[ विशेषांक – परम् श्रद्धेय एवं परमपूजनीय श्रीराम जी का चरित्र वस्तुतः आदर्श धर्मात्मा का जीवन चरित्र है। इसीलिए कहा जाता है – मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी की सदा जय!] श्रीराम…
Category: ज्योतिष ज्ञान मंथन
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😎👉 सामान्य तौर पर सभी मांगलिक दोष अशुभ नहीं होते। जब मंगल शुभ ग्रह से संयोग करें व शुभ राशि/ मित्र राशि में होते हैं तो शुभ परिणाम भी आते…
धर्म-संसार: धर्मो रक्षति रक्षितः!
पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी की कलम से – [विशेषांकः जग में प्यारे हैं दो नाम।चाहे श्रीकृष्ण कहो या जय श्रीराम ।।] परम् श्रद्धेय भगवान श्रीरामचंद्र जी, जिन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र…
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😎👉 *मनुष्य पर पांच प्रकार के ऋण और उनसे छूटने के उपाय-: 👇👇👇🔱👉 भगवान की बनाई सृष्टि का कार्य- संचालन और सभी जीवों का भरण-पोषण पांच प्रकार के जीवों के…
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😎👉पंचांग या शाब्दिक अर्थ है पंच+अंग = पांच अंग यानि पंचांग। यही हिन्दू काल-गणना की रीति से निर्मित पारम्परिक कैलेण्डर या कालदर्शक को कहते हैं। पंचांग नाम इसके पांच प्रमुख…
धर्म संसार- धर्मो रक्षति रक्षितः![विशेषांक – अपनी संस्कृति अपना धाम- अपना भारत देश महान् ]पवित्र पावन भारतीय संस्कृति के परम् श्रद्धेय पूज्य भगवान श्री परशुराम जी त्रेता युग के अंतर्गत ( दिव्य ज्योति परम् श्रद्धेय ब्रह्मर्षि वाल्मीकिजी अर्थात् श्रीरामायण काल) में एक परम् श्रद्धेय श्रीभट्ट ब्राह्मण ऋषि जी के यहाँ जन्मे थे। जो परम् पूज्यनीय श्री विष्णु जी के छठा अवतार हैं। भारतीय सनातन संस्कृति के पौरोणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म परम् पूज्यनीय महर्षि भृगु जी के पुत्र महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न परम् श्रद्धेय देवराज इन्द्र जी के वरदान स्वरूपपत्नी रेणुका जी के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को मध्य प्रदेश के इन्दौर नामक शहर के अंतर्गत ग्राम मानपुर के जानापाव पर्वत में हुआ। वे परम् पूज्य श्री भगवान विष्णु जी के आवेशावतार हैं। विश्वविख्यात महाग्रंथ महाभारत और श्री विष्णुपुराण के अनुसार परम् श्रद्धेय परशुराम जी का मूल नाम राम था किन्तु जब श्री भगवान शिव जी ने उन्हें अपना परशु नामक अस्त्र प्रदान किया तभी से उनका नाम परशुराम जी हो गया। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम कहलाए। वे जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परम् श्रद्धेय परशुराम जी कहलाये। परम् श्रद्धेय जी की आरम्भिक शिक्षा ब्रह्मर्षि विश्वामित्रजी एवं ब्रह्मऋषि ऋचीक जी के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से शार्ङ्ग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप जी से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान श्री शंकर जी के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। श्री भगवान शिवजी से उन्हें परम् पूज्यनीय श्रीकृष्ण जी का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किए कठिन तप से प्रसन्न हो श्रीभगवान विष्णु जी ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया।वे शस्त्रविद्या के अत्यंत महान् गुरु थे। उन्होंने परम् श्रद्धेय भीष्मजी, द्रोणाचार्य जी व संपूर्ण संसार के सर्वश्रेष्ठतम् महादानि कर्ण जी को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होनें कर्ण जी को श्राप भी दिया था। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त “शिवपंचत्वारिंशनाम स्तोत्र” भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-“ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नः परशुराम: प्रचोदयात्।” वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे।उन्होंने परम् पूज्य महर्षि अत्रि जी की पत्नी अनसूया जी, महर्षि अगस्त्य जी की पत्नी लोपामुद्रा जी व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था, तथा अवशेष कार्यो में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है। उन्होंने 21 बार क्षत्रिय विहीन किये थे।परम् श्रद्धेय श्री भगवान परशुराम जी का विस्तृत उल्लेख विश्वविख्यात महाग्रंथ श्रीरामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीतापुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों/महाग्रंथो में किया गया है। वे अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से इक्कीस बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये है। जिसमे कोंकण, गोवा एवं केरल का भी समावेश है। पौराणिक कथा के अनुसार श्री भगवान परशुराम जी ने तीर चला कर गुजरात से लेकर केरला तक समुद्र को पिछे धकेलते हुए नई भूमि का निर्माण किया। और इसी कारण कोंकण, गोवा और केरला मे श्रीभगवान परशुराम जी वंदनीय है। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे। उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे। उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है नाकि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना। वे एक परम् पूज्यनीय ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।यह भी ज्ञात है कि श्रीभगवान परशुराम जी ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता जी की शिक्षाओं से सीख ली थीँ (वह शिक्षा जो 8 वर्ष से कम आयु वाले बालको को दी जाती है)। वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे। यहाँ तक कि कई खूँख्वार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके प्रिय मित्र बन जाते थे।उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी। लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं- जैसे विश्वविख्यात भीष्मजी और विश्वविख्यात महादानि धनुर्धर कर्ण जी। उनके जाने-माने शिष्य थे- भीष्म द्रोण, कौरव-पाण्डवों के गुरु व अश्वत्थामा के पिता एवं कर्ण। कर्ण को यह ज्ञात नहीं था कि वह जन्म से क्षत्रिय है। वह सदैव ही स्वयं को शुद्र समझता रहा लेकिन उसका सामर्थ्य छुपा न रह सका। उन्होंने श्रीभगवान परशुराम जी को यह बात नहीं बताई की वह शुद्र वर्ण के है। और श्री भगवान परशुराम जी से शिक्षा प्राप्त कर ली। किन्तु जब श्री भगवान परशुराम जी को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया की उनका सिखाया हुआ सारा ज्ञान उसके किसी काम नहीं आएगा जब उसे उसकी सर्वाधिक आवश्यकता होगी। इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में महादानि कर्ण और विश्वविख्यात धनुर्धर अर्जुन आमने सामने होते है तब वह अर्जुन द्वारा स्वर्गलोक भेज दिया जाता है क्योंकि उस समय कर्ण को ब्रह्मास्त्र चलाने का ज्ञान ध्यान में ही नहीं रहा। परम् श्रद्धेय एवं परमपूजनीय श्रीभगवान परशुराम जी की सदा जय।जय हिंद -जय भारत -जय भारतीय संस्कृति ।”ब्रह्म परंपरा कभी नष्ट न हो!”पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी ।( ज्योतिषाचार्य-वेदपाठी )आभार – पंडित राकेश कुमार शर्मा जी ( शिक्षाविद् )।
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😎👉विवाह एक बहु आयामी संस्कार है,जिसे समाज, जाति व सृष्टि का संचालन होता है। विवाह किसी जातक के जीवन में बहुत खुशियां भर देता है तो कहीं बहुत बड़ा दुख…
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⚫राहुकाल से बचाव⚫ 🏴☠️👉राहु ही राहुकाल का अधिपति ग्रह है। यह बुरा फल देता है। पूरे दिन में डेढ़ घंटे का वक्त राहुकाल का होता है। 🏴☠️👉सूर्य के उगने…
