ञ, खगोलशात्री और ज्योतिषाचार्य है जिनके नाम से आकाश में भी उपग्रह उड़ते हैं। पूर्व में ऐसा सम्मान शायद ही किसी को प्राप्त हुआ हो। धन्य भारतभूमि और धन्य भारतीय संस्कृति ।
7- महान् गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त जी- महान गणितज्ञ आचार्य ब्रह्मगुप्त ब्राह्मसि‍द्धांत का विस्तार करने वाले हैं। इनका समय 520 सकाब्द है। प्रसिद्ध भास्कराचार्य ने इन्हें ‘गणकचक्र-चूड़ामणि’ कहा है। इन्होंने ब्राह्मस्फुटसिद्धांत तथा खंडखाद्य नामक करण ग्रंथ का निर्माण किया। ये प्रकांड महाविद्वान परम् श्रद्धेय श्री विष्णु जी के पुत्र हैं। ये गुर्जर प्रांत के भिन्नमाल ग्राम के निवासी थे। इन्होंने गणित के क्षेत्र में महान सिद्धांतों की रचना की और नवीन मत भी स्थापित किए। यह कहा जाता है कि तीन ही सिद्धांत (गणित की पद्ध‍ितियां) हैं: (i) – आर्य, (ii) – सौर तथा (iii) – ब्राह्म और इनके विश्वविख्यात क्रमश: तीन आचार्य भी हुए हैं: (अ)- महर्षि आर्यभट जी, (ब) – प्रकांड महापंडित वराहमिहिर जी तथा (स)- परम् श्रद्धेय ब्रह्मगुप्त जी। ये वेद विद्या में अत्यंत‍ निपुण और असाधारण विद्वान थे। इन्होंने बीजगणित के कई नियमों का आविष्कार किया इसीलिए ये ‍गणित के प्रवर्तक कहे गए हैं। अलबरूनी ने इनके गणित ज्ञान की बहुत ही प्रशंसा की है। ये महर्षि आर्यभट जी से उपकृत भी थे।
8- महाविद्वान प्रकांड महापंडित श्रीधराचार्य जी-बीजगणित के ज्योतिर्विदों में श्रीधराचार्य जी का स्थान अन्यतम है। इनके त्रिशतिका (पाटी गणित), बीजगणित, जातक पद्धति तथा रत्नमाला आदि प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। परवर्ती भास्कराचार्य जी आदि इनके सिद्धांतों से बहुत उपकृत हैं। 
9- प्रकांड महाविद्वान वित्तेश्वर (वटेश्वर) जी- “करणसार” नामक इनका ग्रंथ बहुत प्रसिद्ध है। यह ग्रंथ महर्षि आर्यभट जी के सिद्धांतों का अनुगमन करता है। 
10- प्रकांड महाविद्वान महापंडित मुंजाल जी-मध्याधिकार, स्पष्टाधिकार आदि आठ प्रकरणों में विभक्त “लघुमानस” करण ग्रंथ के रचयिता मुंजाल का ज्योतिष-जगत् में महान् आदरणीय एवं विशिष्ट विभूति आदर्शनीय है। ये भारद्वाजगोत्रीय थे। अयनांशनिरूपण में इनका विशिष्ट योगदान रहा है। प्रतिपाद्य विषय गणित होने पर भी इस ग्रंथ की शैली बड़ी रोचक तथा अत्यंत ही सुगम है। माँ भारती के ये अनमोल रत्न प्राचीन काल से आज तक अपने अति विशिष्ट ज्ञान व परम् पवित्र भारतीय संस्कृति की अविरल शोभा बढ़ा रहें हैं। ऐसे परम् श्रद्धेय महर्षियों को संपूर्ण प्राणी जगत का शत शत नमन।
जय हिंद – जय भारत – जय भारतीय संस्कृति।
“ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो।”
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी।
(ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी)
आभार-पंडित राकेश शर्मा जी (शिक्षाविद्)।

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